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तुलसीदास और रहीम की वैचारिक समानता - नरेन्द्र भदौरिया

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तुलसीदास और रहीम की वैचारिक समानता - नरेन्द्र भदौरिया


गोस्वामी तुलसीदास अब्दुल रहीम खान से उम्र में बड़े थे। गोस्वामी जी का जीवनकाल सन् 1532 से 1623 के बीच का है।

गोस्वामी जी कुल 91 वर्ष जीवित रहे। अब्दुल रहीम खान का जन्म 1556 ईश्वी में हुआ। वह 1627 ईश्वी तक 71 वर्ष जीवित रहे। इस तरह तुलसीदास और रहीम के जीवन का समय लगभग एक है। तुलसीदास रहीम से वय में बड़े थे। पर दोनों के बीच मैत्री और आदर समझदारी पर टिकी थी। दोनों परस्पर अलग धार्मिक आस्था से जुड़े थे। विशेष बात यह समझने की है कि रहीम इस्लाम के सारे रीति रिवाज अपनाते थे पर हिन्दू संस्कृति के सिद्धान्तों से उनका गहरा नाता था। इसीलिए तुलसी और रहीम में वैचारिक समानता थी। सनातन संस्कृति के मानकों पर रहीम को भरोसा था। हिन्दुओं की धर्म के प्रति गहरी आस्था का वह आदर करते थे। दोनों के बीच समन्वय की ऐसी डोर बंधी थी कि विपरीत परिस्थितियां आने पर भी यह मैत्री बंधन कभी छिन्न नहीं हुआ। श्रीराम तुलसीदास के अनन्य थे। तो रहीम ने भी सनातन संस्कृति के अद्वैतवाद (कण कण में परमात्म शक्ति की व्याप्ति) के सिद्धान्त को अकाट्य सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया था।

रहीम ने श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों को महान आध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक के रूप में मान्य किया था। रहीम ने धर्म के बीच खाई खोदने की खुलकर निन्दा की। रहीम के मन में तुलसीदास सार्थक धर्म के एक मूर्त प्रतिमान थे। जबकि तुलसीदास का मानना था कि जिस तरह चन्दन के पेड़ में अनेक विषधर भुजंग लिपटे रहते हैं फिर भी चन्दन विषाक्त नहीं होता उसी तरह अब्दुल रहीम कितनी भी विपरीत परिस्थितियों में रहें पर उनके हृदय की पवित्रता भंग नहीं हो पायी।


जो रहीम उत्तम प्रकृति का, करि सकत कुसंग ।

चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग ।।  


गोस्वामी तुलसीदास की ख्याति उस कालखण्ड के मुगल शासक अबुल फतह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर तक अच्छी तरह पहुंच चुकी थी। अकबर को उसके निकटस्थ चुगलखोर यह भी बता चुके थे कि रहीम और तुलसी के बीच मैत्री बड़ी गहरी है। अकबर ने कई बार रहीम से कहा तुलसी को मेरे समक्ष हाजिर करो। वह हिन्दुओं के मन पर राज करने वाला कवि है। यदि उसकी कलम से मेरे प्रति लगाव का संदेश भारत के हिन्दुओं तक जाएगा तो इस देश में कोई शत्रु हमारे सामने टिक नहीं पाएगा। हिन्दुओं का भरोसा पाने की मेरी इच्छा पूरी होगी। अकबर के हठ करने पर रहीम ने एक पंक्ति का पत्र तुलसीदास को भेजा। जो इस तरह था-


सर सूखे पंष्ठी उड़, औरहि सरन समाहि।

इसका भावार्थ यह है कि एक आश्रय नहीं रहने पर दूसरा आश्रय स्वीकार कर लेना बुद्धिमत्ता कही जाती है। रहीम की पंक्ति कहती है कि श्रीराम का कालखण्ड बीत चुका है। सारी नेकियों उनमें थी। पर अब वह आपकी सहायता करने नहीं आएंगे। इसलिए आज के शासक अकबर की शरण में आ जाइए। जैसे बगुला पक्षी एक तालाब के सुख जाने पर मछलियों की खोज में दूसरे तालाब में उड़कर पहुँच जाता है। सूखे तालाब में आस लगाये बैठे रहना व्यर्य है।

गोस्वामी तुलसीदास ने जो उत्तर लिख कर रहीम को भेजा उसे उन्होंने सीधे अकबर के समक्ष पढ़ कर भावार्थ भी बता दिया। तुलसी दास ने रहीम को उत्तर दिया-

