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स्थानीय उत्पादों की बुनियाद पर आत्मनिर्भर भारत

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स्थानीय उत्पादों की बुनियाद पर आत्मनिर्भर भारत: गढ़मुक्तेश्वर का बुनकर समाज और मूढ़ा-चटाई की विरासत 

आशाओं व आकांक्षाओं का प्रदेश उत्तर प्रदेश, जहां की कला व संस्कृति सम्पूर्ण  विश्व  को आकर्षित व प्रेरित करती है। उत्तर प्रदेश के हापुड़ शहर के समीप बसी तीर्थ नगरी गढ़मुक्तेश्वर अपनी पौराणिक विरासत  एवम प्राचीन इतिहास के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

गंगा की पावन धारा के किनारे बसा गढ़मुक्तेश्वर केवल एक धार्मिक तीर्थ ही नहीं, बल्कि श्रम, साधना और स्वावलंबन की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जहां हाथों से रचा गया हर उत्पाद आत्मा की सुगंध लिए होता है। यहां का बुनकर समाज पीढ़ियों से जिस कला को अपने जीवन का आधार बनाए हुए है, वही आज ”स्थानीय के लिए मुखर“ और ”आत्मनिर्भर भारत“ के विचार की सशक्त मिसाल बनकर उभरा है। मूढ़ा और चटाई जैसे साधारण दिखने वाले उत्पाद, वास्तव में इस क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान हैं।

गढ़मुक्तेश्वर में देश के कोने-कोने से लोग जब आस्था की डुबकी लगाने आते है तो सड़क किनारे सुंदर मूढ़े व चटाईयां एकाएक ही उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं और वो यहां से दो चार मूढ़े खरीदकर ले ही जाते हैं।

तीर्थ नगरी गढ़मुक्तेश्वर में बनाए जा रहे मूढा व चटाई न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध हैं। प्रदेश सरकार वोकल फॉर लोकल की तर्ज पर यह अभियान चला रही है। गंगा के किनारे लगने वाले कार्तिक पूर्णिमा मेले के उद्घाटन के अवसर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने गढ़मुक्तेश्वर में बनने वाले मूढों और चटाइयों की प्रशंसा करते हुए, इस व्यापार को गति प्रदान करने के लिए विभिन्न योजनाओं का श्री गणेश किया है। इतना ही नहीं कोरोना काल में आपदा को अवसर में बदलने का समय जब आया तो गढ़मुक्तेश्वर के चटाई मोहल्ला में बनने वाली चटाई न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी निर्यात व आजीविका की माध्यम बनी। देश के प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी चटाई बनाने वाली श्रीमती संतोष के साहस, कठिन परिश्रम व लगनशीलता अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात’ में प्रशंसा की। इसी चटाई वाले मोहल्ले में लगभग सवा सौ दलित परिवार रहते हैं जिनके आजीविका का साधन चटाई बनाना ही है। चटाई मोहल्ले में रहने वाली लीलावती, महेश दास महेश चंद्र नवीना एवं संतोष पत्नी ऋषिपाल इस पौराणिक कार्य से ही अपने घर का खर्चा चलाते हैं। सड़क किनारे मूढ़े बनाते हुए लोग यहां सभी दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। यहां पर बनने वाले मूढ़े न केवल भारत के घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं बल्कि विदेशों की बड़ी-बड़ी कोठियों की भी शोभा बढ़ा रहे हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाले ट्रेड फेयर में गढ़मुक्तेश्वर के मूढ़े की बहुत मांग है। यहां से न केवल भारत के कोने-कोने से बल्कि विदेशों में भी निर्यात करने के लिए मांग आती रहती है। मूढा व्यवसाय को बढ़ाने के लिए यहां के लोग दिन-रात मेहनत करते हैं। खादर के क्षेत्र से सरकंडा, सेटा और सुतली इकट्ठा करके यहां के कारीगर मूढा बनाने का काम करते हैं। गढ़मुक्तेश्वर निवासी एवं मूढ़े के कारीगर श्री शिवकुमार गौतम जी का कहना है कि नदी के किनारे केन या गंगा की रेती में उगने वाला सरकंडा आसपास के गांव के लोग साफ करके लेकर आते हैं तथा रविवार को बाजार में उसको बेचकर कर वह कुछ पैसे कमाते हैं। और इन सरकंडे से हम यह व्यापार करते हैं। मूढ़े के नीचे साइकिल के टायर को मोहरी के रूप में लगाया जाता है ताकि लंबे समय तक मोहरी चलती रहे। इस प्रकार मूढ़े को सुंदर व टिकाऊ बनाया जाता है, संतोष पत्नी ऋषिपाल का कहना है कि यह उनके दादा परदादा की विरासत है जिसको वह अब तक चला रहे हैं।

गढ़मुक्तेश्वर का बुनकर समाज केवल एक जातीय या व्यावसायिक समूह नहीं है, बल्कि यह श्रम-संस्कृति का जीवंत विद्यालय है। यहां हुनर विरासत में नहीं, संस्कार में मिलता है। बचपन से ही करघे की खट-खट, बांस की सरसराहट और हाथों की लयबद्ध गति बच्चों के मन में बस जाती है। पिता अपने पुत्र को, माँ अपनी पुत्री को सिखाती है कि कैसे साधारण से दिखने वाले कच्चे माल में भी सुंदरता और उपयोगिता का संसार बसाया जा सकता है।

