• अनुवाद करें: |
विशेष

21 जून योग दिवस : तन मन और जीवन को स्वस्थ रखने के संकल्प का दिन - रमेश शर्मा

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

21 जून योग दिवस : तन मन और जीवन को स्वस्थ रखने के संकल्प का दिन - रमेश शर्मा 


भारत की पहल पर पूरे संसार में आयोजित अंतराष्ट्रीय योग दिवस का इस वर्ष बारहवाँ आयाम है। इसका आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक मान्यता का दिवस है। यह शरीर और मन मष्तिष्क के साथ संपूर्ण यूनिवर्स से तादात्म्य स्थापित कर जीवन को समृद्ध बनाने का संकल्प दिवस है।

21 जून अंतराष्ट्रीय योग दिवस है। आरोग्य रहकर सृष्टि के विविध रहस्यों से एकाकार होने का माध्यम है योग। भारत के प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी ने विश्व नेतृत्व को इस अद्भुत विधा से अवगत कराया था। प्रारंभिक चर्चा और बैठकों के बाद संयुक्त राष्ट्रसंघ ने विशेषज्ञों से भी परामर्श किया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासचिव की सहमति से मोदीजी ने 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में योग की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता और वर्ष में एक दिन योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव पारित हुआ और 21 जून 2015 को पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आयोजित हुआ। पूरे संसार में इस वर्ष बारहवाँ योग दिवस आयोजित हो रहा है।


गतवर्ष दुनियाँ के 180 से अधिक देशों ने 21जून को योग दिवस आयोजन किया था। कुछ देशों ने तो नियमित अभ्यास और शिक्षण की व्यवस्था भी आरंभ की है। योग दिवस केलिये 21 जून का निर्धारण सामान्य अथवा किसी व्यक्ति विशेष के स्मरण का दिन नहीं है। इस तिथि का निर्धारण वैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर सुनिश्चित हुआ है। 21 जून को उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है। इसका सीधा प्रभाव सूर्य से धरती पर आने वाले प्रकाश और तापमान के संतुलन से पड़ता है।


सूर्य की विभिन्न स्थितियों में उत्सर्जित प्रकाश और ऊर्जा में अंतर आता है। इसे हम प्रतिक्षण बदलते तापमान से समझ सकते हैं। यह धरती के जीवन पर प्रभाव डालती है। योगाभ्यास व्यक्ति के अवचेतन की चेतना को सूर्य की केन्द्रीभूत चेतना से एकाकार करने का प्रयास करता है जो धरती पर जीवन को पल्लवित करती है। सूर्य से ऊर्जा, ऊष्मा और प्रकाश के सहारे ही व्यक्ति अपनी प्रतिभा एवं क्षमता का विकास करता है। जिस प्रकार सूर्य में अनंत ऊर्जा होती है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति में भी असीम प्रतिभा होती है। लेकिन इसके माध्यम से वह नई ऊँचाइयाँ तभी प्राप्त कर सकता है जब स्वस्थ हो, मनोबल संपन्न हो, और अपनी प्रतिभा की मौलिकता के अनुरूप जीवन यात्रा का मार्ग निर्धारित करता है। योगाभ्यास उसकी इस मौलिक प्रतिभा और दक्षता को भी उन्नत नहीं करता; यह उसके स्वभाव में संतुलन एवं आत्मविश्वास की वृद्धि भी करता है, जिससे व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का समन्वित विकास कर सके। योगाभ्यास केवल आरोग्य ही नहीं देता, वह व्यक्ति की समस्त शारीरिक क्षमताओं का विकास भी करता है, जिससे वह जीवन में आगे बढ़ सके। आज इस तथ्य को पूरे संसार ने स्वीकार किया और योग को अंतराष्ट्रीय मान्यता मिली।