दीन मीन बिनु पच्छ के कह रहीम कत लाएं ।। 

तुलसी बाबा अपने श्रीराम को अनन्य मानते थे। उनकी आस्था विश्वास और भरोसे में तनिक भी संशय नहीं था। उन्होंने जो उत्तर दिया बहुत सटीक था। तुलसीदास ने कहा यह ठीक है कि सरोवर के सूखने पर बगुले उड़ जाते हैं। दूसरे सरोवर में पहुँच जाते हैं। पर एक बात की ओर रहीम तुम्हारा ध्यान क्यों नहीं गया कि सूखे सरोवर की मछलियां तो पंख विहीन होती हैं कहीं नहीं जाती है। वह बेचारी तो बगुलों की तरह उड़ नहीं सकती। उनको वह सूखा सरोवर अपने गर्भ में शरण देकर फिर से जलाशय भरने तक जीवित रखता है।

तुलसीदास ने इस तरह अकबर के नेत्र खोल दिये। श्रीराम को त्याग कर मुगल शासक का गुणानुवाद करने वाला चाकर कवि बनने से बाबा तुलसीदास ने साफ मना कर दिया था। प्रश्न और उत्तर की इन दो पंक्तियों को मिलाकर पढ़ने से एक दोहा बनता है। जो रहीम के दोहों के साथ लिखा मिलता है।


रहीम और जहांगीर रहीम को अकबर के मरने के बाद नये बादशाह अकबर के बेटे जहांगीर के साथ निर्वाह करना पड़ा। जहांगीर बहुत घटिया व्यक्ति था।

विलासिता और अतिशय स्त्री गमन तो मुगलों तुकों का घोषित दोष होता था। अपने बाप से बगावत करने में मुगलों को तनिक संकोच नहीं होता था। जहांगीर ने अपनी जवानी में अब्बा अकबर को बहुत अपमानित किया था। उसी तरह जहांगीर के बेटे शाहजहां ने बड़े होकर जहांगीर की नाक में दम कर दिया था। जहांगीर अफीम शराब ही नहीं हर नशा करने को आतुर रहता था।

इस दशा में महल में उत्पात करने लगता। कब किस बाँदी को पकड़ कर जिद करने लगे इससे हर दिन चिल्लाहट मचती।

बाप बेटे की तनातनी के समय की बात है। एक दिन जहांगीर ने रहीम खान को देखते ही इंगित करते हुए भरे दरबार में कहा कि तूने मेरे विरुद्ध बगावत के लिए मेरे बेटे को उकसाया है। रहीम ने संयत रहते हुए सत्य कह दिया। स्वीकार किया कि वह शाहजहां के पक्ष से सहमत हैं। यह भी बोल गये कि आपको गद्दी से हट जाना चाहिए। शासन चलाने की आपसे बेहतर कुव्वत शहजादे शाहजहां में है। आप बूढे हो चुके हैं। फिर नशे की लत ने आपको बर्बाद कर दिया है। सल्तनत का हर इंसान खासकर नौजवान कहते हैं कि जहांगीर से बेहतर हुकूमत फरजंद (बेटा) शाहजहां कर सकते हैं।

इतनी बात सुनते ही जहाँगीर को गुस्सा आ गया। वह नशे में था। तुजुक ए जहांगीरी (आत्मकथा) में जहांगीर ने स्वयं स्वीकारा है कि अफीम और शराब के नशे ने उसकी सोचने समझने की सारी क्षमता को बर्बाद कर डाला है। जहांगीर ने इस प्रसंग का भी एक जगह उल्लेख किया कि अब्दुल रहीम को दरबार में बेइज्जत करना, उसको भगा देना और उसके दो बेटों का कत्ल करा देना बहुत गलत था। यह सब जहांगीर ने अफीम के नशे में बेसुध होकर करने की स्वीकारोक्ति की थी। जहांगीर बदचलनी के अपने गन्दे चरित्र के लिए अपने अब्बा अकबर को दोषी मानता था।


जहांगीर के स्वभाव से आजिज आकर शहजादे शाहजहां ने दरबार के प्रायः हर व्यक्ति को अपने पक्ष में कर लिया था। रहीम ने उनको सचेत किया तो जहांगीर भेड़िया बनकर उनके परिवार पर टूट पड़ा।

भेजेगा। इसलिए वह चतुराई से भागे और चित्रकूट जाकर छिपकर रहने लगे। रहीम की पहली बेगम से तीन बेटे थे। उनमें से दो बेटों मिर्जा ईरीज और दाराब को जहांगीर ने अपने सामने पकड़वा कर मरवा दिया।

