असम
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने दक्षिण असम प्रांत के प्रवास के दौरान संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लिया।
06 फरवरी 2026 को रामकृष्ण नगर में आयोजित प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन में सरकार्यवाह जी ने कहा कि संघ शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। राष्ट्र साधना के संदर्भ में सौ वर्ष का काल न तो बहुत बड़ा है और न ही बहुत छोटा। उन्होंने कहा कि एक समय भारतवर्ष “सोने की चिड़िया” के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध था। अनेक आक्रमणों और संघर्षों के बावजूद भारत एक पुण्यभूमि रहा है, जहाँ ऋषि-मुनियों की परंपरा विकसित हुई और भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण का अवतार हुआ है।
वर्ष 1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। आज संघ विश्व के सबसे बड़े सामाजिक संगठनों में से एक है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार थे, जिनमें बाल्यकाल से ही मातृभूमि के प्रति गहरी निष्ठा और देशभक्ति विद्यमान थी। कोलकाता में चिकित्सा शिक्षा के दौरान अनुशीलन समिति से जुड़े, रामकृष्ण मिशन के सेवा कार्यों में सहभागी बने तथा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रहे। डॉ. हेडगेवार जी ने संघ स्थापना से पहले और बाद में भी कारावास झेला।
भारत की समृद्ध संस्कृति, साहित्य, संगीत एवं कला परंपरा पर सरकार्यवाह जी ने कहा कि नई शिक्षा नीति में “भारतीय ज्ञान परंपरा” को शामिल किया जाना, एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम है।
पराधीन होने के कारणों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणकारियों ने भारतीय परंपरा, संस्कृति और धार्मिक चेतना को क्षति पहुँचाई। मानसिक दासता के कारण आत्मगौरव की भावना कमजोर हुई, विभाजन की नीति, साम्प्रदायिकता और जातिवाद ने समाज को कमजोर बनाया।
सरकार्यवाह जी ने कहा कि ‘संघ’ का अर्थ है देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति और हिन्दुत्व – समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन। पिछले सौ वर्षों से संघ समाज को संगठित करने और स्वदेशी चेतना जागृत करने का कार्य कर रहा है। संघ स्वयं कुछ नहीं करता, बल्कि स्वयंसेवक ही समाजसेवा के सभी कार्यों को संपन्न करते हैं।
07 फरवरी को हैलाकांडी स्थित श्रीकृष्ण सरदा कॉलेज खेल मैदान में “विशाल हिन्दू सम्मेलन एवं वैदिक शांति यज्ञ” का आयोजन किया गया। नेताजी बस्ती हिन्दू सम्मेलन आयोजन समिति द्वारा आयोजित सम्मेलन में सनातनी बंधु उपस्थित रहे। सम्मेलन का शुभारंभ विधि-विधान एवं वैदिक परंपराओं के अनुसार वैदिक शांति यज्ञ से हुआ। राष्ट्र सेविका समिति, दक्षिण असम प्रांत की बौद्धिक प्रमुख मुक्ता दास ने राष्ट्र एवं समाज निर्माण में महिलाओं की सक्रिय भूमिका पर प्रकाश डाला।
मुख्य वक्ता सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने हिन्दू समाज से एकजुट रहने का आह्वान किया तथा पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण से बचने की सलाह दी। उन्होंने अपने सांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं और आचार-विचार को अपनाकर एक नवसृजित, मूल्य-आधारित समाज के निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया।
संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त 07 फरवरी शाम को सिलचर के गुरूचरण विश्वविद्यालय के प्रेक्षागृह में प्रमुख नागरिक सम्मेलन का आयोजन किया गया। समाज के विभिन्न वर्गों के विशिष्ट नागरिकों की उपस्थिति रही। मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी रहे। मंच पर दक्षिण असम प्रांत संघचालक ज्योत्स्नामय चक्रवर्ती, सिलचर विभाग संघचालक मृदुल कुमार धर तथा मध्य कछार जिला संघचालक शेखर रंजन नाथ उपस्थित रहे।
सरकार्यवाह जी ने सारगर्भित उद्बोधन में हिन्दू धर्म की प्राचीन परंपरा, भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आधारशिला, राष्ट्रभावना तथा नागरिकों की सामाजिक एवं राष्ट्रीय जिम्मेदारियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “राष्ट्र निर्माण में सजग, चरित्रवान और जिम्मेदार नागरिकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले सौ वर्षों से समाज को एकजुट कर राष्ट्र निर्माण के इसी लक्ष्य के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।”
संघ की शताब्दी यात्रा केवल किसी संगठन का इतिहास नहीं, बल्कि सेवा भावना, आत्मनिर्भरता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दीर्घ साधना का प्रतिबिंब है। वर्तमान समय में सामाजिक विभाजन और मूल्यों के क्षरण के संदर्भ में संघ के आदर्श और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख नागरिक, शिक्षाविद, अधिवक्ता, चिकित्सक, समाजसेवी, कलाकार एवं बुद्धिजीवी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
सरकार्यवाह जी के प्रवास के तहत 08 फरवरी को सिलचर के सुभाष नगर मैदान में स्वयंसेवकों का नगर एकत्रीकरण संपन्न हुआ। नगर एकत्रीकरण में मंच पर सरकार्यवाह जी के साथ प्रांत संघचालक ज्योत्स्नामय चक्रवर्ती, विभाग संघचालक मृदुल कुमार धर उपस्थित रहे। सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने संघ की शताब्दी यात्रा के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “संघ का अर्थ ही शाखा है और शाखा ही संघ है। शाखा व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है।” उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि प्रत्येक स्वयंसेवक को शाखामुखी होना चाहिए तथा संघ को समझने के लिए नियमित रूप से शाखा में आना आवश्यक है। सरकार्यवाह जी ने स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व निर्माण, चरित्र विकास एवं संगठन की सुदृढ़ता पर बल दिया।



