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पेयजल गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंताएं

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पेयजल गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंताएं  

दूषित कहें या फिर जहरीले पानी की आपूर्ति का मसला अकेले इंदौर, गांधीनगर तक ही सीमित नहीं रहा है, इस समस्या से कमोबेश समूचा देश जूझ रहा है। जहां तक देश की राजधानी दिल्ली का सवाल है, वह भी दूषित पेयजल की समस्या से अछूती नहीं है। यहां के निवासियों को भी साफ और शुद्ध पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। अनुमान है कि राजधानी की लगभग 30 प्रतिशत आबादी ऐसे पानी का उपयोग करने को विवश है जो स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप नहीं है। गौरतलब है कि स्वच्छ पेयजल में टीडीएस की आदर्श मात्रा 300 से 350 पी पी एम के बीच है जिसमें 100 से 150 पी पी एम सबसे अच्छा मानक माना जाता है। जबकि 500 से अधिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और जब टीडीएस 2000 पीपीएम से ऊपर पहुंच जाये तो पानी पीने योग्य नहीं रहता। दिल्ली में टीडीएस की मात्रा सामान्यतः 900 के पार है। उदाहरण के तौर पर भलस्वा डेरी क्षेत्र के एक घर में पानी में टीडीएस 968 पाया गया। ऐसी स्थिति में दूषित जल विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।

दूषित पानी में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए जोखिमपूर्ण होते हैं। इसके अलावा फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और अन्य रासायनिक तत्व भी गंभीर स्वास्थ्य प्रभाव डाल सकते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार दूषित जल के कारण बार-बार दस्त, पेट दर्द, बच्चों में कुपोषण और विकास संबंधी समस्याएं सामने आती हैं। लंबे समय तक दूषित पानी के सेवन से लिवर, किडनी और हड्डियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हाल के वर्षों में राजधानी के अस्पतालों में डायरिया, टाइफाइड, हेपेटाइटिस, पेट संक्रमण और बच्चों में डिहाइड्रेशन के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है। एम्स दिल्ली में सामुदायिक चिकित्सा विभाग के डा. संजय राय की मानें तो पानी में मिले हैवी मैटल शरीर के हरेक अंग के लिए हानिकारक हैं। इनसे किडनी डैमेज होने, हृदय रोग के अलावा त्वचा और लम्बे समय तक शरीर में इनके पहुंचने पर कैंसर भी हो सकता है। यह बेहद चिंताजनक स्थिति है।

असलियत में यहां के लोग हर साल दूषित पेय जल की समस्या से दो-चार होते हैं। आज भी यहां जनकपुरी, भलस्वा, चंद्र नगर, अशोक नगर, नारंग कालोनी आदि अनेक इलाकों के लोग दूषित पेयजल मिलने से परेशान हैं। जनकपुरी ए ब्लाक का गंदे पानी की आपूर्ति का मामला अभी भी राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) में विचाराधीन है। एन जी टी की सख्ती के बाद अब कहीं जाकर दिल्ली जल बोर्ड ने सुध ली है और इस इलाके की दशकों पुरानी और छतिग्रस्त पाइप लाइन बदलने का काम शुरू किया है। दिल्ली जल बोर्ड का पानी अक्सर दूषित आता है, इसमें दो राय नहीं है। फिर घरों में पहुंचने वाले पानी की सही ढंग से जांच भी नहीं होती है, इसी वजह से जलजनित बीमारियों का हर समय खतरा बना रहता है। पूर्वी दिल्ली और पुरानी दिल्ली के कुछ इलाकों में बदबूदार या दूषित पानी की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। कई लोग पीने और खाना बनाने के लिए आरओ, टैंकर या बोतलबंद पानी पर निर्भर हैं, जिससे निजी जल आपूर्ति बाजार का विस्तार भी हुआ है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक शुद्ध आरओ पानी भी खनिजों की कमी के कारण स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता।

भूजल प्रदूषण भी राजधानी के लिए एक गंभीर चुनौती है। लैंडफिल साइटों के आसपास भूजल की गुणवत्ता प्रभावित हुई है, जिससे बड़ी आबादी स्वच्छ जल से वंचित है। विधायी और प्रशासनिक मंचों पर भी इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की गई है। पुरानी पाइपलाइन व्यवस्था, जल रिसाव, और जल आपूर्ति नेटवर्क की जर्जर स्थिति को इस समस्या के प्रमुख कारणों में माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार जल आपूर्ति प्रणाली के आधुनिकीकरण और निरंतर रखरखाव की आवश्यकता है। दिल्ली सरकार के जल मंत्री प्रवेश वर्मा ने भी माना है कि दिल्ली में 2800 किलोमीटर लम्बी और तीन दशक से भी पुरानी जर्जर पाइप लाइन से पेयजल दूषित हो रहा है। पानी की बर्बादी का भी यही अहम कारण है। उनका कहना है कि लम्बे समय से स्वच्छ जल उपलब्ध कराने की दिशा में काम नहीं किया गया। यह समस्या पूर्व सरकारों की लापरवाही, वर्षों की उपेक्षा, अनिर्णय और देरी का नतीजा है। अब राजधानी की पानी की पुरानी पाइप लाइन बदली जायेंगी। इनके बदलने से दूषित पानी की समस्या दूर होगी और जल रिसाव में भी कमी आयेगी। बीते 11 महीनों में हमने इस समस्या के समाधान हेतु काफी कदम उठाये हैं। दिल्ली सरकार और जल बोर्ड केन्द्र सरकार के सहयोग से हर घर तक स्वच्छ एवं सुरक्षित, समान और निरंतर 24 घंटे जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। दिल्ली की समस्या राजनीति से नहीं, नीति और नीयत से सुलझेगी। 

