कोझिकोड, केरल
शताब्दी समारोह के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूरदर्शी मार्ग पर प्रकाश डालते हुए, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि संघ कार्य का मूल सार मानव सामाजिक पूंजी का निर्माण है—ऐसे व्यक्ति जो सामाजिक परिवर्तन के लिए समर्पित मूल्यों में निहित हों।
कोझिकोड में आरएसएस शताब्दी समारोह के अंतर्गत आयोजित 'प्रेरणा' कार्यक्रम में वे उत्तर केरल क्षेत्र के आमंत्रित युवाओं से बातचीत कर रहे थे। 700 से अधिक पंजीकृत युवाओं की सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि यह भूमि विविधतापूर्ण है, संघ का मूल विचार यही है कि हम एक अविभाज्य राष्ट्र हैं।
सरकार्यवाह जी ने श्रोताओं को महर्षि अरबिंदो की भविष्यवाणी याद दिलाई: भारत न केवल अपने लिए जागृत होता है, बल्कि विश्व के लिए एक प्रकाशस्तंभ के रूप में कार्य करने के लिए भी जागृत होता है।
कार्यक्रम में भाग लेने वाले युवाओं के प्रश्नों का उत्तर देते हुए सरकार्यवाह जी ने कहा, हम अपनी आंतरिक समस्याओं के समाधान के लिए दूसरे देशों की ओर नहीं देख सकते; हमें समाज को सशक्त बनाना होगा ताकि वह अपने स्वदेशी समाधान खोज सके। सभी गतिविधियों का आधार "राष्ट्र सर्वोपरि" का सिद्धांत है। राष्ट्र की परिभाषा केवल राजनीतिक नेताओं या प्रमुख हस्तियों से नहीं, बल्कि प्रत्येक आम नागरिक, उसके दीर्घ इतिहास, परंपराओं और उसके भौगोलिक क्षेत्र के हर एक हिस्से से होती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वयंसेवकों द्वारा स्थापित विभिन्न संबद्ध संगठन संघ के कार्य के "व्यावहारिक क्षेत्र" हैं। ये मंच जीवन के सभी क्षेत्रों के व्यक्तियों को उनकी योग्यता और समय के अनुसार राष्ट्र निर्माण में योगदान करने का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि संघ की निर्णय प्रक्रिया सामूहिक सहमति पर आधारित है, जो गतिविधि के सभी क्षेत्रों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करती है।
उन्होंने कहा कि हमें भारत की बौद्धिक परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा। विदेशी विचारों के प्रभाव से हमारी बौद्धिक परंपरा लुप्त होती जा रही थी। उन्होंने यह भी कहा कि सभी विश्वविद्यालयों में भारतीय ज्ञान पर जोर देने वाले विशेष पद शुरू किए जाने चाहिए।
संघ की सर्वोच्च प्राथमिकता राष्ट्र है। ऋषियों, देवताओं, पूर्वजों, जीवों और मनुष्यों के प्रति पाँच ऋणों के अतिरिक्त, भारतीय संस्कृति में एक सामाजिक ऋण भी है। यह समाज के प्रति एक दायित्व है। आरएसएस इसी को महत्व देता है। इस सामाजिक ऋण को पूरा करने के लिए संघ स्वयंसेवकों का सृजन करता है। स्वयंसेवक समाज के सभी क्षेत्रों में कार्यरत हैं। कार्यक्षेत्र भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, लेकिन स्वयंसेवकों का मूल विचार अपरिवर्तित रहता है। आज भारत प्रगति की ओर अग्रसर है। एक प्रगतिशील समाज को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। सरकार्यवाह ने कहा कि आरएसएस राष्ट्र के शरीर को पोषण प्रदान कर रहा है।



