पुणे, 21 जून 2026।
पुणे में आयोजित ‘नक्सलवाद: संविधान विरोधी चुनौती का अंत’ विषयक परिसंवाद में वक्ताओं ने कहा कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बने जंगलों के सशस्त्र नक्सलवाद को सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने अब पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। हालाँकि, अब विमर्श (नैरेटिव) के माध्यम से देश में अराजकता पैदा करने वाला ‘वैचारिक और शहरी माओवाद’ एक बड़ी चुनौती बनकर देश के सामने खड़ा है।
एरंडवणे स्थित सेवा भवन में आयोजित परिसंवाद में बस्तर के अध्येता और लेखक राजीव प्रसाद, महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रवीण दीक्षित और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष अभय कुलकर्णी मंच पर उपस्थित रहे। संवाद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के संसद में दिए गए भाषण का संपादित अंश ‘नक्सलवाद परास्त – अमन और विकास की सौगात’ नामक पुस्तिका का विमोचन संस्कृति प्रतिष्ठान की ओर से किया गया।
राजीव प्रसाद ने कहा, “देश में विखंडन और अराजकता पैदा करना ही माओवाद का मुख्य उद्देश्य रहा है। नक्सलवाद कभी भी कोई सामाजिक-आर्थिक समस्या नहीं थी, बल्कि उनकी वजह से ये समस्याएं पैदा हुईं। नक्सलियों ने नाबालिग बच्चों की जबरन भर्ती कर उन्हें बंदूक उठाने पर मजबूर किया। आज माओवादियों ने भले ही जंगल में बंदूकें नीचे रख दी हों, लेकिन झूठे नैरेटिव के जरिए वैचारिक क्षेत्र में आज भी सक्रिय हैं। इस झूठ को बेनकाब करने के लिए समाज को अधिक सजग होने की जरूरत है।
पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रवीण दीक्षित ने कहा, “एक समय था जब पशुपति से तिरुपति तक देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में पड़ गई थी। यह कहना सरासर झूठ है कि गरीबी के कारण नक्सलवाद बढ़ा; हकीकत यह है कि नक्सलियों ने ही आदिवासियों को विकास से वंचित रखा। चीन का समर्थन करना और भारतीय संविधान को नकारना ही माओवादियों का मुख्य काम रहा है। मानवाधिकारों के नाम पर पुलिस का मनोबल गिराने की भी कई कोशिशें हुईं।”
“अब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़कें, रेलवे, इंटरनेट और रोजगार पहुँच रहे हैं। वहाँ सुशासन का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। यदि उचित जागरूकता बरती जाए, तो ‘शहरी नक्सलवाद’ का भी जल्द ही खात्मा हो जाएगा। साथ ही, यदि किसी भी राज्य में देशविरोधी गतिविधियाँ चल रही हों, तो उन्हें रोकने के लिए केंद्रीय बलों को विशेष संवैधानिक अधिकार दिए जाने चाहिए।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सजग समाज की आवश्यकता – प्रदीप जोशी जी
अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी जी ने भविष्य की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा – अंग्रेजों ने आदिवासी और शेष समाज के बीच भेदभाव पैदा करने के लिए एक ‘अलग पहचान’ बनाने का प्रयास किया था। आज ‘डीप स्टेट’ द्वारा भारत में नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं और देशविरोधी शत्रुओं का ‘इकोसिस्टम’ बहुत गहराई तक पैठ बना चुका है। इसलिए, केवल सरकार पर निर्भर रहने के बजाय सुरक्षा के लिए समाज को भी एक कदम आगे आना होगा। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्य करते समय आदिवासियों की भागीदारी के साथ-साथ वहाँ की जातीय, सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता को समझना होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए समाज में सजगता, सक्रियता और सशक्तता लाना अनिवार्य है।
कार्यक्रम की प्रस्तावना भरत आमदापुरे ने रखी। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे अतीत में देश के 140 जिलों में प्रशासन को चुनौती देने वाला सशस्त्र नक्सलवाद समाप्त हुआ और अब ‘शहरी नक्सलवाद’ 2026 में आंतरिक सुरक्षा के लिए मुख्य चुनौती बन गया है।
कार्यक्रम में आभार प्रदर्शन अजय महाजन ने किया। कार्यक्रम का आयोजन ‘विश्व संवाद केंद्र’, ‘प्रबोधन मंच’ और ‘विवेक विचार मंच’ के संयुक्त तत्वाधान में किया गया था।