भोपाल
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में स्वामी विवेकानंद के शिकागो व्याख्यान की स्मृति में विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने की। मुख्य वक्ता प्रखर विचारक मुकुल कानिटकर रहे। उन्होंने विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया।
‘युवा भारत : कल, आज और कल’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में मुकुल कानिटकर ने कहा कि जब स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में धर्म सम्मेलन को संबोधित किया तो बहुत देर तक तालियां बजती रहीं। इसका कारण यह नहीं था कि उन्होंने वहाँ उपस्थित श्रोताओं को ‘भाइयो-बहनो’ कहकर संबोधित किया। अपितु उसके पीछे भावपूर्ण अभिव्यक्ति थी। शिकागो व्याख्यान से पूर्व अमेरिका पहुँचे स्वामी विवेकानंद ने डेढ़ महीने अथाह कष्ट सहन किया। अपमान और तिरस्कार का विषपान किया। इतना कष्ट और अपमान झेलने के बाद भी जब स्वामी विवेकानंद को बोलने के लिए मंच मिला, तो उन्होंने कोई शिकायत नहीं की। आत्मीयता से कहा – “मेरे प्यारे अमेरिकी बहनों और भाइयों”। उनकी इस भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों पर प्रभाव छोड़ा। एक प्रकार से स्वामी विवेकानंद ने सबके मन पर शक्तिपात किया।
जो शक्तिहीन होता है, वह शिकायत करता है। युवा तो समाधान देता है। युवा यानी साहस से भरपूर। स्वामी विवेकानंद आज भी युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं क्योंकि उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद का ऐसा प्रभाव हुआ कि विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद के 7 भाषण हुए। बाद में, उनके भाषणों पर अनुसंधान हुए। मेरी लुई बर्क, जिन्हें बाद में सिस्टर गार्गी के नाम से जाना गया, उन्होंने स्वामी विवेकानंद के पाश्चात्य देशों (विशेषकर अमेरिका और इंग्लैंड) में किए कार्यों पर दुनिया का सबसे गहन और प्रामाणिक शोध किया है। उन्होंने ‘स्वामी विवेकानंद इन द वेस्ट: न्यू डिस्कवरीज़’ नाम से 6 खंडों की एक विस्तृत पुस्तक श्रृंखला लिखी। इस शोध के लिए उन्होंने कई वर्षों तक अमेरिका और यूरोप की यात्रा की। उन्होंने उन शहरों, अखबारों के अभिलेखागारों और परिवारों को खोज निकाला, जहाँ स्वामी जी रुके थे। उन्होंने स्वामी जी के कई ऐसे पत्र, व्याख्यान और संस्मरण खोजे जो इतिहास में कहीं खो चुके थे।
मुकुल कानिटकर ने कहा कि “भगिनी निवेदिता कहती हैं कि 11 सितंबर 1893 हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म का दिन है”। उन्होंने हिन्दू धर्म के प्रति दुनिया के संकीर्ण दृष्टिकोण को बदलकर रख दिया। मद्रास में अपने एक भाषण में स्वामी विवेकानंद तीन प्रश्न पूछते हैं – क्या आप हृदय से इस भारत माता को माँ मानते हो? क्या आपने अपने मस्तिष्क का उपयोग समस्या के समाधान का विचार करने के लिए किया है? और क्या समाधान के लिए अपने हाथों से सेवा कार्य करने के लिए तैयार हो?
अगर हम भारत को अपनी माँ मानते हैं, तब उसको अस्वच्छ क्यों करते हैं, क्यों हम यहाँ-वहाँ कचरा फेंकते हैं, प्लास्टिक का उपयोग करके क्यों भूमि को दूषित करते हैं? उन्होंने अपने भाषण में इस प्रकार के ज्वलंत प्रश्न युवाओं के सामने विचार के लिए छोड़े।
मुकुल कानिटकर ने युवाओं से आह्वान किया कि कोई भी सामान खरीदते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि हम स्वदेशी या मित्र देश के उत्पाद खरीदें। आधुनिकता को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिकता तो उपकरण और तकनीक की होती है, संस्कृति की नहीं। संस्कृति तो निरंतरता में चलती है। संस्कृति और आधुनिकता साथ-साथ चलती है। हमें अपनी संस्कृति का संरक्षण करते हुए विचारों से आधुनिक होना चाहिए।
उन्होंने कहा – “एपीजे अब्दुल कलाम कहते हैं कि जब पत्रकार भी राष्ट्रभक्ति से भरा होता है तो देश को प्रेरणा देने वाले समाचार देता है”। नकारात्मक बातें तो स्वतः समाचार बन जाती हैं। सकारात्मक बातों को समाचार बनाने के लिए दृष्टि और परिश्रम लगता है। अच्छी बातों को समाज तक पहुंचाने के लिए प्रयास करना पड़ता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन एवं स्वागत भाषण में कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि 11 सितंबर, 1893 में अमेरिका में ऐसा कुछ हुआ कि दुनिया को भारत का नया परिचय मिला। स्वामी विवेकानंद के विचारों ने भारत को देखने का दृष्टिकोण बदल दिया। स्वामी विवेकानंद का चयन उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने किया था।
इस अवसर पर स्वामी विवेकानंद के जीवन पर केन्द्रित फीचर लेखन और प्रश्नावली प्रतियोगिता के विजेता विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम का संचालन पत्रकारिता विभाग की विद्यार्थी अनन्या एवं जनसंचार विभाग की छात्रा सुमेधा ने किया। आभार ज्ञापन कुलसचिव प्रो. पी. शशिकला ने किया।



