कुरुक्षेत्र
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण संघ कार्य का मूल आधार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नैतिक मूल्यों, आचरण, संस्कार और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के साथ पुरुषार्थ का समन्वय आवश्यक है, तभी स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। सरसंघचालक जी शनिवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त प्रमुख जन गोष्ठी में हरियाणा प्रदेश के प्रमुख शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान मंच पर सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस. जयसवाल, उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल और प्रांत संघचालक प्रताप सिंह मौजूद रहे।
सरसंघचालक जी ने इस
अवसर पर कुटुंब प्रबोधन पर भी जोर दिया। परिवार की भूमिका पर विशेष बल देते हुए
उन्होंने कहा कि घरों में मंगल संवाद की परंपरा विकसित होनी चाहिए, जहाँ मन से मन का संवाद हो और बच्चों को
उचित-अनुचित का बोध कराया जाए। उनका कहना था कि केवल उपदेश नहीं, बल्कि संवाद और संस्कारयुक्त वातावरण ही
व्यक्ति को भटकाव से बचाता है। सरसंघचालक जी ने कहा कि संपत्ति के समय साथ खड़े
होने वाले बहुत होते हैं, लेकिन
विपत्ति में साथ देने वाला कौन है, यह
परिवार और समाज के संस्कार तय करते हैं। यदि कोई भी इंसान असफल हो जाए या बुरी
संगति में पड़ जाए, तो
उसे मार्गदर्शन देने वाला, समझाने
वाला और संभालने वाला अपना परिवार और समाज ही होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर
दिया कि कुटुंब और समाज में संस्कारों का वातावरण निर्माण करना समय की आवश्यकता है,
क्योंकि यही वातावरण जिम्मेदार, संवेदनशील और चरित्रवान व्यक्तित्व का
निर्माण करता है।
सरसंघचालक जी ने कहा
कि संघ को समझना है तो संघ में आकर ही समझना पड़ेगा। केवल बाहर से देखकर, कल्पना से और फैलाये जा रहे नैरेटिव से
नहीं समझ सकते, क्योंकि
संघ का जैसा काम है, वैसा
दुनिया में और कहीं नहीं है। आज पांचों महाद्वीपों से महत्वपूर्ण लोग संघ को देखने,
जानने और समझने के लिए आते हैं। वे भी
अपने देश के युवाओं के लिए इस तरह का विचार संगठन खड़ा करने के लिए सहयोग मांगते
हैं, क्योंकि उनके पास ऐसा
ढांचा नहीं है।
डॉ. मोहन भागवत जी ने
कहा कि जिस तरह से सूर्य जैसा कोई दूसरा सूर्य नहीं, आकाश जैसा दूसरा आकाश नहीं है,
उसी तरह से संघ जैसा
दूसरा संगठन नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर कोई दूर से देखकर संघ को जानना चाहता है,
तो पता नहीं लगेगा। उन्होंने कहा कि संघ
के एक लाख 30 हजार
सेवा कार्य चलते हैं, इसके
बाद भी संघ सर्विस आर्गेनाइजेशन नहीं है। कला से लेकर क्रीड़ा तक और विविध
क्षेत्रों से लेकर राजनीति तक संघ विचार के कार्यकर्ता हैं, इसके बावजूद संघ एक राजनीतिक संगठन नहीं
है। उन्होंने कहा कि संघ के बारे में एक बात समझने की है कि वह स्पर्धा के भाव से
शुरु नहीं हुआ। संघ किसी एक परिस्थिति की प्रतिक्रिया में या विरोध में नहीं चला,
बल्कि राष्ट्र के लिए प्रतिबद्धता के
साथ समाज को जोड़ने के लिए कार्य करता है। संघ को देश पर कोई प्रभाव नहीं जमाना,
ना ही उसे सत्ता की आवश्यकता है। समाज
और देश के लिए संघ के कार्य चलते हैं, उन सब को पूर्ण करने वाला काम ही संघ है।
सरसंघचालक जी ने कहा
कि 1857 के स्वतंत्रता
संग्राम में ब्रिटिश आक्रांताओं के खिलाफ हार हुई थी। भारत का एक लंबा कालखंड रहा,
जब आक्रांता हम पर राज करते रहे और हम
अपनी ही जमीन पर उनसे क्यों हार रहे हैं…इस पर विचार हुआ था। तब किसी ने सोचा था, कि एक बार हार गए तो क्या हुआ…। इसी विचार से स्वतंत्रता प्राप्ति के
लिए तब 1860 में
क्रांतिकारी वासुदेव बलंवत फड़के ने एक भाव जागृत किया। उनका मानना था कि
1857 के स्वतंत्रता
संग्राम में एक मोर्चा हारा है, देश
नहीं, फिर से स्वतंत्रता के
लिए लड़ेंगे। इसके बाद स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रभक्तों की लंबी श्रृंखला डॉ.
