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क्या भारत अपने असली "आइसमैन" को भूल गया?

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क्या भारत अपने असली "आइसमैन" को भूल गया?

लद्दाख में जल संरक्षण और बर्फ आधारित नवाचारों की चर्चा होते ही आज कुछ चुनिंदा नाम सबसे पहले याद किए जाते हैं। लेकिन क्या हम उस व्यक्ति को भूल गए, जिसने दशकों पहले इस दिशा में ऐसा काम किया था जिसने हजारों किसानों की जिंदगी बदल दी?
वह नाम है चेवांग नॉर्फेल।
1935 में लेह के एक साधारण परिवार में जन्मे चेवांग नॉर्फेल ने श्रीनगर के अमर सिंह कॉलेज में पढ़ाई की और 1960 में लखनऊ से सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया। उसी वर्ष उन्होंने जम्मू-कश्मीर ग्रामीण विकास विभाग में अपनी सेवाएं शुरू कीं। नौकरी के दौरान उन्होंने लद्दाख के गांवों की सबसे बड़ी समस्या को करीब से देखा—जब किसानों को अप्रैल और मई में सिंचाई के लिए पानी चाहिए होता था, तब प्राकृतिक ग्लेशियर अभी नहीं पिघलते थे। जून-जुलाई में पानी आता था, लेकिन तब तक खेती का महत्वपूर्ण समय निकल चुका होता था।
इसी समस्या ने उन्हें समाधान खोजने के लिए प्रेरित किया।

एक दिन उन्होंने देखा कि पेड़ की छांव में गिरता पानी धीरे-धीरे जमकर बर्फ बन जाता है। यहीं से उनके मन में विचार आया कि यदि सर्दियों में बहने वाले पानी की गति कम करके उसे गांवों के पास छोटे-छोटे बांधों में रोका जाए, तो वह कृत्रिम ग्लेशियर का रूप ले सकता है। गर्मियों में यही बर्फ पिघलकर किसानों को समय पर पानी उपलब्ध कराएगी।
1987 में चेवांग नॉर्फेल ने अपना पहला आर्टिफिशियल ग्लेशियर बनाया। इसके बाद उन्होंने ऐसे 15 कृत्रिम ग्लेशियर विकसित किए। इनसे हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि को लाभ मिला और अनेक गांवों में खेती की स्थिति बेहतर हुई। जिस व्यक्ति को कभी लोग "पागल" कहकर हंसते थे, उसी के काम ने लद्दाख में जल संरक्षण की नई दिशा दिखाई।
उनके योगदान के लिए उन्हें 2015 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनके जीवन पर White Knight नामक डॉक्यूमेंट्री भी बनी, जिसे कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शित किया गया।
आज लद्दाख में बर्फ आधारित जल संरक्षण की नई तकनीकों और परियोजनाओं की चर्चा होती है, जो स्वागत योग्य है। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि क्या इस क्षेत्र की नींव रखने वाले चेवांग नॉर्फेल को उतनी पहचान मिली, जिसके वे वास्तव में अधिकारी थे?
इतिहास का सम्मान तभी पूरा होता है, जब नए नवाचारों के साथ-साथ उन अग्रदूतों को भी याद रखा जाए जिन्होंने सबसे पहले रास्ता बनाया। चेवांग नॉर्फेल का नाम केवल एक पुरस्कार तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारत के जल संरक्षण और हिमालयी नवाचार के इतिहास में उनका स्थान अग्रणी वैज्ञानिकों और नवप्रवर्तकों के बीच है।
समय आ गया है कि देश उनके योगदान को व्यापक रूप से जाने, पढ़े और याद रखे। किसी भी महान उपलब्धि का इतिहास तभी पूर्ण होता है, जब उसके वास्तविक अग्रदूतों को भी उनका उचित सम्मान और श्रेय मिले।