आधुनिकता का आकर्षण और बचपन का भटकाव - कैलाश चन्द्र
भी आपने गौर किया है कि आज के बच्चे कब बड़े हो
जाते हैं? नहीं, उम्र से नहीं, व्यवहार से।
दसवीं कक्षा से पहले ही बालकों में स्मार्ट फोन, फिटनेस जिम,
ब्यूटी
पार्लर, सोशल मीडिया ट्रेंड्स और फैशन शो जैसे विषयों की समझ आ जाती है। यह
समझ नहीं, बल्कि एक अनकही प्रतिस्पर्धा है- जो दिखने, बनने और बिकने
की होड़ से भरी हुई है। पर क्या ये अपने आप यूं ही आ जाती है?
ये हमारे ही बच्चे हैं, जो स्कूल की
यूनिफॉर्म उतार कर इंस्टाग्राम के लिए पोज देते हैं। ये वही हैं, जो
सुबह गणित की कोचिंग के बाद शाम को जिम में 'एब्स' बनाने
जाते हैं। कहीं फैशन शो का हिस्सा बन रहे हैं, तो कहीं हेयर
स्टाइल और मेकअप के नए ट्रेंड्स पर चर्चा कर रहे हैं। प्रश्न यह नहीं कि यह सब गलत
है या नहीं- प्रश्न यह है कि क्या यह आयु, मानसिकता और संस्कार से मेल खाता है?
कहीं
हम भी यही तो नही कर रहे?
घर से विद्यालय और फिर... एक नई दुनिया का किवाड़ : बचपन में माता-पिता बच्चों को स्कूल भेजते हैं यह सोचकर कि वहां उन्हें शिक्षा मिलेगी, संस्कार बनेंगे, चरित्र निर्माण होगा। लेकिन आज की शिक्षा पद्धति में विषयों की रटंत प्रणाली और अंकों की दौड़ ने जीवन-निर्माण को पीछे धकेल दिया है। बच्चों को सिखाया जा रहा है
कि कैसे सफल बनो, कैसे नंबर लाओ, लेकिन यह कोई नहीं सिखा रहा कि कैसे अच्छा इंसान बनो, कैसे स्वयं से जुड़ो। परिस्थितियां ऐसी बन गई हैं कि मूल्य आधारित शिक्षा, जीवन कौशल और आत्मानुशासन जैसे विषय अब "पुराने जमाने की बातें" माने जाने लगे हैं। आज का बच्चा किताबों से ज्यादा यूट्यूब से सीखता है, वो गलत नहीं पर क्या सीख रहा है इसकी घर पर किसी को जानकारी नहीं ये कई बार जोखिम भरा होता है जिसके दुष्परिणाम हम समाचारों में देख रहे हैं और संस्कारों की जगह ट्रेंड्स से प्रभावित होता है।
भौतिकता के आकर्षण केंद्र : बच्चों की नई पाठशाला? : जिमखाना, ब्यूटी पार्लर, रंग-रोगन, फैशन मॉडलिंग आदि शब्दों को सुनकर पहले बड़े लोग आकर्षित होते थे। आज ये 8वीं-10वीं कक्षा के बच्चों की दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं। माँ कहती है- "बेटा थोड़ा स्टाइलिश बनो, स्मार्ट लगो।"
पापा कहते हैं "आजकल कॉन्फिडेंस दिखना चाहिए।"
और बच्चे समझते हैं-"बिना दिखे कोई पूछता नहीं!"
यहां से शुरू होता है एक "बनावटी-दिखावटी
आत्मविश्वास" का लुभावना सफर जहां सुंदरता, पहनावा, और
सोशल मीडिया की लोकप्रियता ही बच्चे के "आत्मसम्मान" का मापदंड बन जाते
हैं।
विकास या विकृति? एक आत्ममंथन जरूरी है: कई माता-पिता को यह लगता है कि उनका बच्चा आधुनिक हो रहा है खुलकर बात करता है, प्रतिक्रिया को तर्कशास्त्र मान लेते हैं। और वह अपने लुक्स का ध्यान रखता है, ट्रेंड्स में पीछे नहीं है। यह सब अच्छा हो सकता है, यदि उसमें संयम, विवेक, परिस्थिति बोध और मूल्यबोध भी साथ-साथ विकसित हो रहे हो। परंतु अधिकतर मामलों में यह देखा गया है कि बाहरी चमक के पीछे भीतरी खोखलापन पनपता है। उदाहरण के लिए 14 साल का अर्जुन, जो रोज जिम जाता है, अब किताबों से दूर होता जा रहा है।
15
साल की साक्षी, जो
मेकअप और इंस्टाग्राम रील्स में माहिर है, लेकिन परिवार की बातचीत में नहीं के बराबर जुड़ती है।
13
साल का मयंक, जो
ज्यादातर "स्वैग" में रहता है, पर आत्म-विश्वास नहीं,
"लाइक" 'प्रशंसा' की तलाश में जीता है।
ये मात्र नाम नहीं, हर गली-मोहल्ले, हर स्कूल, और हर परिवार में आज के दौर की खुली सच्चाई बन चुके हैं। समाज की भूमिका : प्रोत्साहन या प्रपंच ? : समाज ऐसे बच्चों को "प्रगतिशील", "खुले विचारों वाला", और "आधुनिक सोच वाला" कहकर सराहता है। पर क्या कभी किसी ने यह पूछा कि उनके भीतर आत्मसंवाद है अथवा बाहर परिसंवाद है या नहीं? क्या वे अपने मूल्यों से जुड़े हैं या केवल ब्रांड्स से? क्या वे दिखने में आकर्षक है या वास्तव में संतुलित और संतोषी हैं?
