दहेज की आग में जलती बेटियां आखिर कब बदलेगा समाज ? - छाया सिंह लेखिका
हिन्दू धर्म में बेटियों को 'लक्ष्मी'
का
रूप मानते हैं। नवरात्रि में उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं, कन्या
पूजन करते हैं और शादी में कन्यादान करते ही अपने दिल के टुकड़े को दूसरे के
परिवार को सौंप देते हैं। लेकिन इसी समाज का एक घिनौना और कड़वा सच यह भी है कि,
जब यही
'लक्ष्मी' किसी के घर की बहू बनती है तो वह कुछ
दिन में दहेज के एक सामान में बदल दी जाती है। जिसकी कीमत कुछ रुपयों, गाड़ियों और सोने-चांदी से आंकी जाती
है।
हाल ही में सामने आए ट्विशा शर्मा, पलक रजक और दीपिका नागर के मामले इस
बात का जीता-जागता सबूत हैं। ये सिर्फ तीन नाम नहीं हैं, बल्कि यह हमारे खोखले होते जा रहे समाज
की उस मानसिकता का आईना हैं जहां किसी के बेटे का घर बसाने के लिए दूसरे की बेटी
को तो ले आया जाता है, लेकिन
फिर दहेज के लालच में उसकी जान ले ली जाती है।
आखिर कब तक बेटियां इस लालच की आग में जलती
रहेंगी? आखिर कब तक
न्याय की आस में सड़कें मोमबत्तियों से रोशन होती रहेंगी और अदालतें तारीखों के
बोझ तले दबी रहेंगी? लालच
की बलि चढ़ती ये मासूम जिंदगियां और आज का पढ़ा-लिखा समाज जो चांद पर पहुंचने और
डिजिटल इंडिया की बातें करता है,
वो शादी जैसे पवित्र रिश्ते को लेकर सदियों पीछे चला जाता है।
ट्विशा, पलक और दीपिका के साथ जो हुआ वह कोई नई घटना नहीं है। किसी को दहेज
के कम होने के ताने दिए गए, तो
किसी पर उसकी सास ने झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाकर उसका जीना मुहाल कर दिया। सोचने
वाली बात यह है,
जो परिवार अपने बेटे की शादी कर बड़ी धूमधाम से
अपने घर बहू लाता है, वह विदाई के अगले ही दिन से उस पर अपनी
मनमानियां क्यों थोपने लगता है? क्या शादी का मतलब एक लड़की को जिंदगी
भर के लिए प्रताड़ित करने का लाइसेंस मिल जाना है?
लड़के के घरवाले बड़े गर्व से कहते हैं कि,
हमें
कुछ नहीं चाहिए बस लड़की संस्कारों से जुड़ी होनी चाहिए। लेकिन घर आते ही फरमाइशों
की एक लंबी लिस्ट तैयार हो जाती है। जब वो लिस्ट पूरी नहीं होती तो शुरू होता है
मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का वो दौर जो अक्सर एक बेटी की मौत के साथ ही खत्म
होता है। न जाने देश में रोजाना कितनी बेटियां इस दहेज रूपी दानव के चक्कर में मौत
के घाट उतार दी जाती हैं, जिनकी चीखें चारदीवारी के बाहर तक नहीं
आ पातीं।
न्याय का अंतहीन चक्रव्यूह और समाज की बेरुखी
हमारे देश की कानून व्यवस्था और सामाजिक रवैये पर भी आज एक बड़ा सवाल खड़ा करती
हैं। जब किसी बेटी की जान चली जाती है, तब पुलिस थाने में FIR लिखवाई
जाती है, पीड़ित परिवार थाने के चक्कर काटता है, समाज के कुछ
संवेदनशील लोग और परिजन हाथों में मोमबत्तियां लेकर सड़कों पर निकलते हैं और 'जस्टिस'
के
नारे लगाते हैं और कुछ दिन में सब कुछ सामान्य हो जाने के बाद अखबार की सुर्खियां
भी बदल जाती है, लोग सब भूलकर अपनी जिंदगी में मसरूफ हो जाते
