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गोबर से स्वावलंबन की नई कहानी

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 ऊधमसिंह नगर, उत्तराखण्ड

एक समय था जब गोबर से घर लीपे जाते थे और इसे सबसे शुद्ध माना जाता था। आज भी इसकी उपयोगिता कम नहीं हुई है, बस नजरिया बदलने की जरूरत है। जहां कुछ लोग इसे देखकर नाक सिकोड़ते हैं, वहीं उत्तराखण्ड के काशीपुर के एक युवा ने इसी गोबर को अपने कौशल से सफलता की सीढ़ी बना दी।

यह हैं नीरज चौधरी-जिन्होंने गोबर से स्वावलंबन की एक नई राह तैयार की है। बीटीसी, टीईटी और एमएसडब्ल्यू (मास्टर ऑफ सोशल वर्क) की पढ़ाई करने वाले नीरज को एक विदेशी पुस्तक “The Devil in the Milk” से प्रेरणा मिली।  इसके बाद उन्होंने देसी गायों का पालन शुरू किया और वर्ष 2017 से गोबर से उत्पाद बनाने का काम आरंभ किया। शुरुआत लक्ष्मी-गणेश की पारंपरिक मूर्तियों से हुई, जो लगभग 400 रुपये तक बिकती थीं। धीरे-धीरे उन्होंने अपने उत्पादों की विविधता बढ़ाई- चाबी के छल्ले, दीये, दीवार घड़ियां, मूर्तियां, डिजिटल फोटो और 3D मॉडल तक बनाने लगे। आज उनके द्वारा बनाए गए लक्ष्मण झूला, बैलगाड़ी, श्रीराम मंदिर और 150 किलो का श्रीयंत्र काफी लोकप्रिय हैं। उनका बनाया 6 फीट लंबा, 4 फीट चौड़ा और 3 फीट ऊंचा केदारनाथ धाम मंदिर इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज हो चुका है।

यह केवल उत्पाद नहीं हैं, बल्कि नए भारत के युवाओं की बदलती सोच का प्रतीक हैं। नीरज के बनाए गोबर उत्पाद प्रधानमंत्री तक को भेंट किए जा चुके हैं, जिनकी नीलामी करीब 3 लाख रुपये तक पहुंची।

अपने उत्पादों में नीरज 80-90% तक गोबर का उपयोग करते हैं। इसे मजबूती देने के लिए वे प्राकृतिक सामग्री जैसे ग्वार गम (प्राकृतिक गोंद), मुल्तानी मिट्टी, चूना, मैदा और लकड़ी का उपयोग करते हैं। उनके इस प्रयास को देखते हुए काशीपुर नगर पालिका ने उन्हें ब्रांड एंबेसडर भी नियुक्त किया है। अब तक वे करीब 10,000 से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दे चुके हैं, जिससे कई परिवारों को रोजगार और आत्मनिर्भरता मिली है। काशीपुर के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ यह प्रयास आज अनेक लोगों के जीवन में आर्थिक मजबूती और आत्मविश्वास भर रहा है। यही है आत्मनिर्भर भारत की असली तस्वीर - जहां कौशल है, संकल्प है और खुद पर विश्वास है। अपने आसपास के संसाधनों को पहचानिए, उन्हें अवसर में बदलिए और देश को आत्मनिर्भर बनाने में अपना योगदान दीजिए। क्योंकि जब हर गांव आत्मनिर्भर बनेगा, तभी भारत सशक्त और समर्थ बनेगा।