• अनुवाद करें: |
मुख्य समाचार

सहफसली खेती से बदली शीलू देवी की जिंदगी

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

गोंडा, उत्तर प्रदेश

गाँव की पगडंडियों से निकलकर खेत तक पहुँचने वाली साधारण सी महिला अब पूरे इलाके में चर्चा का केंद्र है। नाम है शीलू देवी जिन्होंने मिट्टी से वह सब कर दिखाया, जिसे लोग अकसर सपनों में ही सोचते हैं। जहाँ लोग अकसर कहते हैं कि खेती में अब लाभ नहीं रहा, वहीं शीलू देवी ने साबित कर दिया कि खेती घाटे का सौदा नहीं अपितु सूझबूझ और मेहनत से चलाया जाने वाला सफल व्यापार है। शीलू देवी ने अपने खेत में एक अनोखा प्रयोग किया। उन्होंने तोरई और बैंगन की सहफसली खेती शुरू की। तोरई बेल पर चढ़कर ऊपर की जगह घेर लेती है और बैंगन जमीन पर फैलकर अपनी दुनिया बना लेता है। नतीजा यह हुआ कि न तो दोनों फसलों में से एक का भी नुकसान हुआ और न ही खेत की जगह बेकार गई अपितु दोनों फसलों ने मिलकर खेत को सोना उगलने वाला खजाना बना दिया। शीलू देवी बताती हैं कि उन्होंने एक बीघा जमीन पर यह खेती शुरू की। कुल खर्च आया करीब 20 हजार रुपये और आमदनी पहुँची सीधी 80 से 90 हजार रुपये तक। इतना ही नहीं, तोरई जल्दी तैयार होकर तुरंत बिक जाती है और बैंगन महीनों तक फल देता रहता है। यानी पूरे सीजन में लगातार कमाई। शीलू देवी कहती हैं 'पहले मैं सोचती थी कि खेती से गुजारा मुश्किल है, पर जब सहफसली खेती अपनाई तो लगा कि असली खजाना तो हमारी मिट्टी में ही छुपा है।' उनका यह प्रयोग अब गाँव के दूसरे किसानों को भी आकर्षित कर रहा है। कई किसान उनकी खेती देखने आते हैं और सीखकर अपने खेतों में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। शीलू देवी की मेहनत ने यह साबित कर दिया है कि खेती केवल परंपरा से चलने वाली प्रक्रिया नहीं है। इसमें अगर नवाचार और विज्ञान जुड़ जाए तो छोटी सी जमीन भी बड़े परिवार का सहारा बन सकती है। खेती में समझदारी और प्रयोग ही असली पूँजी है। आज शीलू देवी केवल सब्जियां नहीं उगा रहीं अपितु वह आशा, आत्मनिर्भरता और प्रेरणा की फसल भी बो रही हैं। उनकी कहानी हर किसान के लिए एक सीख है की जमीन छोटी हो या बड़ी, असली कमाई नवाचार से होती है।