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72 घंटे में मेरठ परिक्षेत्र अंग्रेजों से मुक्त

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72 घंटे में मेरठ परिक्षेत्र अंग्रेजों से मुक्त 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 8 मई 1857 ऐसी तिथि है जब अंग्रेजों से मुक्ति के लिए मेरठ सैन्य छावनी में भारत की मुक्ति का उद्घोष हुआ। जन सामान्य भी इस संघर्ष में सहभागी बना और एक क्रांति ज्वाला पूरे देश में फैल गई और यह स्वातंत्र्य समर की चिंगारी कभी ठंडी नहीं हुई। क्योंकि इसका प्रभाव बहुत दूरगामी था। 1857 का राष्ट्रीय स्वातंत्र्य समर पहला ऐसा संघर्ष था जिसका पूरे देश में व्यापक विस्तार हुआ। इससे पहले के संघर्षाे में दो कमियां रहीं। एक तो वे स्थानीय अथवा क्षेत्रीय रहे और दूसरा, संघर्ष राज सैनिकों तक सीमित रहा। उन संघर्ष में समाज का सहयोग तो रहा पर प्रत्यक्ष नहीं। लेकिन 1857 के समर में पूरा भारतीय समाज सहभागी बना। तत्कालीन समय में अंग्रेजों की दबाव और शोषणकारी नीति से जनता में बहुत रोष था जो मेरठ से आरंभ हुई इस क्रांति में प्रकट हुआ।

क्रांति का बीजारोपण: मेरठ से आरंभ हुई इस क्रांति का बीजारोपण मेरठ से बहुत दूर बंगाल की बैरकपुर छावनी में हुआ। इसका तात्कालिक कारण सैन्य छावनियों में गाय और सुअर की चर्बी-युक्त कारतूस था। इन कारतूसों का उपयोग 1853 से आरंभ हुआ था। इस कारतूस का कवर मुंह से खींचा जाता था। इसकी सूचना सैनिकों ने अधिकारियों तक पहुंचाई किन्तु बात नहीं बनीं। तब मार्च 1857 में बंगाल की बैरकपुर छावनी के सैनिकों ने आवाज उठाई और प्रतीक के रूप में सामने आये सिपाही मंगल पांडे ने खुलकर आवाज उठाई। वे इस सैन्य छावनी की 34 वीं इन्फेन्ट्री में सिपाही थे। उन्होने अपने कुछ साथी सैनिकों से चर्चा की और संयुक्त रूप से प्रतिकार करने का आह्वान किया। यह सूचना कमांडर तक पहुंची। सैन्य कमांडर ने 29 मार्च 1857 को परेड बुलाई और कारतूस लोड कर फायरिंग का आदेश दिया किन्तु सैनिकों ने आदेश मानने से इंकार कर दिया। इस पर कुछ अंग्रेज सैन्य अधिकारी परेड मैदान में ही सैनिकों के साथ दुर्व्यवहार करने लगे, पीटने लगे। इसका सिपाही मंगल पांडे ने विरोध किया तो सार्जेंट-मेजर जेम्स ह्यूसन बंदूक लेकर उनकी ओर दौड़ा। वह समीप आता इससे पहले ही सिपाही मंगल पांडे ने उस पर गोली चला दी। वह बच गया। जनरल जॉन हर्से ने मंगल पांडे को बंदी बनाने का आदेश जमादार ईश्वरी प्रसाद को दिया। जमादार ईश्वरी प्रसाद ने आदेश मानने से इंकार कर दिया। वहां मौजूद सैनिकों में से कोई भी क्रांतिकारी मंगल पांडे को गिरफ्तार करने आगे नहीं आया, तब उस छावनी से मौजूद एक अन्य टुकड़ी के सिपाही बुलाये गये। सैनिक शेख पलटू अपनी टोली के साथ आगे आया। मंगल पांडे और ईश्वरी प्रसाद बंदी बना लिये गये। 6 अप्रैल को उनका कोर्ट मार्शल हुआ। 8 अप्रैल को क्रांतिकारी मंगल पांडे और 21 अप्रैल को जमादार ईश्वरी प्रसाद फांसी पर चढ़ा दिये गये। बटालियन के सभी सैनिकों से हथियार ले लिये गये। अंग्रेज सरकार ने यह पूरी रेजिमेंट भंग कर दी। सभी सैनिकों को अपमानित कर बर्खास्त कर दिया गया। इस इन्फेंट्री के सैनिकों को अपमानित करने की प्रतिक्रिया देश भर की छावनियों में हुई, लेकिन मुखर स्वर देने का काम मेरठ छावनी से हुआ।