हेडगेवार जी से भगत सिंह, राजगुरु,
नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक आगे आई और यह
प्रयास लगातार जारी रहा। वासुदेव बलवंत फड़के को आज भी महाराष्ट्र में आद्य
क्रांतिकारी कहा जाता है।
डॉ. मोहन भागवत जी ने
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के जीवन
प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्हें जन्मजात देशभक्त बताया। उन्होंने कहा कि
बाल्यकाल से ही बालक केशव के मन में राष्ट्रभाव प्रखर था।
सरसंघचालक जी ने
बताया कि मात्र 11 वर्ष
की आयु में बालक केशव ने गुलामी के प्रतीक के रूप में बांटी गई मिठाई को कचरे में
डाल दिया था, जो
उनके स्वाभिमानी स्वभाव का संकेत था। उनके माता-पिता भी सेवा भाव से प्रेरित थे और
प्लेग पीड़ितों की सेवा में लगे रहते थे, जिसका गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। छात्र जीवन में ही
उन्होंने वंदे मातरम् आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उनकी प्रतिभा और
राष्ट्रनिष्ठा को देखकर नागपुर के राष्ट्र विचार के नेताओं ने उन्हें चिकित्सा
शिक्षा के लिए भेजा, जहां
उन्होंने प्रथम श्रेणी में डाक्टरी की पढ़ाई पूरी की और क्रांतिकारी गतिविधियों से
भी जुड़े। वे अनुशीलन समिति से भी जुड़े रहे और स्वतंत्रता आंदोलन के
क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।
सरसंघचालक जी ने
बताया कि डॉ. हेडगेवार जी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौर में कई राष्ट्रभक्तों से
संवाद किया और क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग किया। बालक केशव से लेकर संघ
संस्थापक बनने तक का उनका सफर राष्ट्रचिंतन, प्रयोग और संगठन निर्माण से जुड़ा रहा।
सरसंघचालक जी ने कहा कि लंबे ऐतिहासिक पराधीनता काल के बाद डॉ. हेडगेवार जी ने यह
विचार किया कि केवल राजनीतिक परिवर्तन पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज का संगठन और चरित्र निर्माण
आवश्यक है। इसी सोच के तहत उन्होंने 10-11 वर्षों तक विभिन्न प्रयोग किए और एक विशिष्ट कार्यपद्धति
विकसित की, जिसके आधार पर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई।
उन्होंने कहा कि संघ
की स्थापना के बाद प्रारंभिक वर्षों में किए गए प्रयोगों से जो कार्यपद्धति विकसित
हुई, उसी से संगठन का
स्वरूप मजबूत हुआ। उनका मानना था कि समाज को संगठित किए बिना राष्ट्र निर्माण संभव
नहीं और देश का कार्य किसी एक संस्था या व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
सरसंघचालक जी ने डॉ. हेडगेवार जी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि महापुरुषों
के प्रयास तात्कालिक प्रेरणा देते हैं, लेकिन स्थायी परिवर्तन समाज के आचरण और पुरुषार्थ से आता है।
व्यवस्था परिवर्तन के लिए समाज परिवर्तन आवश्यक है और इसके लिए वातावरण निर्माण
करने वाले चरित्रवान व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।
सरसंघचालक जी ने कहा
कि संघ का मूल कार्य व्यक्तित्व निर्माण और समाज का संगठन है। संघ स्वयं को
उद्धारक नहीं मानता, बल्कि
समाज को सक्षम बनाने का कार्य करता है। उनके अनुसार, प्रत्येक गांव और बस्ती में ऐसे लोगों
का निर्माण जरूरी है जो राष्ट्रीय चरित्र के उदाहरण बनें और समाज में सकारात्मक
वातावरण का निर्माण करें। सरसंघचालक जी ने यह भी कहा कि संघ संपूर्ण समाज को
जोड़ने की बात करता है और विरोधी विचारों वाले लोगों के प्रति भी घृणा नहीं,
बल्कि करुणा का भाव रखना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू किसी संकीर्ण पहचान का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और गुणात्मक जीवन
दृष्टि का प्रतीक है, जिसका
मूल आधार संस्कार, आचरण
और राष्ट्रहित है।
संघ शताब्दी वर्ष के
अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल ने
अपने संबोधन की शुरुआत वंदे मातरम् के उद्घोष से की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की
