भारतीय संसद में विपक्ष का व्यवहार
लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर राष्ट्र की नाव को आगे बढ़ाते हैं। यदि सत्ता पक्ष पतवार है, तो विपक्ष उसका दिशा सूचक है जो नाव को भटकने से रोकता है। लेकिन जब दिशा सूचक स्वयं ही भटक जाए और विपक्ष का ध्येय राष्ट्रहित के बजाय हंगामा और अवरोध बन जाए, तो लोकतंत्र की नाव न केवल डगमगाती है, बल्कि जिस जनता ने उस पर विश्वास जताया है उसके लिए भी विश्वासघाती है। फिर भी विपक्ष का ये गैर जिम्मेदाराना रवैया पिछले एक दशक से जारी है। इसी क्रम में बजट सत्र 2026 में भी उसका वही चिरपरिचित हंगामें वाला अंदाज फिर एक बार इस कड़वी सच्चाई को उजागर किया है।
हंगामा की रणनीति: 28 जनवरी 2026 को शुरू होकर 2 अप्रैल तक चले इस बजट सत्र में विपक्षी दलों ने लगातार सदन की कार्यवाही बाधित की। पहले चरण में राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख की पुस्तक (जो अभी प्रकाशित भी नहीं हुई) का संदर्भ देकर सदन को घंटों ठप किया। दूसरे चरण में तो विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर संसदीय इतिहास में एक चिंताजनक अध्याय जोड़ दिया। विपक्ष का तर्क है, जब सरकार हमारी बात नहीं सुनती, तो हंगामा ही एकमात्र विकल्प है। यह तर्क सुनने में भले ही भावनात्मक लगे, परंतु तथ्यों की कसौटी पर यह खरा नहीं उतरता। क्या हंगामा करने से सरकार की जवाबदेही बढ़ी? क्या संसद ठप करने से जनता के प्रश्नों के उत्तर मिले? क्या हंगामा से देश का भला हुआ। उत्तर स्पष्ट है ‘नहीं’। हंगामा करके विपक्ष केवल सरकार को नहीं, बल्कि उसी जनता को ठेस पहुंचाई है जिसने उनको चुनकर बड़े ही विश्वास से सदन में अपनी बात रखने के लिए भेजा है।
सत्र के घटते दिन: यह समस्या केवल बजट सत्र 2026 तक सीमित नहीं है। बल्कि पिछले कुछ वर्षों से विपक्ष के तौर तरीके ने पूरे संसदीय व्यवस्था के स्वास्थ्य को चिंताजनक स्तर तक प्रभावित किया है। एक वर्ष में बजट, मानसून और शीतकालीन तीन सत्र होते हैं, परंतु सप्ताहांत और अवकाश हटाने के बाद कुल कार्य दिवस लगभग 70 से 80 दिन रह जाते हैं। लेकिन हंगामे के चलते आज यह घटकर औसतन 60 से 70 दिन तक सिमट जाता है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र की घटती जीवन शक्ति का स्पष्ट संदेश है। जब संसद कम चले और उसमें भी हंगामा हो, तो राष्ट्र का बहुमूल्य समय और संसाधन दोनों नष्ट होते हैं।
राष्ट्रहित को विमर्श का केंद्र बनाना होगा: यदि भारत को तय समय में विकसित बनना है, तो बाह्य और आंतरिक समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में उठापटक, ऊर्जा निर्भरता, सीमा सुरक्षा, कौशल विकास, आत्मनिर्भरता, कृषि उन्नयन ये सभी मुद्दे ऐसे हैं जिन पर सत्ता और विपक्ष दोनों को मिलकर राष्ट्रहित में सोचना चाहिए। विपक्ष को समझना होगा कि स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय एकता केवल सत्ता पक्ष के नारे नहीं हैं बल्कि ये भारत की आत्मा हैं। जब विपक्ष स्वदेशी उद्योगों की रक्षा और देश की सांस्कृतिक- सामरिक स्वायत्तता के प्रश्न सदन में उठाएगा, तो वह सरकार को सोचने के लिए मजबूर करने के साथ ही जनता का सच्चा पैरोकार भी बनेगा। यदि विपक्ष स्वदेशी आर्थिक नीति, ग्रामीण उद्योगों का पुनरुद्धार और ‘मेक इन इंडिया’ की वास्तविक समीक्षा को अपनी संसदीय रणनीति का केंद्र बनाए, तो वह एक ऐसी विरासत छोड़ेगा जो राष्ट्र को दिशा देगी। लेकिन जब विपक्ष आंतरिक रूप से बंटा हो, क्षेत्रीय और दलगत स्वार्थों से संचालित हो, तो वह राष्ट्रीय एकता का संदेशवाहक कैसे बनेगा? विपक्ष को यह समझना होगा कि राष्ट्रीय एकता के विषयों पर चाहे वह सीमा सुरक्षा हो, आतंकवाद हो, या बाहरी आर्थिक दबाव सत्ता पक्ष के साथ मिलकर खड़े होना कमजोरी नहीं, परिपक्वता का प्रतीक है जो विपक्ष राष्ट्रीय संकट में भी केवल राजनीति करता है, वह जनता की नजर में विश्वसनीयता खो देता है।
तथ्य, तर्क और दृष्टि हो असली ताकत: देश दुनिया में सफल लोकतंत्रों का इतिहास बताता है कि महान विपक्षी नेताओं ने सत्ता को तथ्यों से, तर्कों से और वैकल्पिक नीतियों की स्पष्ट दृष्टि से घेरा न कि शोर शराबे से। भारत में भी डॉ. राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर जैसे नेताओं ने विपक्ष की भूमिका को उसकी ऊंचाई दी। उनका विरोध व्यक्तिगत नहीं, वैचारिक था। उनकी आलोचना विनाशकारी नहीं, रचनात्मक थी। आज के विपक्ष को उसी परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा। जब कोई विपक्षी सांसद बजट के आंकड़ों की गहन पड़ताल कर सरकार को घेरे, जब कोई सांसद किसी विधेयक की कमियां संसदीय शालीनता के साथ उजागर करे, जब विपक्ष का कोई नेता एक वैकल्पिक आर्थिक दृष्टिपत्र लेकर सदन में उपस्थित होगा तभी विपक्ष जनता का सच्चा विश्वासपात्र बनेगा। ऐसे में विपक्ष को स्वयं ही एक आचार संहिता अपनानी होगी और यह तय करना होगा कि किन मुद्दों पर हंगामा उचित है और किन पर चर्चा।
एक मजबूत विपक्ष, एक मजबूत भारत: भारतीय लोकतंत्र को आज एक ऐसे विपक्ष की आवश्यकता है जो हंगामे को नहीं, हौसले को अपना हथियार बनाए। जो सदन में तथ्यों से गरजे, स्वदेशी और राष्ट्रीय एकता को अपनी चर्चा का केंद्र बनाए और हर नीति को राष्ट्रहित की कसौटी पर परखे। जब विपक्ष यह समझ लेगा कि उसकी असली शक्ति जनता के विश्वास में है, हंगामे में नहीं तब वह न केवल एक अच्छे विपक्ष की भूमिका निभाएगा, बल्कि एक बेहतर भारत बनाने का भागीदार भी बनेगा। क्योंकि अंततः, राष्ट्र न किसी एक दल का है, न किसी एक विचारधारा का राष्ट्र उन 140 करोड़ भारतीयों का है जो एक समृद्ध, सुरक्षित और स्वाभिमानी भारत का स्वप्न देखते हैं। और उस स्वप्न को साकार करने की जिम्मेदारी सत्ता और विपक्ष दोनों की बराबर है। तभी 2047 तक विकसित भारत का संकल्प सिद्धि में बदलेगा।