मेरठ में क्रांति का उद्घोष: बंगाल की बैरकपुर छावनी में जिस 34 वीं इन्फेन्ट्री को भंग करके सैनिकों को अपमानित किया गया था उसके अधिकांश सैनिक उत्तर प्रदेश के थे। क्रांतिकारी मंगल पांडे भी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के थे। सैनिक अपने-अपने घरों को लौटे। ये समाचार चारों ओर फैल गया। छावनियों में नये कारतूस को लेकर जो असंतोष था उसे सैनिकों के अपमान के समाचार ने क्रांति की हवा को आंधी में बदल दिया। गौरतलब है कि मेरठ की सैन्य छावनी देश की सबसे बड़ी छावनी थी और दिल्ली का सुरक्षा कवच भी। यहां लगभग पांच हजार सैनिक रहा करते थे। इनमें 2357 भारतीय मूल के और 2038 सैनिक विदेशी। इन्हें नियंत्रित करने के लिए अंग्रेज अधिकारियों की टोली तैनात थी जिनकी सुरक्षा के लिए स्वचालित बंदूकों के साथ बारह सिपाहियों का दल सदैव सक्रिय रहता था। स्वचालित बंदूकों वाले ये सभी सैनिक विदेशी होते थे। सैनिकों में कारतूस से उत्पन्न अंसतोष कम करने के लिए कमांडिंग ऑफीसर लेफ्टिनेंट कर्नल जॉर्ज स्मिथ ने 24 अप्रैल 1857 को परेड बुलाई और कारतूस के बारे में फैली चर्चा को केवल अफवाह बताया। लेकिन क्रांति की लौ जलती रही। 8 मई 1857 को आयोजित ऐसी ही एक अभ्यास परेड में 90 सैनिक उपस्थित थे। इनमें से 85 ने यह कारतूस छूने से इंकार कर दिया। इन सैनिकों से हथियार लेकर बंदी बना लिया गया। 9 मई को इन बंदी सैनिकों की परेड हुई। इन सभी सैनिकों को कोर्ट मार्शल के आदेश हुए। सजायें सुना दी गईं। पूरी छावनी में इस निर्णय से भारी असंतोष फैला और अगले ही दिन 10 मई को छावनी के सभी भारतीय सैनिक शस्त्र लेकर अंग्रेजों पर टूट पड़े।

आठ मई को सैनिकों द्वारा अपने कमांडर का आदेश न मानने के केवल 72 घंटे के भीतर ही पूरे मेरठ परिक्षेत्र में सशस्त्र क्रांति का आरंभ हो जाना सभी शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के लिए आश्चर्य का विषय रहा है। कुछ तथ्य मेरठ छावनी में सैन्य क्रांति के आरंभ की प्रेरणा स्वामी दयानन्द सरस्वती के मेरठ प्रवास और उनके ओजस्वी संबोधन को मानते हैं। फिलहाल इस बिगुल के स्वरूप, विस्तार और एकनिष्ठा को लेकर आज भी शोध जारी है।

