सहारनपुर, उत्तर प्रदेश
गांव की दो बार चुनी जा चुकी ग्राम प्रधान रीटा चौधरी की पहल और ग्रामीणों के सहयोग से थरौली ने ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव प्राप्त किया है। ग्राम प्रधान की सोच थी कि गांव को ईंधन और ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाया जाए, और इसी दिशा में करीब 10 साल पहले बायोगैस की शुरुआत की गई। धीरे-धीरे ग्रामीणों ने इसे अपनाया और आज आधे से ज्यादा घरों में गोबर गैस का उपयोग हो रहा है। सब्सिडी और सहयोग के चलते करीब 6 हजार रुपये में बायोगैस प्लांट तैयार हो जाता है, जिससे पूरे साल ईंधन की समस्या लगभग समाप्त हो जाती है।
थरौली का विकास केवल
रसोई तक सीमित नहीं रहा। गांव के 100 से अधिक लोगों ने इलेक्ट्रिक स्कूटी अपना ली
हैं,
जिससे पेट्रोल पर
निर्भरता कम हो रही है। साथ ही गांव में करीब 32 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जो क्लाउड-बेस्ड सिस्टम से जुड़े हैं और
24 घंटे निगरानी करते हैं। इसके अलावा पब्लिक एड्रेस सिस्टम को मोबाइल से जोड़ा
गया है,
जिससे किसी भी स्थान
से ग्रामीणों तक सूचना, चेतावनी
या संदेश आसानी से पहुंचाया जा सकता है।
जल संरक्षण के
क्षेत्र में भी गांव ने सराहनीय काम किया है। ग्राम प्रधान रीटा चौधरी ने एक गंदे
और उपेक्षित तालाब का पुनरोद्धार कर उसे “योगी लेक” के
रूप में विकसित किया। इस परियोजना पर करीब 22 लाख रुपये खर्च हुए, जिसमें 11 लाख रुपये मुख्यमंत्री पंचायत
पुरस्कार से मिले, जबकि
लगभग 8 लाख रुपये प्रधान ने स्वयं खर्च किए। लगभग 129 करोड़ लीटर क्षमता वाली यह
झील हर साल वर्षा जल से भर जाती है, जबकि
गांव की वार्षिक जल खपत करीब 3 करोड़ 36 लाख लीटर है। इससे स्पष्ट है कि यह झील
भूजल रिचार्ज में अहम भूमिका निभा रही है।
शिक्षा के क्षेत्र
में भी थरौली पीछे नहीं है। जिले में सबसे पहले इसी गांव में लाइब्रेरी स्थापित की
गई,
जहां छात्रों को
वाई-फाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबों की सुविधा दी गई है। यह पहल बताती है
कि गांव अब केवल खेती और पशुपालन तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि शिक्षा और अवसरों का केंद्र बन
रहा है। इसके अलावा बच्चों और युवाओं के लिए वाटर स्पोर्ट्स जैसी गतिविधियों की भी
व्यवस्था की गई है।
इन सभी प्रयासों के चलते ग्राम पंचायत थरौली को मुख्यमंत्री पंचायत पुरस्कार समेत कई सम्मान मिल चुके हैं। देश-विदेश से प्रतिनिधिमंडल इस गांव का दौरा कर इसके मॉडल को समझने आ रहे हैं। थरौली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी बड़े कॉर्पोरेट मॉडल का परिणाम नहीं, बल्कि स्थानीय संसाधनों, ग्रामीण समझ और दूरदर्शी नेतृत्व का जीवंत उदाहरण है।