समाज ने भी सफलता के मापदंड बदल लिए है। जो
बच्चा अच्छी अंग्रेजी बोलता है, सेल्फी अच्छे लेता है, या
स्टाइलिश कपड़े पहनता है वह "कूल" है। और जो बच्चा पूजा करता है,
किताबें
पढ़ता है, बुजुर्गों से बात करता है वह "बोरिंग" या
"पुराना" माना जाता है।
क्या यह सचमुच बच्चों की गलती है?: कहना
आसान है कि बच्चे बिगड़ रहे हैं। पर सच यह है कि बच्चे भटक नहीं रहे, वे
दिशा नहीं पा रहे। वे वही देख रहे हैं जो हम उन्हें दिखा रहे हैं। वे वही बन रहे
हैं जो समाज उन्हें बना रहा है। वे वही चुन रहे हैं जिसे हमने उन्हें
"सफलता" का रास्ता बताया है।
बचपन में माता-पिता बच्चों को स्कूल भेजते हैं
यह सोचकर कि वहां उन्हें शिक्षा मिलेगी, संस्कार बनेंगे, चरित्र निर्माण
होगा। लेकिन आज की शिक्षा पद्धति में विषयों की रटंत प्रणाली और अंकों की दौड़ ने
जीवन-निर्माण को पीछे धकेल दिया है। बच्चों को सिखाया जा रहा है कि कैसे सफल बनो,
कैसे
नंबर लाओ, लेकिन यह कोई नहीं सिखा रहा कि कैसे अच्छा इंसान बनो, कैसे
स्वयं से जुड़ो।
एक नई शुरुआत कैसे करें? : 1.
दिखावे से ज्यादा संवाद दें: हर दिन कम से कम 15
मिनट ऐसा हो जहां बच्चा अपनी बात कह सके और अभिभावक बिना टोके, बिना
सुधार किए, बस सुनें।
2. आधुनिकता में मर्यादा सिखाएं : बच्चों को यह
समझाएं कि आधुनिकता और संस्कार एक साथ चल सकते हैं। जिम (Health Center) जाना
गलत नहीं, पर शरीर
के साथ मन, विवेक, बुद्धि और आत्मा को भी गढ़ना उतना ही
महत्त्वपूर्ण है।
3. सोशल
मीडिया से वास्तविक समाज की ओर लौटें पारिवारिक कार्यक्रम, सामूहिक भोज, दादी-नानी की कहानियां, गपशप, सम्बन्धों का महत्व आदि को भूले बिसरे नहीं, बल्कि अपनाये।
4. प्रेरणा
के नए प्रतिमान बनें महंगे गैजेट्स वाले हीरो नहीं, बल्कि परिश्रमी किसान,
ईमानदार शिक्षक, समर्पित
सेवक जैसे जीवन के नायक बनाकर दिखाएं।
5. संवाद से संबंध और संस्कार बनें: हर बच्चा सुनना चाहता है, स्वयं को समझाना चाहता है। उसके भीतर की बेचैनी को एक माँ की ममता, एक पिता का धैर्य और एक गुरु की दृष्टि ही साध सकती है। नहीं सुनते तो वो बाहर सुनाने-सुनने चला जा रहा है।
एक आत्मीय निवेदन हम सब चाहते हैं कि हमारे बच्चे सफल हों। पर केवल डिग्री, पैसा, और दिखावा ही अगर सफलता की कसौटी बनेगा तो बहुत कुछ पीछे छूट जाएगा। जिसमें आत्मीयता, आत्मगौरव और जीवन की सच्ची समझ शामिल है।
आज की आधुनिकता = उपभोक्तावादी प्रदर्शन
आवश्यक आधुनिकता = आत्म-नियंत्रण, विवेक और सृजनात्मकता के साथ नवाचार
सवाल यह नहीं है कि बच्चा जिम जाए या कला में रुचि ले, सवाल यह है कि क्या उसमें 'विवेक, संस्कार, और
कर्तव्यबोध' है?
आइए, हम सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाएं जहां बच्चे आत्मविश्वासी हों, पर दिखावे के नहीं; जहां वे आधुनिक हों, पर अपनी जड़ों से कटे हुए नहीं; जहां वे स्वतंत्र सोचें, पर संस्कारों को सींचते हुए। शरीर संवारने की होड़ है, पर आत्मा उपेक्षित है। आकर्षक दिखने की भूख है, पर आत्मचिंतन का अकाल है। आधुनिक बनने की चाह है, पर मूल्य और मर्यादा से मोहभंग है।
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