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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: नेतृत्व, कर्तव्य और धर्म की शाश्वत प्रेरणा

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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: नेतृत्व, कर्तव्य और धर्म की शाश्वत प्रेरणा 

”परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।“

श्रीकृष्ण केवल भारतीय आस्था के आराध्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन के ऐसे विराट व्यक्तित्व हैं, जिनके जीवन में प्रेम भी है और नीति भी, करुणा भी है और पराक्रम भी, कर्तव्य भी है और संकट में नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता भी। जन्माष्टमी केवल श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उस चेतना के जागरण का पर्व है, जो मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य, धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

आज जब भारत की युवा पीढ़ी एक ऐसे समय में आगे बढ़ रही है, जहाँ तकनीक ने संसार को अत्यंत निकट ला दिया है, सूचनाओं का विस्फोट हो रहा है और अवसरों के साथ असमंजस भी बढ़ रहा है, तब श्रीकृष्ण का जीवन और श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

संकट में जन्मी आशा: श्रीकृष्ण का जन्म किसी राजमहल की सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि कारागार में हुआ। चारों ओर भय था, अत्याचार था और मृत्यु का साया था। लेकिन उसी अंधकार में आशा का जन्म हुआ।यह प्रसंग आज के युवा के लिए गहरा संदेश देता है- परिस्थितियां हमारे भविष्य का निर्धारण नहीं करतीं; हमारा साहस, हमारा चरित्र और हमारे कर्म करते हैं।

आज का युवा अनेक प्रकार के दबावों से गुजर रहा है-शिक्षा और रोजगार की चिंता, प्रतिस्पर्धा, सामाजिक अपेक्षाएं और आभासी संसार में निर्मित सफलता की चमक। ऐसे समय में कृष्ण का जीवन सिखाता है कि कठिनाइयों से भागना समाधान नहीं है। कठिन परिस्थितियों के बीच अपने कर्तव्य को पहचानना ही जीवन की वास्तविक परीक्षा है।

कर्मयोग: फल से अधिक कर्तव्य: श्रीमद्भगवद्गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध संदेश है-

”कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।“

मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं। इसका अर्थ कर्म के परिणाम की उपेक्षा करना नहीं, बल्कि परिणाम के भय अथवा मोह के कारण अपने कर्तव्य से विमुख न होना है। आज सफलता को प्रायः धन, पद, प्रसिद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा से मापा जाता है। श्रीकृष्ण सफलता की इससे कहीं व्यापक परिभाषा देते हैं। श्रेष्ठ जीवन वह नहीं जिसमें उपलब्धियां अधिक हों; श्रेष्ठ जीवन वह है जिसमें उपलब्धियों के पीछे उद्देश्य भी हो।

विद्यार्थी का धर्म ज्ञान अर्जित करना है। युवा का धर्म स्वयं को सक्षम बनाना है। शिक्षक का धर्म पीढ़ियों का निर्माण करना है। किसान का धर्म अन्न उत्पन्न करना है। सैनिक का धर्म राष्ट्र की रक्षा करना है। नागरिक का धर्म अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना है। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्म को ईमानदारी और उत्कृष्टता से करता है, तब राष्ट्र स्वतः सशक्त होता है।

संकट में नेतृत्व: कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने स्वयं शस्त्र नहीं उठाया। उन्होंने अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया। यह भारतीय नेतृत्व-दर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण उदाहरण है।

सच्चा नेता वह नहीं जो केवल आदेश देता है; सच्चा नेता वह है जो संकट में दिशा दिखाए, भ्रमित मनुष्य में आत्मविश्वास जगाए और उसे अपने कर्तव्य का बोध कराए। अर्जुन के हाथ में गांडीव था, सामर्थ्य था, लेकिन मोह और संशय ने उसके विवेक को ढक दिया था। श्रीकृष्ण ने उसके स्थान पर निर्णय नहीं लिया। उन्होंने उसे ज्ञान दिया, उसके प्रश्न सुने और उसे स्वयं निर्णय लेने योग्य बनाया।

यही आज के समाज में संवाद की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन असहमति को संघर्ष में बदल देना समाधान नहीं है। परिवार में पीढ़ियों के बीच दूरी हो, समाज में विचारों का मतभेद हो अथवा राष्ट्र के सामने कोई जटिल प्रश्न-संवाद ही वह मार्ग है जो मनुष्य को विरोध से विमर्श और विमर्श से समाधान की ओर ले जाता है।

कृष्ण ने अर्जुन को मौन रहने के लिए नहीं कहा; उन्होंने उसके प्रश्नों का उत्तर दिया। यही भारतीय परंपरा की विशेषता है कि प्रश्न करो, विचार करो, संवाद करो और फिर कर्तव्य का मार्ग चुनो।

कर्म में कौशल और जीवन में अनुशासन: गीता कहती है- ”योगः कर्मसु कौशलम्।“ अर्थात् कर्म में कुशलता ही योग है।