रहीम को जब जहांगीर ने दरबार से खदेड़ देने का आदेश दिया तो वह चले गये। उनको डर था कि जहांगीर उनके पीछे कातिल रहीम जब आगरा के दरबार से जहांगीर द्वारा होने के साथ शौकिया बहुरुपिया था। रहीम का पीछा करते कातिल गये थे पर दादू ने अब्बा के साथ खुद का देश बदल रखा था। चित्रकूट में अपने रहने की बात रहीम खान ने एक दोहे में स्वीकार करी थी।

अकेला करन मिर्जा बचा रह गया। रहीम के अन्य बीवियों भी थीं। उनसे कई बेटे बेटियां चीं। उनमें रहमान दादू ऐसा था जो इस्लामिक सलाहियत से बचता था। मुल्लाओं की उनकी झूठी बातों के लिए बहुत भला बुरा कहता था।

दरबारियों के समक्ष अपमानित किये गये और उन्हें प्राण बचाकर भागना पड़ा तो यही बेटा रहमान दादू सहायक बना था। वह चित्रकूट तक साथ गया था बहुत अच्छा तलवारबाज

चित्रकूट में रश्मि रहे, रहिमन अवच नरेश। जा पर विपदा परत है, सो आवत यहि देश।

चित्रकूट में रहीम को छिपकर रहना पड़ा था। उनको भय था कि जहांगीर अपने कूट चरित्र के हत्यारों को भेजकर उनकी हत्या करा देगा। इसीलिए अज्ञातवास की तरह उन्होंने विपदा के दिन बिताये। यह बात 1622-23 की है। छिपकर रहते हुए रहीम एक भड़‌बूजे के यहां काम करते थे। ताकि कोई पहचान नहीं पाये। उन्हीं दिनों में एक दिन रीवों के राजा ने एक भड़भूजे का भार झौंकते रहीम को देखा। राजा ने पुष्टि के लिए हाथी के हौदे पर बैठे-बैठे एक पंक्ति बोली। तो रहीम से नहीं रहा गया। यह संवाद 


सारा प्रसंग दर्शाता है।

जा के सिर पर भार अस, सो कत झोंकत भार इव ।

राजा रीवां के कथन का भाव है कि जो महान व्यक्ति बादशाह का महामंत्री होते हुए गम्भीर दायित्वों से बंधा है। सल्तनत का ऐसा सबसे प्रभावी अब्दुल रहीम खान एक भड़‌भूजे का भार क्यों झोंक रहा है। राजा रीवा ने सोचा कि रहीम ही होंगे तो प्रतिक्रिया देंगे। रहीम से सच में नहीं रहा गया। उन्होंने राजा रीवां को पहचान लिया था। राजा रीवां पर एक बार जहांगीर ने भारी देनदारी दण्ड स्वरूप थोप दी थी। राजा परेशान होकर रहीम के पास पहुँचे और मदद मांगी थी।

रहीम ने किसी तरह उनको दण्ड राशि से मुक्त कराया था। यही दोनों के बीच लगाव का मुख्य कारण था।

रहीम खान से बहुत सुन्दर उत्तर रीवां के राजा को दिया था-

रहिमन उत्तरे पार, झोंकि भार सब भार में ।।

अब्दुल रहीम खान का उत्तर स्ष्ट था कि मैंने अपना सारा भार उतार फेंका है। अब भार मुक्त हो गया हूँ। चित्रकूट से दूर राजा के महल में रहने का प्रस्ताव उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। कुछ समय बाद जहांगीर को शहजादे ने बताया था कि रहीम चित्रकूट में है। शाहजहां ने स्वयं आग्रह पूर्वक उन्हें बुला लिया था। जहांगीर से सुलह करायी थी। इस तरह रहीम ने अपने जीवन के अन्तिम समय तक जहांगीर की सेवा की। रहीम और जहांगीर दोनों 1927 में कुछ दिनों के अन्तर पर मरे थे।

चौथी पीढ़ी के शाहजहां ने गद्दी पर बैठने से पहले भाई शहरयार उनके बेटों सहित शाही परिवार के सभी आठ पुरुषों बच्चों तक को मार दिया था। इस तरह मुगलिया सल्तनत की खूनी तर्बियत (परम्परा और संस्कार) का सारा घटियापन शाहजहां में भी था। शाहजहां को इसके बेटे औरंगजेब ने जेल में डाल कर भोजन तक बन्द कर कुछ चने देता था। अपने भाई दारा को मारकर उसका कलेजा निकलवा कर अब्बा शाहजहां को भेंट में भेजा था।