सम्भल, उत्तर प्रदेश
कोरोना काल ने जब हजारों परिवारों की नौकरियां चली गई, तब कुछ लोग हिम्मत और मेहनत के सहारे नई राह बना रहे थे। बहजोई के गांव भोजपुर बिचौला के किसान और रिसर्चर अवधेश कुमार सिंह ने भी मुश्किल समय में हार मानने के बजाय मिट्टी से अपना रिश्ता और मजबूत किया। नौकरी जाने के बाद उन्होंने गांव लौटकर जैविक खेती को अपनाया और आज सैकड़ों किसानों के लिए उम्मीद की मिसाल बन चुके हैं। अवधेश कुमार की 65 हजार रुपये प्रतिमाह की नौकरी कोरोना काल में छूट गई। इसके बाद उन्होंने शहर छोड़कर गांव का रुख किया और देसी गाय आधारित जैविक तरल उर्वरक बनाने का प्रयोग शुरू किया। देसी गाय के दूध और दही से उन्होंने बीज अमृत, गो कृपा अमृतम और घन जीवा अमृत जैसे उत्पाद तैयार किए।
शुरुआत के छह महीने काफी कठिन रहे। मेहनत ज्यादा थी और आमदनी नहीं के बराबर। लेकिन जैसे ही किसानों ने इन जैविक उर्वरकों का प्रयोग किया, नतीजे सामने आने लगे। जहां पहले गन्ने की पैदावार एक बीघा में 55–60 क्विंटल होती थी, वहीं अब 110–120 क्विंटल तक पहुंचने लगी। बदायूं, अमरोहा और लखीमपुर खीरी के किसानों को इसका सीधा लाभ मिला। जैविक गन्ने की मांग बढ़ने से बड़े कारोबारी सीधे खेतों से खरीद कर कार्बनिक गुड़ बना रहे हैं। अवधेश अपने तरल उर्वरक दो लीटर मात्र 50 रुपये में उपलब्ध कराते हैं, जिसे फसलों पर स्प्रे किया जाता है। आज वह लखीमपुर खीरी, बरेली, शाहजहांपुर, बदायूं, अमरोहा, बिजनौर और संभल के करीब 470 किसानों को जैविक खेती से जोड़ चुके हैं।
अवधेश कुमार के प्रयोग से गन्ने की मिठास और ऊंचाई बढ़ी है, खेती की लागत घटी है और किसान रासायनिक खाद से दूर होकर जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं। आज उनकी सालाना आय 55 से 60 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है और उनकी कहानी यह सिद्ध करती है कि सही सोच और मेहनत से संकट को भी अवसर में बदला जा सकता है।



