कुशल नेतृत्व और सही रणनीति से भारत बना ‘दुनिया की फार्मेसी’
इतिहास में एक कथा प्रचलित है कि जब बख्तियार खिलजी बीमार पड़ा था तब पूरे अरब के हकीम उसे ठीक नहीं कर पाये थे, लेकिन नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य राहुल श्रीभद्र की दवाई खाते हीं वह स्वस्थ्य हो गया था। भारतीय औषधि की इस अदभुत क्षमता से वह बेहद प्रभावित हुआ था। यह वो समय था जब पूरी दुनिया में अरब साम्राज्य की तूती बोलती थी और भारत पर भी मुस्लिम शासकों का कत्लेआम जारी था। कहा जाता है कि बख्तियार खिलजी को इस भारतीय चिकित्सा और औषधीय क्षमता से इतनी ईर्ष्या हुई कि उसने नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट करने का आदेश दे दिया।
नालंदा विश्वविद्यालय के पतन के साथ हीं भारत के ज्ञान परंपरा में ठहराव सा आ गया। पहले मुस्लिम शासकों और बाद में अंग्रेजों ने साम्राज्यवादी ज्ञान को भारत पर जबरन थोपने की कोशिश की। लेकिन करीब हजार साल के उस साम्राज्यवादी आतंकी बौद्धिकता को तोड़कर भारत ने अब कई क्षेत्रों में नया कीर्तिमान स्थापित कर लिया है। हम फिर से चिकित्सा और औषधीय (फार्मास्युटिकल) उद्योग में नेतृत्वकारी भूमिका में आ रहे है।
भारत अब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के औषधीय उद्योग को दिशा दे रहा है। अमेरिका के मैरीलैंड में 3 से 6 मई 2026 को आयोजित ‘सेलेक्ट यूएसए इन्वेस्टमेंट समिट’ में भारतीय कंपनियों ने अमेरिकी बाजार में 1.7 ट्रिलीयन रूपये (20.5 बिलियन डॉलर) के इन्वेस्टमेंट की घोषणा की। इसमें निवेश का सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय औषधीय उद्योग (फार्मास्युटिकल सेक्टर) से आना है। भारतीय औषधीय कंपनियां अमेरिका में रिसर्च और डेवलपमेंट और दवा बनाने की सुविधाओं में लगभग 19.1 अरब डॉलर का निवेश करेगी। अमेरिका ने भारतीय कंपनियों के इस कदम को ‘ऐतिहासिक क्षण’ बताया।
भारतीय औषधीय उद्योग अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा औषधीय उद्योग बन चुका है। अब हम जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा वैश्विक आपूर्तिकर्ता हैं। दुनिया भर में 20 प्रतिशत से अधिक जेनेरिक दवाएं और 60 प्रतिशत से अधिक टीके (वैक्सीन) अब भारत सप्लाई करता है।
मीडिया के साथ बातचीत के दौरान, वाणिज्य विभाग के संयुक्त सचिव, श्री मोहित यादव ने उल्लेख किया कि पिछले 12 वर्षों में, भारतीय फार्मास्युटिकल क्षेत्र एक रणनीतिक क्षेत्र और राष्ट्रीय गौरव के स्रोत के रूप में उभरा है। भारत को आज व्यापक रूप से ‘दुनिया की फार्मेसी’ के रूप में मान्यता प्राप्त है, यह एक ऐसी प्रतिष्ठा है जो बड़े पैमाने पर उत्पादन, गुणवत्ता, सामर्थ्य और विश्वसनीय आपूर्ति के माध्यम से अर्जित की गई है। यह क्षेत्र 2014 के लगभग 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2026 में लगभग 60 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हो गया है और 2030 तक इसके 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है। भारत का फार्मास्युटिकल निर्यात वित्त वर्ष 2015 के 14 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में लगभग 31 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है, जिसने 7.4 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) दर्ज की है, अब 2030 तक 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का लक्ष्य है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कम लागत होना भारत की सबसे बड़ी ताकत है। भारतीय जेनेरिक दवाओं ने दुनिया भर के लाखों लोगों के लिए इलाज तक पहुँच को संभव बनाया है। भारत वॉल्यूम के हिसाब से दवाओं का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, वैश्विक जेनेरिक दवाओं की मांग का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा आपूर्ति करता है और 200 से अधिक देशों में दवा उत्पादों का निर्यात करता है। भारत के दवा निर्यात का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कड़े नियामक बाजारों में जाता है।
भारत सरकार के कुशल नेतृत्व ने इस उद्योग को एक नयी दिशा दी है। औषधीय उद्योग के लिए ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम’ (PLI स्कीम) के तहत कुल मिलाकर 42,600 करोड़ रुपये से ज़्यादा का निवेश आया है। इस स्कीम से 3,43,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिक्री हुई है और 1.13 लाख से ज्यादा लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। इन पहलों ने घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत किया है, आयात पर निर्भरता कम की है और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विजन को आगे बढ़ाते हुए दुनिया की औषधीय उद्योग (फार्मेसी) के तौर पर भारत की स्थिति को और मजबूत किया है।
औषधीय (फार्मास्युटिकल) उद्योग के बढ़ते कदम का लाभ भारत के आम जनता को भी मिल रहा है। रसायन और उर्वरक मंत्रालय के तहत फार्मास्यूटिकल्स विभाग के अनुसार, प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना का विस्तार 2014 में लगभग 84 जन औषधि केंद्रों से बढ़कर 2026 तक पूरे देश में 19,200 से ज्यादा केंद्रों तक हो गया है। विभाग ने यह भी कहा कि इस पहल से लोगों को किफायती दामों पर अच्छी क्वालिटी की जेनेरिक दवाएं मिली हैं और नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में 40 हजार करोड़ रुपये से ज़्यादा की बचत करने में मदद मिली है।
भारत की यह उपलब्धि आम नहीं है क्योंकि कोविड के दौरान औषधीय उद्योग ने न केवल लाखों भारतीयों की जान बचाई बल्कि पड़ोसी देशों का विश्वास भी जीता। हमें इस दिशा में और अधिक निवेश और इनोवेशन पर ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि ‘दुनिया की फार्मेसी’ दुनिया के सभी लोगों को अच्छी क्वालिटी की सस्ती दवा उपलब्ध करा सके।