भारत की युवा शक्ति के सामने आज अभूतपूर्व अवसर हैं। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्यमिता और ज्ञान के नए क्षेत्र युवाओं के लिए संसार के द्वार खोल रहे हैं। लेकिन प्रतिभा को अनुशासन चाहिए, ज्ञान को चरित्र चाहिए और शक्ति को विवेक चाहिए।

युवा पीढ़ी के लिए श्रीकृष्ण का संदेश स्पष्ट है- आधुनिक बनो, लेकिन अपनी जड़ों से मत कटो। आगे बढ़ो, लेकिन अपने संस्कारों को पीछे मत छोड़ो। प्रतिस्पर्धा करो, लेकिन चरित्र से समझौता मत करो।

तकनीक हमारे हाथ में साधन होनी चाहिए, जीवन की दिशा निर्धारित करने वाली शक्ति नहीं।

प्रेम, समरसता और परिवार: श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व केवल कुरुक्षेत्र के रणनीतिकार तक सीमित नहीं है। वे गोकुल के कान्हा हैं, सुदामा के सखा हैं, गोवर्धन उठाकर समुदाय की रक्षा करने वाले कृष्ण हैं। उनके जीवन में शक्ति और संवेदना का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

आज परिवार और समाज अनेक नए दबावों से गुजर रहे हैं। पीढ़ियों के बीच संवाद की कमी, बढ़ता व्यक्तिवाद और जीवन की तेज गति परिवारों के भीतर दूरी पैदा कर रही है। ऐसे समय में कुटुंब प्रबोधन का विचार अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है-परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कार, संवेदना और उत्तरदायित्व का पहला विद्यालय है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण का जीवन सामाजिक समरसता का भी संदेश देता है। उन्होंने व्यक्ति का मूल्य उसकी जन्म-परिस्थिति से नहीं, उसके गुण, कर्म और संबंधों से देखा। भारत की शक्ति इसी में है कि विविधताओं के बावजूद हम एक सांस्कृतिक परिवार की भावना को जीवित रखें।

जन्माष्टमी: कृष्ण के आदर्शों से राष्ट्र निर्माण तक: आज का युवा केवल भविष्य का नागरिक नहीं है; वह वर्तमान भारत के निर्माण का सक्रिय सहभागी है।

गीता का एक और अमर संदेश है-

”उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्“

मनुष्य को स्वयं अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए।

यह आत्मनिर्भरता का भी संदेश है और आत्मानुशासन का भी। किसी युवा की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं, बल्कि अपने कल के रूप से है। यदि आज वह कल से बेहतर बनने का प्रयास करता है, तो वही वास्तविक प्रगति है। श्रीकृष्ण का जीवन भारत की विविधता में एकात्मता का भी प्रतीक है। मथुरा, गोकुल, वृंदावन, द्वारका और कुरुक्षेत्र उनका जीवन भारत की अनेक भौगोलिक और सांस्कृतिक धाराओं को जोड़ता है। इसलिए कृष्ण किसी एक क्षेत्र, भाषा या वर्ग के नहीं, सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं।

जन्माष्टमी का वास्तविक संदेश भी यही है कि कृष्ण का जन्म केवल एक ऐतिहासिक घटना के रूप में न मनाया जाए, बल्कि उनके विचार हमारे जीवन में जन्म लें।

- जब हम अन्याय के सामने साहस चुनते हैं-वहां कृष्ण हैं।

- जब कठिन परिस्थिति में कर्तव्य चुनते हैं - वहां कृष्ण हैं।

- जब असहमति के बीच संवाद चुनते हैं - वहां कृष्ण हैं।

- जब सफलता के साथ विनम्रता और शक्ति के साथ करुणा चुनते हैं - वहां कृष्ण हैं।

और जब अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज तथा राष्ट्र के कल्याण के लिए कर्म करते हैं-वहां भी कृष्ण हैं।

आइए, इस जन्माष्टमी पर हम केवल कृष्ण का जन्मोत्सव न मनाएं, बल्कि अपने भीतर साहस, विवेक, कर्तव्य, करुणा, समरसता और राष्ट्रभाव का जन्म करें।

भारत का भविष्य केवल नई तकनीकों, बड़ी अर्थव्यवस्था और आधुनिक संस्थानों से नहीं बनेगा। वह बनेगा उन करोड़ों नागरिकों के चरित्र से, जो अपने व्यक्तिगत स्वप्नों को राष्ट्र के स्वप्न से जोड़ेंगे।

यही जन्माष्टमी का वास्तविक उत्सव है। गीता को केवल पढ़ें नहीं, जीवन में उतारें। यही श्रीकृष्ण की शाश्वत प्रेरणा है।

”यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।“

- श्रीमद्भगवद्गीता 3.21         राधे राधे।