सौ वर्ष की यात्रा को असाधारण बताया। उन्होंने कहा कि विश्व में शायद ही कोई ऐसा
संगठन हो जो इतने वर्षों से निरंतर विस्तार और प्रभाव के साथ कार्य कर रहा हो।
उन्होंने कहा कि कार्यक्रम में उपस्थित होकर उन्हें नैतिक मूल्यों से प्रेरित
वातावरण का अनुभव हुआ। जायसवाल जी ने संघ को एक मूल्य-आधारित संगठन बताते हुए कहा
कि सेना की तरह संघ भी अनुशासन, संस्कार
और राष्ट्रीयता के भाव से परिपूर्ण है। उन्होंने हिंदू संस्कृति को भारत की पहचान
बताते हुए कहा कि यदि संस्कृति समाप्त हो जाए तो केवल भूमि रह जाएगी, चरित्र नहीं। उन्होंने कहा कि संघ के
माध्यम से राष्ट्र के प्रति निष्ठा और चरित्र निर्माण का कार्य निरंतर बढ़ रहा है।
ले. जनरल
(सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल ने कहा कि संघ में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता और यही
उसका मूल मंत्र है। उन्होंने महात्मा गांधी के वर्धा प्रवास का उल्लेख करते हुए
कहा कि वहां भी संघ की शाखा में समानता का भाव देखने को मिला था। उन्होंने जोर
देकर कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल सेना और उद्योग से नहीं,
बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र से तय
होती है, और चरित्र निर्माण
संघ का मूल आधार है। राष्ट्रीय जिम्मेदारी के संदर्भ में उन्होंने विभाजन काल,
भूदान आंदोलन, 1962 के युद्ध और कारगिल युद्ध के दौरान संघ
स्वयंसेवकों की सेवा गतिविधियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राहत शिविर,
ट्रैफिक नियंत्रण और रक्तदान जैसे
कार्यों के माध्यम से संघ ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल
नेहरू ने भी सराहा था।
उन्होंने वीर सावरकर
के कथन का उल्लेख करते हुए भारतीय सभ्यता को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता बताया। साथ
ही कहा कि भारतीय सेना में धर्म नहीं, बल्कि वर्दी और तिरंगा सर्वोपरि होते हैं और सर्वधर्म समभाव की
भावना ही उसकी पहचान है। जायसवाल ने विभाजनकारी सोच को त्यागने का आह्वान करते हुए
कहा कि अस्पताल में रक्त की पहचान ही सबसे बड़ी होती है, इसलिए समाज में भी एकता का भाव होना
चाहिए। उन्होंने कहा कि संघ में अनुशासन और संस्कार को ही वास्तविक धर्म माना जाता
है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने भारत को विश्वगुरु बनाने का संकल्प लेने का
आह्वान किया और कहा कि संघ के मूल मूल्यों पर चलकर ही राष्ट्र की विजय सुनिश्चित
हो सकती है। उन्होंने “जय
हिंद” के साथ अपने वक्तव्य
का समापन किया। सरसंघचालक जी के उद्बोधन के उपरांत करीब एक घंटे जिज्ञासा समाधान
हुआ और राष्ट्रगान के उपरांत कार्यक्रम का समापन हुआ।
वृत्तचित्र, प्रदर्शनी और संघ की यात्रा
इस अवसर पर परिसर में संघ की 100 वर्ष की यात्रा पर आधारित एक प्रदर्शनी, अस्थाई साहित्य केंद्र, स्वदेशी उत्पाद केंद्र, पंचगव्य उत्पाद केंद्र स्थापित किया गया। संघ की प्रदर्शनी में संघ की क्रमिक विकास यात्रा के साथ इनमें संघ वृक्ष के बीज डॉ. हेडगेवार जी से वटवृक्ष बनने तक की सचित्र यात्रा दिखी। इसी के साथ स्वदेशी जागरण मंच, राष्ट्रसेविका समिति, नर सेवा नारायण सेवा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ,विद्या भारती, संस्कार भारती, हिंदू जागरण मंच, विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम तथा भारतीय किसान संघ की झलक देखने को मिली।
संगठन कागजों में
नहीं, लोगों
के दिल में
सभागार में कार्यक्रम
के शुभारंभ से पहले संघ की सौ वर्ष की यात्रा, वृत्त चित्र के माध्यम से प्रस्तुत की
गई। इसमें संघ के जनक की जीवनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी प्रमुख घटनाओं
को दर्शाया गया। इसमें संघ के गठन से लेकर वर्तमान तक की यात्रा शामिल रही। डॉ.
हेडगेवार जी का मूलमंत्र -संगठन कागजों में नहीं, लोगों के दिल में, इस वृत्त चित्र में सामने था।