हैं। और फिर किसी और शहर में, किसी और घर में एक और ट्रिवशा, एक
और पलक या एक और दीपिका इस क्रूरता का शिकार बनती है।
दोबारा से वही मोमबत्तियां, वही
रोना-धोना और वही अंतहीन इंतजार शुरू हो जाता है। आखिर कब तक? क्या हमारा कानून इतना लाचार है कि वह
इन दरिंदों के मन में खौफ पैदा नहीं कर सकता? क्या हमारी न्याय प्रणाली इतनी धीमी है कि न्याय मिलते-मिलते
माता-पिता की आंखें ही पथरा जाती है? 'पराया
थन' से 'गर्व का प्रतीक' बनने तक का सफर गलती सिर्फ लड़के वालों
की या कानून की नहीं है, कहीं
न कहीं हमारी सामाजिक परवरिश में भी खोट है।
हाल ही में सामने आए ट्विशा शर्मा, पलक रजक और दीपिका नागर के मामले इस
बात का जीता-जागता सबूत हैं। ये सिर्फ तीन नाम नहीं है, बल्कि यह हमारे खोखले होते जा रहे समाज
की उस मानसिकता का आईना हैं जहां किसी के बेटे का घर बसाने के लिए दूसरे की बेटी
को तो ले आया जाता है, लेकिन
फिर दहेज के लालच में उसकी जान ले ली जाती है।
बचपन से ही बेटी को सिखाया जाता है, 'तुम पराए घर की अमानत हो, शादी के बाद ससुराल ही तुम्हारा असली
घर है, वहां से सिर्फ
तुम्हारी अर्थी ही निकलनी चाहिए।' हमें
लोगों की इस सोच को उखाड़ फेंकना होगा। क्यों निकले सिर्फ अर्थी? क्यों न एक बेटी सम्मान के साथ अपने
मायके लौट आए। अगर उसका ससुराल उसके जीने का हक छीन रहा हो?
माता-पिता को अपनी बेटियों को केवल बर्दाश्त करना नहीं, बल्कि विरोध करना सिखाना होगा। हमें अपनी बेटियों को इतना कमजोर नहीं बनाना है कि वे बंद कमरों में आंसू बहाएं और अंत में घुट-घुट कर मर जाएं। अब चुप रहने का वक्त नहीं है, बल्कि बेटियों को निडर बनाने का वक्त है। आज के इस दौर में हर माता-पिता को अपनी बेटियों के लिए कुछ कड़े कदम उठाने होंगे।
पढ़ाई और आत्मनिर्भरता : बेटी की शादी के लिए
पैसे जोड़ने से पहले उसकी शिक्षा और उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में पैसा
लगाएं। एक आत्मनिर्भर लड़की कभी भी किसी के अत्याचार को सहने के लिए मजबूर नहीं
होगी।
बेटियों को उनके हक के लिए लड़ना सिखाएं
बेटियों को बचपन से ही निडर बनाओ,
उन्हें सिखाओ कि चुप रहना संस्कार नहीं, बल्कि अपराध को बढ़ावा देना है। अगर
ससुराल में गलत हो रहा है, तो
आवाज पहली बार में ही उठनी चाहिए। हर बेटी को यह विश्वास होना चाहिए कि चाहे कुछ
भी हो जाए, उसके
माता-पिता का घर उसके लिए हमेशा खुला है। उसे यह डर नहीं होना चाहिए कि अगर मैं
वापस आ गई तो समाज क्या कहेगा?
'समाज तमाशा देखने के अलावा कुछ नहीं करता।
दहेज लोभियों का सामाजिक बहिष्कार : जिस परिवार
में दहेज की मांग की जाए, वहां
शादी करने से साफ इनकार कर दें। ऐसे लोगों को समाज में सिर उठाकर जीने का हक नहीं
होना चाहिए।
आइए, हम आज ही यह संकल्प लें कि हम अपने घर की बेटियों को इतना मजबूत, इतना साहसी और इतना निडर बनाएंगे कि, कोई भी दहेज का लोभी उनकी जिंदगी से
खेलने की हिम्मत न कर सके। अब मोमबत्तियां जलाने का नहीं, बल्कि समाज के इस अंधकार को मिटाने के
लिए मशाल बनने का वक्त है।
लेखिका - छाया सिंह




