गुवाहाटी, असम
शिशु शिक्षा समिति असम की विद्वत परिषद के तत्वाधान में शुक्रवार को गुवाहाटी के नेडफी भवन में ‘नमामि भारतम’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘वन्दे मातरम’ के सार्धशती (150 वर्ष) समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शिक्षा, साहित्य एवं बौद्धिक जगत से जुड़े शिक्षाविदों, विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों, आचार्यों, शोधार्थियों तथा विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ।
समारोह में विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष अवनीश भटनागर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता शिशु शिक्षा समिति असम के अध्यक्ष कुलेन्द्र कुमार भगवती ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में प्राग्ज्योतिषपुर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आर. पी. तिवारी उपस्थित रहे। विद्वत परिषद की क्षेत्रीय प्रमुख डॉ. मिलन रानी जमातिया भी मंचासीन रहीं।
विद्वत परिषद उत्तर असम के प्रभारी डॉ. ईशांकुर शइकिया ने कहा कि ‘नमामि भारतम’ कार्यक्रम का उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं राष्ट्रीय चेतना से जुड़े विषयों पर समाज में सार्थक संवाद स्थापित करना तथा विशेष रूप से युवाओं में राष्ट्रबोध को सुदृढ़ करना है।
मुख्य अतिथि डॉ. आर. पी. तिवारी ने ‘वन्दे मातरम’ के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता चेतना का प्रेरणास्रोत रहा है। इस गीत ने लाखों देशभक्तों में आत्मबल, त्याग और राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार किया तथा आज भी यह राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक अस्मिता का सशक्त प्रतीक है।
मुख्य वक्ता अवनीश भटनागर ने ‘वन्दे मातरम’ की रचना की पृष्ठभूमि, इसके साहित्यिक एवं ऐतिहासिक महत्व तथा स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों में इसकी भूमिका का विस्तारपूर्वक विवेचन किया। उन्होंने बताया कि यह गीत केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय चेतना का घोष रहा है, जिसने पराधीन भारत में स्वतंत्रता की आकांक्षा को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया।
उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ से जुड़े विभिन्न राजनीतिक घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि समय-समय पर इस गीत को लेकर अनेक प्रकार की चर्चाएँ और विवाद सामने आए, किंतु इसकी मूल भावना सदैव राष्ट्र की एकता, सांस्कृतिक गौरव और मातृभूमि के प्रति समर्पण की रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य में भी ‘वन्दे मातरम’ की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है, बल्कि युवाओं में राष्ट्रभक्ति, सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के निर्माण के लिए इसकी प्रेरणा आज भी उतनी ही आवश्यक है।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित शिक्षाविदों एवं विद्यार्थियों ने भी विषय से संबंधित अपने विचार साझा किए तथा ‘वन्दे मातरम’ की ऐतिहासिक विरासत और समकालीन महत्व पर सार्थक चर्चा की। वक्ताओं ने राष्ट्रीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन की आवश्यकता पर भी बल दिया।



