अंग्रेजी बनाम हिन्दू पंचांग
ईसवी सन के पूर्व पाश्चात्य देशों में ईसापूर्व 753 में रोम नगर की स्थापना के साथ ही रोमन संवत प्रारंभ हुआ। इस पूर्णतया त्रुटिपूर्ण संवत में केवल 10 माह तथा 304 दिन होते थे। रोमन सम्राट नूमा पांपीसियस ने सात सौ ईसापूर्व इसमें जनवरी तथा फ़रवरी दो माह जोड़कर 355 दिन का वर्ष प्रचलित किया। 46 ईसापूर्व जूलियस सीजर ने वर्ष में 365 दिन का प्रावधान किया। कालांतर में सन् 1582 में पोप ग्रेगरी ने एक आदेश द्वारा माह के चार अक्टूबर को 15 अक्टूबर के रूप में घोषित कर दिया और आदेश दिया कि जो सन् 4 से विभाजित होगा उस वर्ष की फरवरी में 29 दिन होंगे। तब से इस काल गणना को ग्रेगेरियन कैलेंडर कहते हैं। पहले इस कैलेंडर में वर्ष का आरंभ 25 मार्च से होता था परन्तु सन् 1752 ईस्वी सन् में चर्च और ब्रिटिश राज्य की मिलीभगत से वर्ष का आरंभ 1 जनवरी से होने लगा।
ग्रेगोरियन कैलेंडर में मासों का नामकरण जनवरी से जून तक रोमन देवी देवताओं के नाम पर व जुलाई-अगस्त महीनों के नाम जूलियस सीजर और उनके पौत्र आगस्टस के नाम पर हैं। सितंबर, अक्टूबर, नवंबर तथा दिसंबर में चार संख्यावाचक हैं जिनका अर्थ सातवां, आठवां, नवां तथा दसवां है किन्तु इन्हें नवां दसवां ग्यारहवां तथा बारहवां मास कहा जाता है। फरवरी के 28 दिन और हर चौथे वर्ष उनतीस दिन का कर देने पर भी प्रतिवर्ष नौ मिनट ग्यारह सेकेंड के समय को समायोजित करने की कहीं इसमें कोई व्यवस्था नहीं है। कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष, सूर्य के उत्तरायण, दक्षिणायन होने की कोई व्यवस्था ईसाई काल गणना में नहीं है। ईसाई मासों का ऋतुओं से भी कोई संबंध नहीं है। इन सब तथ्यों से यह निष्कर्ष निकलता है कि ईसवी सन् स्स्वाभाविक रूप से अवैज्ञानिक एवं अप्रामाणिक है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वस्तुतः कालगणना का पर्व है। भारतीय कालगणना खगोलीय घटनाओं पर आधारित है। इसमें परमाणु से लेकर कल्प तक की विशुद्ध वैज्ञानिक काल गणना की गई है। चैत्र मास शुक्ल पक्ष में ही ब्रह्माजी ने सृष्टि की संरचना करते हुए सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी आदि नक्षत्रों का सृजन किया तथा उनकी गति को आधार बनाकर काल गणना प्रारंभ की। भारतीय नव वर्ष का प्रथम दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पृथ्वी माता के जन्म, ब्रह्माजी के द्वारा काल गणना का प्रारंभ, नवरात्र के प्रथम दिवस, मत्स्यावतार, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी के राज्यारोहण, धर्मराज युधिष्ठिर के राजतिलक, विदेशी आक्रान्ताओं को खदेड़ने वाले शकारि विक्रमादित्य, सिंध के प्रसिद्ध जननायक संत झूले लाल, गुरु अंगद देव के पावन जन्मदिवस, महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा आर्य समाज प्रस्थापना एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार की पवित्र जयंती से संबद्ध है।
सूर्य की इस सृष्टि से पूर्व त्रैलोक्य में अमावस्या का घोर अंधकार व्याप्त था। दिनकर के अस्तित्व में आने के साथ ही पृथ्वी पर आकाश का आरंभ हुआ। ब्रह्माजी द्वारा इस सृष्टि रचना तथा काल गणना का सम्पूर्ण उपक्रम प्रकृति से तादात्म्य रखकर किया गया। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के स्थान पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के नवसंवत्सर के प्रारंभ का कारण उक्त दिवस का घटाटोप अंधकार को विदीर्ण कर सूर्य निःसृत प्रकाशपुंज किरणों का बिखरना रहा है। भारतीय काल गणना के अनुसार इस पृथ्वी को जन्म धारण किये हुए अब तक 1 अरब, 95 करोड़, 58 लाख, 85 हजार, 126 वाँ वर्ष, कलियुग का युगाब्द 5126 वां वर्ष, शक संवत 1947 और विक्रमी संवत का 2082 वां वर्ष प्रारंभ हो रहा है।