मूढ़ा और चटाई दो शब्द जो ग्रामीण भारत की सादगी, सहजता और आत्मीयता को परिभाषित करते हैं। गढ़मुक्तेश्वर में बनने वाले मूढ़े केवल बैठने की वस्तु नहीं, बल्कि पारिवारिक संवाद, चौपाल की चर्चाओं और सामाजिक मेल-जोल के साक्षी रहे हैं। चटाई केवल ज़मीन ढकने का साधन नहीं, बल्कि अतिथि-सत्कार, पर्व-त्योहार और सामूहिकता का प्रतीक रही है। इन उत्पादों की सबसे बड़ी विशेषता है प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग। बांस, सरकंडा, मूंज और अन्य घासों से निर्मित ये वस्तुएं पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ टिकाऊ भी हैं। आज जब दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण से जूझ रही है, तब गढ़मुक्तेश्वर का यह पारंपरिक व्यापार आधुनिक समय की सबसे बड़ी जरूरत का समाधान प्रस्तुत करता है।

एक समय था जब गढ़मुक्तेश्वर के मूढ़े और चटाईयां केवल आसपास के गांवों और कस्बों तक सीमित थीं। हाट-बाजार, मेलों और तीर्थ यात्रियों के माध्यम से इनका व्यापार चलता था। लेकिन समय के साथ बुनकर समाज ने भी परिवर्तन को अपनाया। डिजाइन में नवाचार आया, रंगों में विविधता आई और बाजार की मांग के अनुसार उत्पादों को ढाला गया।

आज यही मूढ़े और चटाईयां शहरों के ड्राइंग रूम, होटलों, रिसॉर्टस और यहां तक कि विदेशों तक पहुंच रहे हैं। यह सफर आसान नहीं था, लेकिन बुनकर समाज की मेहनत, धैर्य और सीखने की ललक ने इसे संभव बनाया।

जब देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात’ में गढ़मुक्तेश्वर के मूढ़ा और चटाई व्यापार का उल्लेख किया, तो यह केवल एक क्षेत्र या समाज की प्रशंसा नहीं थी, बल्कि स्थानीय उत्पादों की ताकत को राष्ट्रीय मंच पर स्वीकार करने का क्षण था। उस एक उल्लेख ने बुनकर समाज के आत्मविश्वास को नई उड़ान दी।

आत्मनिर्भर भारत की जीवंत मिसाल: आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक शब्द नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की अनुभूति है। गढ़मुक्तेश्वर का बुनकर समाज इस आत्मनिर्भरता को जीता है। बिना बड़े कारखानों, बिना आधुनिक मशीनों के, यह समाज अपने हाथों की ताकत पर खड़ा है। यहां उत्पादन भी स्थानीय है, उपभोग भी और रोजगार भी।

 मूढ़ा और चटाई के हस्तशिल्प के लिए प्रसिद्ध गढ़मुक्तेश्वर में, अवनीश ट्रेडिंग जैसे व्यापारी बांस के बने मूढ़ा और फर्नीचर का निर्माण और आपूर्ति करते हैं, जिनकी मांग देश-विदेश में है। यह कला यहां का एक प्रमुख लघु उद्योग है जो स्थानीय कारीगरों को रोजगार देता है। यह व्यापार मूढ़ा-चटाई को स्थानीय सामग्री (जैसे टायर्स) से मजबूत बनाकर और सजाकर किया जाता है।

इस व्यापार ने न केवल बुनकरों को, बल्कि कच्चा माल जुटाने वाले, परिवहन करने वाले और बिक्री से जुड़े अनेक लोगों को रोज़गार दिया है। महिलाएं भी इस कार्य में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, जिससे सामाजिक संतुलन और पारिवारिक आर्थिक स्थिरता दोनों सुदृढ़ होती हैं।

किसी भी समाज की असली पूंजी उसकी संस्कृति और परंपरा होती है। गढ़मुक्तेश्वर का बुनकर समाज यह सिखाता है कि विकास का रास्ता अपनी जड़ों को काटकर नहीं, बल्कि उन्हें सींचकर निकलता है। मूढ़ा और चटाई केवल उत्पाद नहीं, बल्कि पीढ़ियों की मेहनत, अनुभव और आत्मा का प्रतिबिंब हैं।

गढ़मुक्तेश्वर का बुनकर समाज हमें यह याद दिलाता है कि भारत की असली शक्ति उसके गांवों, कारीगरों और स्थानीय उत्पादों में निहित है। मूढ़ा और चटाई जैसे साधारण दिखने वाले उत्पाद वास्तव में असाधारण कहानी कहते हैं,संघर्ष की, स्वाभिमान की और आत्मनिर्भरता की।

जब प्रधानमंत्री के शब्दों में इस समाज की गूंज सुनाई देती है, तो यह विश्वास और गहरा हो जाता है कि यदि स्थानीय को समर्थन मिले, तो भारत स्वयं ही विश्व के लिए प्रेरणा बन सकता है। गढ़मुक्तेश्वर का यह बुनकर समाज न केवल अपनी आजीविका गढ़ रहा है, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य की बुनाई भी कर रहा है।


लेखक झम्मन लाल पी.जी. कॉलेज, हसनपुर, अमरोहा में अंग्रेजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर है।