राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सावरकर - डॉ. प्रदीप कुमार
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक विनायक दामोदर सावरकर का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर ग्राम में 28 मई 1883 को हुआ था। विनायक के पिता का नाम दामोदर पन्त तथा माता का नाम राधाबाई था सावरकर जी चार भाई-बहन थे। वीर सावरकर न केवल स्वाधीनता संग्राम सेनानी थे अपितु वे एक महान चिंतक, लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी राजनेता भी थे। सावरकर जी की प्रारम्भिक शिक्षा नासिक में हुई थी। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे तथा उन्होंने बचपन में ही गीता के श्लोक कंठस्थ कर लिए थे। ऐसी प्रखर मेधाशक्ति वाले शिष्य के प्रति शिक्षकों का असीम स्नेह होना स्वाभाविक ही था। उन दिनों महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक के समाचार पत्र केसरी की भारी धूम थी वे उसे पढ़ते थे जिसके कारण उनके मन में भी क्रांतिकारी विचार आने लग गये। केसरी के लेखों से प्रभावित होकर उन्होंने भी कविताएं तथा लेख आदि लिखने प्रारम्भ कर दिये। सावरकर जी ऐसे पहले भारतीय थे जिन्होंने वकालत की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। लेकिन उन्होंने अंग्रेज सरकार की वफादारी की शपथ लेने से इन्कार कर दिया था, जिसके कारण उन्हें वकालत की उपाधि प्रदान नहीं की गयी।
सन 1899 में सावरकर ने ‘देशभक्तों का मेला’ नामक एक दल का गठन किया। जबकि 1900 में उन्होंने ‘मित्र मेला’ नामक संगठन बनाया। 4 वर्ष बाद यही संगठन ‘अभिनव भारत सोसाइटी’ के नाम से सामने आया। इस संगठन का उद्देश्य भारत को पूर्ण राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त कराना था। इसी बीच सावरकर कानून की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए। वे जून 1906 में पर्शिया नामक जलपोत से लंदन के लिए रवाना हुए। उन्हें विदाई देने के लिए परिवार के सभी सदस्य मित्र एवं बाल गंगाधर तिलक भी गए थे। लंदन प्रस्थान से पूर्व उन्होंने एक गुप्त सभा में कहा था, ‘मैं शत्रु के घर जाकर भारतीयों की शक्ति का प्रदर्शन करूंगा।’
लंदन में उनकी भेंट श्याम जी कृष्ण वर्मा से हुई। लंदन का इंडिया हाउस उनकी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। उनकी योजना नये-नये हथियार खरीद कर भारत भेजने की थी ताकि सशस्त्र क्रांति की जा सके। वहां रहने वाले अनेक छात्रों को उन्होंने क्रांति के लिए प्रेरित किया। उक्त हाउस में श्याम जी कृष्ण वर्मा के साथ रहने वालों में भाई परमानंद, लाला हरदयाल, ज्ञानचंद वर्मा, मदन लाल धींगरा जैसे क्रांतिकारी भी थे। उनकी गतिविधियां देखकर ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें 13 मार्च 1909 को गिरफ्तार कर लिया। उन पर भारत में भी मुकदमे चल रहे थे, उन्हें मोरिया नामक पानी के जहाज से भारत लाया जाने लगा। 10 जुलाई 1909 को जब जहाज मोर्सेल्स बंदरगाह पर खड़ा था तो वे शौच के बहाने समुद्र में कूद गये और तैरकर तट पर पहुंच गये। उन्होंने स्वयं को फ्रान्सीसी पुलिसकर्मी के हवाले किया लेकिन तत्कालीन सरकार ने उन्हें फ्रांसीसी सरकार से ले लिया और तब यह मामला हेग न्यायालय पहुंच गया। जहां उन्हें अंग्रेज शासन के विरूद्ध षड़यंत्र रचने तथा शस्त्र भेजने के अपराध में आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई। उनकी सारी सम्पत्ति भी जब्त कर ली गई। सावरकर को अंग्रेज न्यायाधीश ने एक अन्य मामले में 30 जनवरी को पुनः आजन्म कारावास की सजा सुनाई। इस प्रकार सावरकर को दो आजन्म कारावासों का दण्ड दे दिया गया। सावरकर को जब अंग्रेज न्यायाधीश ने दो आजन्म कारावासों की सजा सुनाई तो उन्होनें कहा कि, ‘मुझे बहुत प्रसन्नता है कि ब्रिटिश सरकार ने मुझे दो जीवनों का कारावास दंड देकर पुनर्जन्म के हिन्दू सिद्धान्त को मान लिया है।’