पृथ्वी अपनी धुरी पर 1600 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से परिभ्रमण करती हुई सूर्य की परिक्रमा करती है। एक परिक्रमा में वह अपना झुकाव दो बार परिवर्तित करती है जो क्रमशः उत्तर तथा दक्षिण अयन कहलाते हैं। उत्तरायण का प्रारंभ मकर संक्रांति से तथा दक्षिणायन का प्रारंभ कर्क संक्रांति से होता है। दिन रात का प्रवर्तन तथा ऋतु परिवर्तन पृथ्वी के अक्ष परिभ्रमण के परिणाम है। पृथ्वी के अक्ष की प्रवणता के कारण ही अधिक गर्मी या सर्दी पड़ती है। अक्ष की प्रवणता 0 से लेकर 23 अंश कला तक होती है। इसे क्रांति कहते हैं। भारतीय कालगणना के अनुसार एक सूर्याेदय से दूसरे सूर्याेदय का समय दिवस या वार कहलाता है अतः जिस वार को जो दिन होता है रात्रि भी उसी वार की होती है। पाश्चात्य काल गणना में यह वार मध्यरात्रि 12 बजे बदल जाती है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार एक मास में 30 तिथियां होती हैं। शुक्ल पक्ष की पंद्रहवीं तिथि अमावस्या कही जाती है। जो तिथि सूर्याेदय काल में होती है पंचांग में वही तिथि लिखी जाती है। जिस नक्षत्र में चंद्रमा को प्राप्त होता है उस आधार पर क्रम से 12 मास चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, श्रावण, भाद्रपक्ष, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ एवं फाल्गुन मास पड़ते हैं। इस समय छह मनुओं का काल पूर्ण होकर सातवें मनुकाल के सत्ताईस महायुग व्यतीत हो चूके हैं ।
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान जिस तरह भारतीय संस्कृति को असभ्य, बर्बर, आदिम और मृतप्राय बताने का सफल कुचक्र चला गया और जिससे आज भी वामपंथी चिंतक प्रभावित हैं, उसे दूर करने का वातावरण धीरे धीरे बनने लगा है। सन् 1817 में ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश सरकार द्वारा एक साजिश रची गई कि भारत के बारे में ब्रिटिश संसद को यह अवगत कराया जाए कि कम्पनी भारत में अच्छा शासन दे रही है। परंतु कंपनी के लाभांश का अधिकांश भाग असभ्य, बर्बर और आदिम भारतीय समाज को शिक्षित करने में व्यय हो रहा है। इस साजिश के तहत कुल छह खंडों में एक किताब लिखवाई गई जिसका नाम था - ”द हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया“। इसके लेखक जेम्स मिल थे। ये सज्जन कभी भारत नहीं आए, न ही इनको किसी भी भारतीय भाषा का ज्ञान था। इन्होंने न तो किसी भारतीय विद्वान से या देसी विदेशी भारतीय जानकार से बात की न ही अनेकों प्रयास के बाद भी इंग्लैंड में इन्हें पादरी तक की नौकरी मिली थी। ये ब्रिटिश संसद को अपनी पुस्तक के माध्यम से भारत के बारे में नकारात्मक तथ्य देते रहे। फलतः कंपनी ने इन्हें 800 पाउंड के ऊँचे वेतन के ओहदेदार पद से नवाजा। बाद में इन्हें 2 हजार पाउंड तक वेतन दिया जाने लगा। जेम्स ने अपने बेटे और जाने माने राजनैतिक दार्शनिक जान स्टुअर्ट मिल को भी कंपनी में नौकरी पर लगवा दिया। दोनों का काम ब्रिटिश संसद को भारत की नकारात्मक बातों से प्रभावित कर कंपनी की सत्ता को बनाए रखना था। इस पुस्तक में इस ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपना भविष्य देखा तथा इसे प्रशासनिक गीता के रूप में मान्यता दी गई। भारत आने वाले हर ब्रिटिश अधिकारी को इसे 3 महीने तक भली भांति पढ़कर आत्मसात करना होता था। रही सही कसर अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो ने ”मदर इंडिया“ लिख कर पूरी की जो यूरोप और अमेरिका में इतनी लोकप्रिय हुई कि इसके छपने के एक साल के भीतर इक्कीस संस्करण छपे। कोई दस लाख से ज्यादा लोगों ने इसे पढ़ा।
विगत वर्षों से सेक्युलरिज्म के चक्कर में तथा मैकाले शिक्षा के कारण हम अपनी अस्मिता को भूल गए। रही सही कसर वामपंथियों द्वारा रचित भ्रमित इतिहास के विचार ने पूरी की। भारत के सर्वधर्म सम भाव तथा सर्वे भवन्तु सुखिनः वाली विश्व कल्याण की विचारधारा को जानबूझ कर पीछे धकेला गया। हिंदू नववर्ष मनाना सांप्रदायिकता की श्रेणी में रखा गया। भारतीय विश्वविद्यालयों में परोसा जाने वाला ज्ञान भी विदेशों से आयातित ज्ञान पर आधारित है। केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद स्थिति बदली है। भारतीय नव वर्ष के संबंध में हमारा आत्मगौरव जागे, हम इसकी महत्ता को समझ कर इसको पुनः स्थापित करने में समर्थ हो सकें। इसके लिए समाज को खड़ा होना पड़ेगा। सौभाग्य से आत्मचेतना जागृत करने का प्रयास अब तेज गति पकड़ रहा है। आज समय आ गया है जब भारत के विद्वान फिर से भारतीय संस्कृति और ज्ञान को पुनर्स्थापित करें। पश्चिमी वितंडावाद से प्रभावित भारत के वामपंथी बुद्धिजीवियों को वास्तविकता से परिचित करायें। हम सब भारतीयों का पुनीत कर्तव्य है कि हम स्वयं तथा आगे की पीढ़ी को प्रयास करके संस्कारित करें तथा भारतीय हिंदू नववर्ष को निष्ठा तथा पूर्ण कर्मकांड से उत्साहित होकर पूरे विश्व में मनायें ।