दस मई को रविवार का दिन था। सामान्य दिनों की भांति ही सूर्याेदय हुआ, लेकिन इस दिन का सूर्याेदय हर दिन से अलग उम्मीद के किरण के साथ हुआ था। पहली किरण के साथ ही भारतीय सैनिक हथियार लेकर निकल पड़े। उन्होंने सबसे पहले शस्त्रागार पर अधिकार कर सभी बंदी सैनिकों को मुक्त किया। विद्रोह को दबाने के लिये कुछ अधिकारियों ने मोर्चा संभाला किन्तु मारे गये। सैनिकों का यह समूह छावनी से बाहर आया। और नगर के विभिन्न स्थानों से होते हुए सरकारी कार्यालय पहुंचकर क्रांति की लौ में सब हवन कर दिया। स्वतंत्रता सेनानियों का एक समूह कोतवाली की ओर गया, यहां उपस्थित कोतवाल धनसिंह मानों प्रतीक्षा ही कर रहे थे। उन्होंने आजादी के दीवानों को देखते ही कोतवाली का शस्त्रागार खोल दिया और कोतवाली में तैनात समूचा पुलिस बल भी क्रांति में शामिल हो गया।

यह समर प्रबल और सुसंगठित था। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि दस मई को प्रातः सूर्याेदय से तीसरे प्रहर तक के कुछ घंटों में ही समूचा मेरठ परिक्षेत्र अंग्रेजों से मुक्त हो गया था। न केवल नगर परिक्षेत्र अपितु आसपास के गांवों से भी अंग्रेजी सरकार के वफादार कारिंदों को मारकर भगा दिया था। मेरठ पर पूर्ण अधिकार करने के बाद क्रांतिकारियों की सैन्य टुकड़ियां दिल्ली की ओर रवाना हो गईं। क्रांतिकारियों की पहली घुड़सवार टुकड़ी 11 मई 1857 को प्रातः दिल्ली पहुंच गई थी और दूसरी टुकड़ी दोपहर तक। यहां पहुंचकर सबने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर से सत्ता संभालने का आग्रह किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया गया।

इस तरह कुछ समय के लिए सही, लेकिन यह स्वतंत्रता संग्राम आरंभ से अपने उद्देश्य में सफल रहा। देश के कई हिस्से अंग्रेजों से मुक्त हो गये। पर यह क्रांति अधिक दिनों तक स्थाई न रह सकी। हालांकि इसका प्रभाव बहुत दूरगामी रहा। मेरठ में क्रांतिकारियों की सत्ता बमुश्किल लगभग दो माह और दिल्ली में चार माह तक चली। अंग्रेजों ने जुलाई 1857 में मेरठ, दिल्ली और उसके आसपास के गांवों में जो दमन, सामूहिक नरसंहार किया उसके रोंगटे खड़े कर देने वाले विवरण इतिहास के पन्नों में मिलते हैं। दिल्ली की सत्ता अंग्रेजों के हाथ में सितम्बर माह में आ गई थी। बादशाह बहादुरशाह जफर को बंदी बनाकर रंगून भेज दिया गया। मेरठ में हुई इस क्रांति का विवरण मेरठ के गजेटियर में है। इसके अतिरिक्त इस आंदोलन के उद्देश्य, योजना और बलिदान का वर्णन आचार्य दीपांकर द्वारा रचित पुस्तक ‘स्वाधीनता आंदोलन’ और स्वातंत्र्य वीर सावरकर की पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ सहित अनेक पुस्तकों में भी है। वहीं ब्रिटिश इतिहासकारों और सैन्य अधिकारियों ने दुर्भावनावश इसके कारण और दमन का विवरण लिखा है। मेरठ में इस क्रांति की स्मृति में शहीद स्मारक भी बना हुआ है, जिस पर उन सभी 85 सैनिकों के नाम अंकित हैं, जिन्होंने आठ मई 1857 को सबसे पहले कमांडर का आदेश मानने से इंकार कर दिया था। इस तरह इस क्रांति ने ही भारत के स्वतंत्रता की नींव रख दी थी, जिससे बाद के दिनों में भी देशभक्तों को प्रेरणा मिलती रही।