"योग" शब्द का महत्व 


भारतीय ज्ञान परंपरा में यौगिक विधा कितनी प्राचीन है, यह कहा नहीं जा सकता। इतिहास में पीछे जहाँ तक दृष्टि जाती है, योग का विवरण मिलता है। गीता महाभारत, उपनिषद या अरण्यक ग्रंथ ही नहीं चारों वेदों में भी योग का उल्लेख है। योग शब्द के दो अर्थ हैं एक सामान्य और दूसरा संस्कृत के भाषा विज्ञान की व्याख्या। शब्द "योग" का सामान्य अर्थ जोड़ना होता है। सूर्य के प्रकाश और ऊर्जा के माध्यम से प्रकृति से जुड़ने की विधा का नाम योग है। यह शब्द संस्कृत की "युज" धातु से बनता है। युज धातु में "यु" पहले आता है। "युग" और "युगान्तरकारी" जैसे शब्द इसी से बनते हैं। फिर प्रत्यय के रूप में "ज" जुड़ता है। "ज" से जन्म और जीवन बनता है। जन्म के बाद जीवन को युगान्तकारी बनाने का संदेश इस युज धातु में है। इसी "युज" धातु से यजुर्वेद शब्द बना है। जो विद्यार्थी किसी सद्गुरू के माध्यम से वैदिक अध्ययन आरंभ करते हैं उन्हें सबसे पहले यजुर्वेद के ज्ञान से ही विद्या आरंभ की जाती है। साधना से आत्मकोष की जाग्रति और सृष्टि की अनंत ऊर्जा से एकात्म होने के सूत्र यजुर्वेद में है। और आत्म जाग्रति की यात्रा आरंभ करने की पहली सीढ़ी योग ही है। इसके लिये मन बुद्धि विचारों के समन्वय और संतुलन के साथ आरोग्य होना आवश्यक है। यदि हम साधना से दूर होकर केवल संसार की यात्रा करें तो भी मन बुद्धि विचारों के संतुलन के साथ आरोग्य होना आवश्यक है। इसलिए भारतीय मनीषियों ने योगाभ्यास के लिये प्रत्येक नागरिक को प्रेरित किया। इसका संबंध किसी धर्म विशेष से अथवा पंथ विशेष से नहीं अपितु मानव मात्र के आरोग्य केलिये है। सूर्य की ऊर्जा और ऊष्मा से पूरे संसार का जीवन चलता है। उस ऊर्जा और ऊष्मा का अपनी क्षमता के अनुरूप अधिकतम आधार प्राप्त करने का माध्यम ही योग है। योग दिवस पर प्रतिवर्ष की थीम अलग होती है। इस वर्ष की थीम "स्वस्थ्य जीवन के लिये योग" है।


स्वास्थ्य का संबंध केवल शरीर से ही नहीं होता। यह पूरे जीवन से जुड़ा होता है। आरोग्य और  स्वस्थ्य शरीर से संपन्न व्यक्ति ही अपने जीवन को स्वस्थ्य बना सकता है। पूरी दुनियां के वैज्ञानिक और सरकारें इस बात से चिंतित है कि बीमारियाँ शरीर को क्षति पहुंचायी ही हैं। इसके वे मन को भी प्रभावित करती हैं जिससे पूरा जीवन और व्यक्ति की कार्यशैली प्रभावित होती है। केवल शरीर ही नहीं मन बुद्धि और विचार को भी योग द्वारा उन्नत बनाया जा सकता है। ये कुल आठ क्रियाएँ होती हैं। इन यौगिक क्रियाओं को कुल आठ भागों में विभाजित किया गया है। इन्हें "अष्टांग योग" कहा गया है। इनमें यम, नियम, संयम आहार, आसन, ध्यान, धारणा और समाधि है। योगाभ्यास के लिये आवश्यक है कि व्यक्ति के मन और चित्त में एकाग्रता हो किसी भी प्रकार का भटकाव न हो, उसका आहार अर्थात भोजन भी शरीर की आवश्यकता के अनुरूप हो। हम जो भी आहार लेते हैं वह केवल शरीर की आवश्यकता की पूर्ति ही नहीं करता हमारी चित्त वृत्ति को भी प्रभावित करता है इसलिये हमारा आहार भी उचित होना चाहिए। आसन में योगाभ्यास होता है । इसके लिये सूर्योदय और सूर्यास्त का संध्याकाल उचित माना गया है। ध्यानस्थ होने के लिये चित्त और शरीर के विभिन्न चक्र में एकाग्रता  आवश्यक है। धारणा उस प्रतीक को कहा गया है जिसके माध्यम से शरीर, मन, बुद्धि और चित्त वृत्ति सब एकाग्र होते हैं और अंत में समाधि की आवश्यकता। यह स्थितप्रज्ञ स्थिति है। इसमें अवचेतन की ऊर्जा जाग्रत होकर चमत्कारिक शक्ति प्रदान करती है। 


योग के विविध आयाम 


मुख्यतः योग के कुल पाँच आयाम होते हैं। इनमें चार के लिए प्रयास किया जाता है, लेकिन पाँचवा आयाम परिस्थितिजन्य होता है। इन्हें हम कर्म योग, भक्तियोग, ज्ञान योग, राज योग और भाव योग के नाम से जानते हैं। हमारे कर्म अथवा कार्य या अभ्यास से जो क्रिया होती है, उसे कर्मयोग कहा जाता है। इसमें करणीय कार्य के प्रति पूरी निष्ठा और समर्पण होता है। दूसरा भक्तियोग है। यह सात्विक प्रेम और समर्पण पर केंद्रित होता है। यह ईश्वर के प्रति, गुरु के प्रति, माता-पिता अथवा किसी भी आदर्श पात्र के प्रति हो सकती है। तीसरा ज्ञान योग है। यह शरीर, इन्द्रियों और मन से बुद्धि के विकास पर केंद्रित होता है। इसमें व्यक्ति अपनी ज्ञान वृद्धि के लिए अध्ययन, अभ्यास, शिक्षण, प्रशिक्षण और सत्संग करता है।  चौथा राज योग है। यह कठोर साधना का आयाम है। आत्म विकास के लिए व्रत, उपवास, योगासन, ध्यान, प्राणायाम से लेकर समाधि तक की साधना इसी योग के अंतर्गत मानी जाती है। पाँचवा भाव योग है। यह परिस्थिति जन्य होता है। मनुष्य की पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ सदैव सक्रिय रहती हैं। देखकर, सुनकर, छूकर अथवा स्वाद के बाद व्यक्ति जिन भावों से जुड़ता है, वह भाव योग है। इसमें हर्ष भी हो सकता है और विषाद भी। जैसे महाभारत युद्ध के लिए एकत्र हुए अपने परिजनों को देखकर अर्जुन के मन में जो भाव उत्पन्न हुये उसे विषाद योग कहा गया।


वर्तमान परिस्थिति में योग दिवस का महत्व


अंतराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन एक ओर भारतीय ज्ञान की समृद्धि की ओर पूरे संसार का ध्यान आकर्षित करता ही है। वहीं प्रगति केलिये वर्तमान वैश्विक स्पर्धा में भी इसका महत्व और बढ़ गया है। योगाभ्यास व्यक्ति को सामाज, राष्ट्र, पूरे वैश्व ही नहीं संपूर्ण सृष्टि को एक सूत्र में पिरोता है।  योगाभ्यास से शरीर को स्वस्थ रहता है और मन शांत रहता है। इसके साथ शरीर और मन के बीच समन्वय भी रहता है। शरीर और मन के समन्वय से बुद्धि प्रखर होती है। निरन्तर योगाभ्यास करने वाले तनाव, अवसाद जैसे मनोरोगों से दूर रहते हैं वहीं उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा जैसे शारीरिक रोगों से भी मुक्त रहते हैं।


आज जीवन शैली केवल प्रकृति को ही प्रदूषित नहीं कर रही है, अपितु मनुष्य को अनेक शारीरिक और मानसिक रोगों से जकड़ रही है। रोज किसी नए रोग के फैलने का समाचार आता है। जब तक रोग के उपचार खोजे जाते हैं, तब तक अनेक प्राणी अपने प्राण गंवा चुके होते हैं। इसके अतिरिक्त, आधुनिक युग की उपचार प्रणाली भी बहुत महंगी हो गई है। कुछ बीमारियाँ तो ऐसी हैं जिनमें जीवन भर की कमाई चली जाती है। मनुष्य के शरीर में किसी भी रोग से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता होती है। यदि व्यक्ति जागरूक है, उसकी प्रतिरोधक क्षमता सक्षम है, तो किसी रोग का मुकाबला सरलता से किया जा सकता है। अग्रिम सावधानी आवश्यक है। इसलिए आज के संदर्भ में योग अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसलिए पूरी दुनिया ने इसे माना और 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के माध्यम से जागृति अभियान आरंभ किया है।