सावरकर ने ब्रिटिश अभिलेखागारों का अध्ययन करके ‘1857 का स्वाधीनता संग्राम’ नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा। फिर इसे गुप्त रूप से छपने के लिए भारत भेजा गया। ब्रिटिश शासन इस ग्रन्थ के लेखन एवं प्रकाशन की सूचना मात्र से ही कांप उठा। तब प्रकाशक ने इसे गुप्त रूप से पेरिस भेजा। वहां भी अंग्रेज सरकार ने इस ग्रन्थ का प्रकाशन नहीं होने दिया, अन्ततः इसका प्रकाशन 1909 में हालैण्ड से हुआ। यह आज भी 1857 के स्वाीधनाता संग्राम का सबसे विश्वसनीय ग्रन्थ है।
1911 में उन्हें एक और आजन्म कारावास की सजा सुनाकर कालापानी भेज दिया गया। इस प्रकार उन्हें दो जन्मों का कारावास मिला। वहां उनके बड़े भाई गणेश सावरकर भी बंद थे। जेल में इन पर घोर अत्याचार किए गए गए जो कि एक क्रूर इतिहास बन गया। कोल्हू में जुतकर तेल निकालना, नारियल कूटना, कोड़ों की मार, भूखे-प्यासे रखना आदि। सावरकर जी ने जेल में दी गई यातनाओं का वर्णन अपनी पुस्तक ‘मेरा आजीवन कारावास’ में किया है। कुछ समय बाद उन्हें अंडमान भेज दिया गया। वहां की काल कोठरी में उन्होंने कविताएं लिखीं। उन्होंने मृत्यु को संबोधित करते हुए जो कविता लिखी वह अत्यंत मार्मिक व देशभक्ति से परिपूर्ण थी।
1921 में उन्हें अंडमान से रत्नागिरि जेल में भेज दिया गया। 1937 में वहां से भी मुक्त कर दिये गये। परन्तु वे सुभाष चंद्र बोस के साथ मिलकर योजना में लगे रहे। 1947 में उन्हें स्वतंत्रता के बाद गांधी जी की हत्या के मुकदमे में झूठा फंसाया गया, लेकिन वे निर्दोष सिद्ध हुए। ऐसे वीर क्रांतिकारी सावरकर का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ने लगा और 26 फरवरी 1966 को उन्होंने अपनी देह का त्याग किया।
सावरकर और संघ के बीच विचारों में समानता भी थी परन्तु कई मुद्दों पर सावरकर संघ के साथ सहमत नहीं थे। सावरकर ने हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं को संघ छोड़ने की हिदायत दे दी थी। इसका जिक्र 3 मार्च, 1943 को सावरकर द्वारा लिखे एक पत्र के माध्यम से चलता है। विनायक दामोदर सावरकर का नाम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े उन चंद लोगों में शामिल है जिन्हें लेकर तमाम तरह के मिथक और कहानियां गढ़ी गई हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सावरकर से उसके रिश्ते उतने सहज नहीं थे जितना दावा किया जाता है। आज जानने की कोशिश करते हैं कि ऐसे कौन-कौन से मुद्दे थे जिनपर संघ और सावरकर का रुख एक दूसरे के विपरीत रहा।
विनायक दामोदर सावरकर हिंदू महासभा के नेता थे। हिंदू महासभा की स्थापना 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद 1915 में हुई थी। जिसका लक्ष्य ब्रिटिश हुकूमत में हिंदू हितों की रक्षा करना था। हिंदू महासभा की स्थापना के 10 साल बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। इस लिहाज से हिंदू महासभा को संघ का मातृ संगठन भी कहा जा सकता है। महासभा के नेता चाहते थे कि संघ उनकी युवा इकाई के तौर पर काम करे। लेकिन महासभा का यह प्लान पूरा नहीं हो पाया और सावरकर के नेतृत्व में महासभा की युवा इकाई राम सेना की स्थापना की गई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर वाल्टर के. एंडरसन और श्रीधर दामले द्वारा लिखी गई किताब ‘दि ब्रदरहुड इन सैफ्रन, दि आरएसएस एण्ड दि हिंदू रिवाइवलिज्म’ में दावा किया गया है कि सावरकर हिंदू महासभा को कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक दल में बदलना चाहते थे। जबकि आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार पहले से ही तय कर चुके थे कि आरएसएस कांग्रेस के खिलाफ सक्रिय राजनीति में सहभागी न होकर एक सास्कृतिक संगठन के तौर पर काम करेगा।
