गोरखपुर
संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि भारत वह देश रहा है, जिसने विश्व को अंक ज्ञान, संगीत, शिक्षा और परिवार व्यवस्था का श्रेष्ठ मार्ग दिखाया। दुनिया को इतना सब कुछ देने वाला भारत फिर भी लगभग एक हजार वर्षों तक पराधीनता का कष्ट सहता रहा।
सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने यह अनुभव किया कि संगठित समाज ही राष्ट्र को शक्तिशाली बना सकता है, इसलिए उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। डॉ. हेडगेवार जी ने पराधीनता का विश्लेषण किया और पाया कि हिन्दू समाज का आलस्य में आ जाना, समाज की असंगठित स्थिति, आपसी भेदभाव और सामूहिक चेतना की कमी इसके प्रमुख कारण थे। उन्होंने निश्चय किया कि जाति, भाषा और ऊँच-नीच के विभेद को समाप्त कर समाज को एक सूत्र में बाँधा जाए। उन्होंने शाखा व्यवस्था के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण और समाज संगठन का महान कार्य प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे शाखाओं का विस्तार पूरे देश में हुआ और आज प्रत्येक जिले तथा सभी ब्लॉकों में संघ का कार्य पहुँच चुका है। संघ का मूल उद्देश्य किसी राजनीतिक सत्ता को प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज को संगठित कर पुनः राष्ट्र को परम वैभव पर पहुँचाना है।
उन्होंने कहा कि संघ के बढ़ते प्रभाव से भयभीत होकर विभिन्न कालखंडों में उस पर प्रतिबंध भी लगाए गए। पहला प्रतिबंध वर्ष 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद लगाया गया, परंतु सत्य सामने आने पर प्रतिबंध हटा लिया गया। दूसरा प्रतिबंध आपातकाल (1975-77) के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया, फिर भी स्वयंसेवकों ने समाज सेवा का कार्य जारी रखा। तीसरा प्रतिबंध 1992 में अयोध्या में बाबरी ढाँचा गिराए जाने के बाद लगाया गया, जो बाद में समाप्त कर दिया गया। इन सभी प्रतिबंधों के बावजूद संघ का कार्य समाज संगठन और सेवा के रूप में निरंतर आगे बढ़ता रहा।
सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि समाज के प्रत्येक वर्ग को साथ लेकर चलना और किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना संघ की मूल प्रेरणा रही है। अस्पृश्यता और छुआछूत जैसी कुरीतियों को समाप्त करने के लिए संघ ने निरंतर सामाजिक जागरण का कार्य किया। शिक्षा क्षेत्र में संस्कारयुक्त पीढ़ी निर्माण के लिए विद्या भारती जैसे विशाल संगठन की स्थापना की गई। आज विद्या भारती के विद्यालयों में लगभग 35 लाख विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं और लगभग 1,25,000 आचार्य शिक्षा दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि संघ का स्वयंसेवक किसी वेतन, पद या प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज सेवा की भावना से कार्य करता है। संघ का उद्देश्य ऐसे चरित्रवान कार्यकर्ताओं का निर्माण करना है जो समाज को स्वाभिमानी और संगठित बना सकें। प्रत्येक परिवार में अच्छे संस्कार, पुस्तकालय और सामूहिक संवाद की परंपरा विकसित करने पर विशेष बल दिया है।
परिवार के सभी सदस्य प्रतिदिन कुछ समय साथ बैठें और मोबाइल से दूरी रखकर पारिवारिक संवाद को बढ़ाएँ – यह भी सामाजिक सुदृढ़ता का महत्वपूर्ण आधार है। सामाजिक समरसता स्थापित कर यह भावना जागृत की जा रही है कि भारत माता के सभी पुत्र समान हैं, कोई छोटा या बड़ा नहीं। पर्यावरण संरक्षण के लिए पॉलिथीन का त्याग, वृक्षारोपण और स्वच्छता अभियान को जनआंदोलन बनाने का आह्वान किया गया। स्वदेशी भाव के जागरण के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का संदेश दिया। प्रत्येक नागरिक को ईमानदारी से कानून का पालन करना चाहिए।
समाज की किसी भी समस्या का समाधान संगठित समाज ही कर सकता है, इसलिए शाखा को समाज जीवन का केंद्र माना गया है। महामना मदन मोहन मालवीय और जगजीवन राम के प्रसंग के माध्यम से सामाजिक समता और सम्मान का प्रेरक संदेश दिया।
अंतिम लक्ष्य यह है कि भारत पुनः ज्ञान, संस्कृति, समरसता और संगठन के बल पर विश्व का मार्गदर्शक राष्ट्र बनकर स्थापित हो।