यद्यपि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार राजधानी के अधिकांश घरों तक नल से पानी पहुंचता है, फिर भी कई अनधिकृत कॉलोनियों और झुग्गी बस्तियों में नियमित और सुरक्षित जल आपूर्ति की व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कुछ क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता और नियमितता दोनों ही असंतोषजनक बताई जाती हैं।

गौरतलब है कि 2024 में कुल मिलाकर 90,833 मौतें हुयीं जिसमें तकरीबन 24 फीसदी यानी 21,427 मौतें सीधे-सीधे संक्रामक और परजीवी रोग के कारण हुयीं। 2023 में यह आंकड़ा 28.66 फीसदी और 2022 में 26.39 फीसदी रहा है। जाहिर है यह खतरनाक स्थिति है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाये गये तो आने वाले समय में स्थिति और भी भयावह हो जायेगी। यह हालत तब है जबकि दिल्ली में दूषित पानी की आपूर्ति के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट और एनजीटी कई बार अपनी नाराजगी जता चुके हैं और आनंद विहार, योजना विहार, जनकपुरी में दूषित पानी का मामला अदालत तक जा पहुंचा है। 

यद्यपि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार राजधानी के अधिकांश घरों तक नल से पानी पहुंचता है, फिर भी कई अनधिकृत कॉलोनियों और झुग्गी बस्तियों में नियमित और सुरक्षित जल आपूर्ति की व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कुछ क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता और नियमितता दोनों ही असंतोषजनक बताई जाती हैं।

जल गुणवत्ता की निगरानी के लिए नमूनों की जांच की जाती है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षण प्रणाली की पारदर्शिता और मानकीकरण अत्यंत आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं से परीक्षण और स्वतंत्र तकनीकी अध्ययन की आवश्यकता पर भी बल दिया जा रहा है। जल और सीवर नेटवर्क के सुधार के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं, लेकिन इनका प्रभावी और पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

देखा जाये तो बीती 22 दिसम्बर से 26 दिसम्बर के बीच लिये 7129 पानी के नमूनों में 100 से ज्यादा फेल पाये गये हैं। अब कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में जापान इंटर नेशनल कोआपरेशन एजेंसी और अन्य विशेषज्ञ तकनीकी ऐजेंसियों से जलापूर्ति नेटवर्क का अध्ययन कराया जायेगा। उसकी रिपोर्ट के बाद कदम उठाया जायेगा। सरकार का दावा कि राजधानी में पानी व सीवर की व्यवस्था सुधारने हेतु 68 विधान सभा क्षेत्र में 734 करोड़ की राशि दी गयी है। जानकारी है कि केंद्र सरकार ने राजधानी के हर घर में पेयजल व सीवर लाइन नेटवर्क उपलब्ध कराने के लिए व जलस्रोतों की दशा सुधारने हेतु अमृत 2 योजना के तहत 2800 करोड़ आवंटित किये हैं और 800 करोड़ की लागत से अनधिकृत कालोनियों में सीवर नेटवर्क मजबूत किया जायेगा। 

वास्तविकता यह है कि दिल्ली में दूषित पेयजल आपूर्ति और जल अपव्यय की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। राजधानी में जल शोधन संयंत्रों से लिए गए कुछ नमूनों के गुणवत्ता मानकों पर खरे न उतरने की जानकारी सामने आई है, जिससे जल गुणवत्ता निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं। केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन योजना के अंतर्गत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए यह आवश्यक है कि जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाएं एनएबीएल से मान्यता प्राप्त हों, ताकि परीक्षण आंकड़ों की विश्वसनीयता, सटीकता और प्रामाणिकता सुनिश्चित की जा सके। हालांकि उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार दिल्ली में जल आपूर्ति और अपशिष्ट जल की जांच से जुड़ी कुछ प्रयोगशालाओं को अभी एनएबीएल की मान्यता प्राप्त नहीं है। इससे जल गुणवत्ता परीक्षण प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ एवं मानकीकृत बनाने की आवश्यकता स्पष्ट होती है। ऐसे में राजधानी में सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जल परीक्षण अवसंरचना, संस्थागत समन्वय और गुणवत्ता निगरानी तंत्र को मजबूत किए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है, ताकि नागरिकों को स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित जल उपलब्ध कराया जा सके।