आजादी के इतिहास के पन्नों में 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन एक महत्वपूर्ण पड़ाव के तौर पर दर्ज है। जब ब्रिटेन द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल हो रहा था और महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की अगुवाई की। इस दौरान पूरे देश ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। आरएसएस ने भी खुद इस आंदोलन में भाग लिया। लेकिन सावरकर ने एक कदम आगे बढ़कर इस दौरान देश के अन्य हिस्सों का दौरा किया और हिंदू युवाओं को अंग्रेजों की सेना में शामिल होने का आह्वान किया।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम की किताब में ये जिक्र मिलता है कि साल 1937 में हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में सावरकर ने कहा था कि आज यह कतई नहीं माना जा सकता कि हिंदुस्तान एकता में पिरोया हुआ राष्ट्र है, इसके विपरीत हिंदुस्तान में मुख्यतः दो राष्ट्र हैं, हिंदू और मुसलमान। जबकि मुहम्मद अली जिन्नाह के द्विराष्ट्र सिद्धांत को मुस्लिम लीग ने 1940 में पाकिस्तान के तौर पर मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र की मांग की थी। इतिहास में इसे द्वी राष्ट्र सिद्धांत के तौर पर जाना जाता है। यही नहीं 15 अगस्त, 1943 को नागपुर में सावरकर ने कहा था, ‘मिस्टर जिन्ना की टू नेशन थ्योरी से मेरा कोई झगड़ा नहीं है. हम, हिंदू, स्वयं में एक राष्ट्र हैं और ये ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुस्लिम दो राष्ट्र हैं।’
‘हिंदुत्व’ शब्द की उत्पत्ति सावरकर की कलम से हुई थी। हिंदुत्व विचारधारा के जनक सावरकर ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन ‘हिंदुत्व’ नामक के ग्रन्थ में किया। शुरू में भले ही सावरकर और आरएसएस हिंदुत्व की इसी अवधारणा को लेकर आगे बढ़े हों, लेकिन बाद में आरएसएस ने अपने रुख में परिवर्तन लाया और अब संघ का मानना है कि हिंदुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद हिंदुत्ववादी संगठन आरएसएस और हिंदू महासभा पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
संघ के संस्थापन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने सावरकर जी के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था कि आप संघ की बागडोर अपने हाथ में लीजिए और सरसंघचालक का उत्तरदायित्व ग्रहण कीजिए। लेकिन सावरकर जी ने यह कहते हुए मना कर दिया कि डॉ. साहब मैं भीड़ तो इकट्ठी कर सकता हूं परन्तु कार्यकर्ता निर्माण का काम मेरे बस की बात नहीं है। यह कार्य तो आपको ही करना है। मैं इसमें आपका सहयोग करूंगा। इस तरह सावरकर और संघ में विभिन्न मुद्दों को लेकर मतभेद रहे होंगे। लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही था। आज भी संघ सावरकर जी को अपना आदर्श महापुरुष मानता है। आज भले ही अनेकों राजनीतिक दल सावरकर और संघ को लेकर भ्रांतियां फैलाने का कार्य कर रहे हैं परन्तु इससे उनके मनसूबे पूरे हाने वाले नहीं है। सावरकर और संघ के विचारों में जो समानता थी वह आज भी प्रासांगिक हो रही है।
लेखक - डॉ. प्रदीप कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, रामजस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय




