• अनुवाद करें: |
विशेष

नागरिक कर्त्तव्य बोध की संस्कारशाला: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

नागरिक कर्त्तव्य बोध की संस्कारशाला: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा  


भारतीय लोकतंत्र केवल अधिकारों की संरचना नहीं है, वह कर्त्तव्यों की जीवंत परम्परा भी है। यदि अधिकार नागरिक को शक्ति प्रदान करते हैं, तो कर्त्तव्य उसे संस्कार देते हैं। अधिकार व्यक्ति को मांगना सिखाते हैं, जबकि कर्त्तव्य उसे देना सिखाते हैं। यही संतुलन भारतीय संविधान की आत्मा है। 

भारत का संविधान दुनिया का विलक्षण संविधान है। यह बहुमत और न्याय का संगम है। भारत के संविधान को संरक्षित और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट पर है। बहुमत से बनने वाली सरकार पर नहीं है। भारत में सुप्रीम कोर्ट को इतनी शक्ति प्राप्त है कि वो बहुमत से बनाए किसी कानून को भी खारिज कर सकता है। सन् 2015 में भारत की संसद द्वारा कोलोजियम को समाप्त करने के लिए बने कानून को समाप्त कर देना इसका उदाहरण है। वही दूसरी ओर भारत की संसद को भी इतना अधिकार प्राप्त है कि यदि सुप्रीम कोर्ट कोई ऐसा फैसला दे दे, जिससे जनजीवन पर नकारात्मक प्रभाव पडता हो, तो संसद उस फैसले को भी पलट सकती है। जैसे संसद द्वारा सन् 2018 में एससी-एसटी एक्ट पर संसद ने न्यायपालिका द्वारा दिए फैसले पर रोक लगा दी है।

भारतीय संविधान की यह विशेषता, जहां सुप्रीम कोर्ट या संसद कोई भी निरंकुश होने की स्थिति में नहीं है। संविधान की इस अवस्था को दुनिया में अनूठा बनाती है।

संविधान के भाग-4 (क) में वर्णित मूल कर्त्तव्य भारतीय नागरिक के चरित्र, आचरण और सामाजिक उत्तरदायित्व की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। इन्हीं कर्त्तव्यों को जीवन में उतारने की संस्कारपरक प्रक्रिया को यदि किसी संगठन ने सतत् और मौन साधना के रूप में आगे बढ़ाया है, तो वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक ऐसी संस्कारशाला, जहां शाखा के माध्यम से नागरिक कर्त्तव्य बोध केवल पढ़ाया नहीं जाता, जिया जाता है।

 जैसा कि भारतीय संविधान का प्रथम नागरिक कर्त्तव्य है- संविधान, उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के प्रति आदर। संघ की शाखा में दिन का आरंभ ही ध्वज प्रणाम से होता है। केसरिया ध्वज केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और राष्ट्रनिष्ठा का साकार रूप है। यहां स्वयंसेवक संविधान की भावना को नारे नहीं, अनुशासन और शिष्टाचार के माध्यम से आत्मसात करता है। राष्ट्रगान और देशभक्ति, गीतों के माध्यम से राष्ट्र के प्रति सम्मान भाव बाल्यकाल से ही मन में अंकुरित हो जाता है।

1- देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखे।

2- शत-शत नमन भरत भूमि को अभिनंदन भारत माँ को। 

3- चंदन है इस देश की माटी तपोभूमि हर ग्राम है।

4- राष्ट्र की जय चेतना का गान वन्देमातरम, जैसे गीत प्रत्येक भारतीय की रग- रग में राष्ट्रभक्ति का संचार करते है।

दूसरे कर्त्तव्य, स्वतंत्रता संग्राम की उच्च आदर्श परंपराओं का पालन और अनुसरण को संघ ने पूर्णतः आत्मसात किया।

संघ की स्थापना ही भारत माँ को परतंत्रता की बेड़ियों से स्वतंत्र करने के लिए हुए थी। 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव राव बलिराम हेडगेवार जी ने हिंदुत्व की रक्षा व माँ भारती को अंग्रेजों से स्वतंत्र करने के लिए संघ की स्थापना की ।

उसके पश्चात उनकी परंपरा को डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय व वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने संघ की परिपाटी को जारी रखा। संघ के बौद्धिक वर्गों में क्रांतिकारियों, संतों, समाजसुधारकों और राष्ट्रनायकों के जीवन प्रसंग केवल इतिहास नहीं, प्रेरणा बनकर प्रस्तुत होते हैं। यहां भगत सिंह का साहस, सुभाष का संगठन कौशल, गांधी का सत्याग्रह और विवेकानंद का आत्मविश्वास एक साझा विरासत के रूप में संस्कारित किया जाता है। स्वयंसेवक समझता है कि स्वतंत्रता केवल प्राप्त करने का विषय नहीं, उसे सतत् चरित्र और कर्म से सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है।

संविधान का तीसरा कर्त्तव्य भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा को संघ ने अपना मूल मंत्र माना है। ”राष्ट्र सर्वाेपरि“ है  संघ की शाखा में कूट-कूट कर भरा जाता है। देश की एकता व अखंडता पर सर्वस्व न्योछावर करने का सर्वाेत्तम उदाहरण है कश्मीर को एक करने के लिए डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान जो हमें अपने देश की एकता, अखंडता व संप्रभुता पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा देता है। यह मूल मंत्र भाषा, प्रांत, जाति या पंथ से ऊपर उठकर भारत को एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखने का दृष्टिकोण शाखा में विकसित करता है। सीमावर्ती क्षेत्रों में सेवा कार्य, आपदाओं में राहत, और सामाजिक समरसता के प्रयास राष्ट्रीय एकता को केवल विचार नहीं, व्यवहार बनाते हैं। यहां राष्ट्र की रक्षा हथियार से पहले चरित्र और एकजुटता से होती है यह बोध गहराई से बैठता है।

चौथा कर्त्तव्य देश की रक्षा और आह्वान पर राष्ट्रसेवा जिसे संघ ने अपना व्यहवार व आचरण में उतारा है।  संघ स्वयंसेवकों का जीवन स्वयंसेवा का पर्याय है। बाढ़, भूकंप, महामारी या किसी भी संकट में संघ कार्यकर्ता बिना नाम-यश की आकांक्षा के उपस्थित रहता है। यह तत्परता किसी आदेश से नहीं, संस्कार से जन्म लेती है। शाखा में खेल, दंड, योग और सामूहिक अभ्यास के माध्यम से शारीरिक-मानसिक तैयारी की जाती है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर नागरिक राष्ट्र के लिए सक्षम और सजग रहे।

जवाहरलाल नेहरू ने 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान सेना और राष्ट्र की मदद के लिए उनके योगदान की सराहना करने और उन्हें सम्मानित करने के लिए आमंत्रित किया था, जिसमें संघ के हजारों स्वयंसेवकों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में सेवाएं दी थीं और राहत कार्यों में मदद की थी, जिससे प्रभावित होकर उन्हें इस नागरिक परेड में शामिल होने का निमंत्रण मिला था। 

भारत-पाकिस्तान युद्धों (विशेषकर 1965) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका मुख्य रूप से नागरिक सहायता, मनोबल बढ़ाने और कानून- व्यवस्था बनाए रखने की थी, जहां स्वयंसेवकों ने घायल सैनिकों की सेवा, हवाई अड्डों से बर्फ हटाने और यातायात संभालने जैसे कार्य किए, ताकि सेना अपने मुख्य मोर्चे पर ध्यान केंद्रित कर सके, जिसे तत्कालीन सरकार ने सराहा और शास्त्री जी ने सहयोग का आग्रह किया था। इतना ही नही केदारनाथ, मोरबी, सुनामी और भूकंप जैसी आपदाओं में राहत कार्याे में संघ सैदव अग्रणी खड़ा दिखाई देता है।

संविधान नागरिकों से सामाजिक समरसता और भाईचारे की भावना विकसित करने का आह्वान करता है तथा स्त्रियों की गरिमा के प्रतिकूल प्रथाओं का त्याग करने को कहता है। संघ की संस्कारशाला में ‘सबका सम्मान’ जीवनमूल्य है। जाति-भेद, ऊंच-नीच या अस्पृश्यता के लिए यहां कोई स्थान नहीं। सहभोज, सामूहिक खेल और सेवा कार्य सामाजिक दूरी को स्वतः मिटाते हैं। मातृशक्ति के सम्मान का भाव संघ में ‘नारी तू नारायणी’ की भावना से पोषित होता है-जहां नारी पूजनीय, सक्षम और समाजनिर्माण की सहभागी है। संघ में राष्ट्र को भारत माता संबोधित कर गर्व का अनुभव करता है।

पांचवां महत्वपूर्ण कर्त्तव्य है भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण जिसे संघ द्वारा राम मंदिर संघर्ष असंख्य कारसेवकों के बलिदान के रूप देख सकते है। संघ भारतीय संस्कृति को संग्रहालय की वस्तु नहीं, जीवंत परंपरा मानता है। पर्व, लोकसंस्कृति, योग, संस्कृत के श्लोक, एकात्मकता सोत्र, लोकगीत और जीवनमूल्य सब मिलकर सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करते हैं। यहां आधुनिकता और परंपरा में संघर्ष नहीं, संवाद होता है। स्वयंसेवक सीखता है कि जड़ों से जुड़कर ही आकाश की ऊंचाइयों को छुआ जा सकता है।

प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और प्राणिमात्र के प्रति करुणा भी संविधान का कर्त्तव्य है। संघ के सेवा आयामों में वृक्षारोपण, जल-संरक्षण, स्वच्छता अभियान और ग्राम विकास के प्रयास निरंतर चलते हैं। प्रकृति को ‘उपभोग की वस्तु’ नहीं, ‘माता’ के रूप में देखने का दृष्टिकोण पर्यावरणीय संतुलन की चेतना जगाता है। स्वयंसेवक समझता है कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व भी राष्ट्रभक्ति का ही अंग है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन की भावना विकसित करना भी नागरिक कर्त्तव्य है। संघ की बौद्धिक परंपरा प्रश्न करने, तर्क करने और समाधान खोजने को प्रोत्साहित करती है। यहां आस्था और विवेक का संतुलन सिखाया जाता है। अंधविश्वास के स्थान पर अनुभव, अध्ययन और प्रयोग को महत्व दिया जाता है, ताकि समाज प्रगति के पथ पर आत्मविश्वास के साथ अग्रसर हो।

सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और हिंसा से दूर रहना संविधान का स्पष्ट निर्देश है। शाखा का अनुशासन नागरिक शिष्टाचार का अभ्यास है पंक्ति में चलना, समयपालन, सामूहिक उत्तरदायित्व और नियमों का पालन। यह सब सार्वजनिक जीवन में अनुशासित और शांतिपूर्ण आचरण की नींव रखते हैं। स्वयंसेवक सीखता है कि विरोध भी मर्यादा में हो और परिवर्तन भी रचनात्मक हो।

अंततः संविधान नागरिक से यह अपेक्षा करता है कि वह व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों में उत्कृष्टता के लिए प्रयत्न करे। संघ का आदर्श स्वयंसेवक ‘मैं’ से ‘हम’ और ‘हम’ से ‘राष्ट्र’ की यात्रा करता है। यहां उत्कृष्टता पद या पुरस्कार से नहीं, दायित्व और समर्पण से मापी जाती है। छोटा सा कार्य भी यदि श्रेष्ठ भाव से किया जाए, तो वह राष्ट्रनिर्माण की ईंट बन जाता है।

इस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा केवल व्यायामशाला नहीं, नागरिक कर्त्तव्य बोध की संस्कारशाला है जहां संविधान के अक्षर जीवन के संस्कार बनते हैं। यहाँ नागरिक अपने अधिकारों से पहले अपने कर्त्तव्यों को पहचानता है और समझता है कि सशक्त भारत का निर्माण संसद की दीवारों से अधिक, नागरिक के चरित्र से होता है। जब कर्त्तव्य चेतना जन-जन में जाग्रत होती है, तब लोकतंत्र केवल व्यवस्था नहीं, संस्कृति बन जाता है।