नारी शक्ति वंदन अधिनियम: शिक्षा से आगे, अब सत्ता तक - ऋचा सिंह
राष्ट्र-चिंतन केवल सीमाओं, अर्थव्यवस्था और विकास-दरों का प्रश्न नहीं है; यह इस बात का भी प्रश्न है कि देश की नीतियां किन अनुभवों, किन आवाजों और किन जीवन-यथार्थों से बन रही हैं। जब किसी लोकतंत्र में आधी आबादी की भागीदारी निर्णय-निर्माण की केंद्रीय संस्थाओं में सीमित रह जाती है, तब विकास का ढांचा भी अधूरा रह जाता है। भारत में महिलाएं लंबे समय से शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, श्रम, परिवार, समुदाय और सामाजिक संरक्षण के क्षेत्र में वास्तविक जिम्मेदारियां निभाती रही हैं, पर राजनीतिक सत्ता-संरचना में उनका प्रतिनिधित्व उसी अनुपात में नहीं बढ़ सका। इसी ऐतिहासिक असंतुलन को दूर करने की दिशा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम है।
यह अधिनियम केवल सीटों का आरक्षण नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र को अधिक प्रतिनिधिक, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक व्यावहारिक बनाने की दिशा में एक संरचनात्मक हस्तक्षेप है। लंबे समय तक महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को प्रतीकात्मक समर्थन मिला, पर संस्थागत अवसर नहीं मिले। परिणाम यह हुआ कि महिलाएं मतदान में सक्रिय होने, प्रशासन, शिक्षा, सेना, विज्ञान, उद्यमिता और स्थानीय नेतृत्व में अपनी क्षमता सिद्ध करने के बावजूद संसद और विधानसभाओं में पर्याप्त संख्या तक नहीं पहुंच पाईं। इसलिए यह प्रश्न अब केवल ”महिलाओं को अवसर देने“ का नहीं, बल्कि लोकतंत्र को उसके वास्तविक अर्थ तक पहुंचाने का है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बराबरी का वादा, पर प्रतिनिधित्व का अभाव - भारत ने स्वतंत्रता के साथ ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अपनाया। संविधान ने अनुच्छेद 14, 15 और 16 के माध्यम से समानता, भेदभाव-निषेध और अवसर की समानता का वादा किया। अनुच्छेद 15(3) ने राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति भी दी। इसके बावजूद, लोकतंत्र की सर्वाेच्च निर्वाचित संस्थाओं में महिलाओं की उपस्थिति बहुत धीमी गति से बढ़ी।
पहली लोकसभा (1952) में कुल 489 सदस्यों में केवल 22 महिलाएं निर्वाचित हुई थीं, यानी लगभग 4.5 प्रतिशत। कई दशकों बाद 17वीं लोकसभा (2019) में 78 महिलाएं चुनी गईं, जो कुल 543 सदस्यों का लगभग 14.4 प्रतिशत है। यह प्रगति महत्त्वपूर्ण अवश्य है, पर यह भी स्पष्ट करती है कि सात दशकों से अधिक समय में भी संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी उनके जनसंख्या अनुपात के आसपास नहीं पहुंच सकी। यही स्थिति अधिकांश राज्य विधानसभाओं में भी दिखाई देती है, जहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व लंबे समय तक औसतन लगभग 10 प्रतिशत के आसपास ही रहा।
यह स्थिति इसलिए और भी गंभीर लगती है क्योंकि स्थानीय निकायों में आरक्षण ने बिल्कुल अलग तस्वीर प्रस्तुत की। 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद पंचायतों और नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था हुई, जिससे लाखों महिलाओं को पहली बार औपचारिक राजनीतिक नेतृत्व का अवसर मिला। विभिन्न सरकारी आंकड़ों के अनुसार पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या 14 लाख से अधिक रही है। इस अनुभव ने यह साबित किया कि अवसर मिलने पर महिलाएं केवल निर्वाचित ही नहीं होतीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं को भी बदलती हैं।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम क्या है: सितंबर 2023 में संसद ने महिलाओं के लिए लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान करने वाला संविधान संशोधन पारित किया, जिसे सामान्यतः नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है। यह अधिनियम संविधान का 106वाँ संशोधन है। इसके तहत महिलाओं के लिए सामान्य सीटों के साथ-साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षित वर्गों के भीतर भी एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
हालांकि, इसका क्रियान्वयन तत्काल प्रभाव से चुनावों में स्वतः लागू नहीं हो जाता; अधिनियम के अनुसार यह व्यवस्था अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ी हुई है। इसलिए इस कानून का राजनीतिक महत्व दो स्तरों पर समझना चाहिए- पहला, यह महिलाओं की विधायी भागीदारी को संवैधानिक मान्यता देता है; दूसरा, यह भविष्य के प्रतिनिधित्व ढाँचे को बदलने की दिशा तय करता है।
केवल शिक्षा नहीं, सत्ता में भागीदारी क्यों आवश्यक है: अक्सर यह माना जाता है कि महिलाओं का सशक्तिकरण शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अवसरों तक सीमित है। निस्संदेह, शिक्षा सशक्तिकरण का आधार है; पर केवल पढ़-लिख लेने से शक्ति-संतुलन नहीं बदलता, जब तक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में बराबर भागीदारी न हो। नीति-निर्माण वह स्थल है जहां यह तय होता है कि सार्वजनिक धन कहां खर्च होगा, किस मुद्दे को प्राथमिकता मिलेगी, किन अधिकारों को कानूनी संरक्षण मिलेगा, और कौन-सी समस्याएं ”निजी“ कहकर टाल दी जाएंगी।
पानी, स्वच्छता, पोषण, मातृ स्वास्थ्य, विद्यालयी अवसंरचना, क्रेच, सार्वजनिक परिवहन, कार्यस्थल सुरक्षा, लैंगिक हिंसा, वेतन असमानता, देखभाल-आधारित श्रम, घरेलू काम का बोझ, ये सभी मुद्दे महिलाओं के जीवन से सीधे जुड़े हुए हैं। जब निर्णय-निर्माण के मंचों पर महिलाओं की उपस्थिति कम होती है, तब इन मुद्दों का स्थान भी अक्सर नीतिगत प्राथमिकताओं में नीचे चला जाता है। इसलिए सत्ता में भागीदारी कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक न्याय का आवश्यक तत्व है।
शिक्षा की प्रगति और उसकी सीमाएं: भारत में महिलाओं की शिक्षा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, पर यह सुधार भी बहुत लंबी और कठिन यात्रा का परिणाम है। 1951 की जनगणना में महिला साक्षरता दर लगभग 8.9 प्रतिशत थी। 2011 की जनगणना तक यह बढ़कर लगभग 65.5 प्रतिशत हो गई। यह परिवर्तन निश्चय ही ऐतिहासिक है, पर इसके भीतर क्षेत्रीय असमानताएं, ग्रामीण-शहरी विभाजन, जातीय और वर्गीय अंतर अब भी मौजूद हैं।
उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और हाल के वर्षों में कुल नामांकन अनुपात में महिलाओं की हिस्सेदारी कई क्षेत्रों में बेहतर हुई है। अधिक सावधान और तथ्यसंगत बात यह है कि उच्च शिक्षा में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है।
आर्थिक भागीदारी: अवसर और अवरोध - राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी को महिलाओं की आर्थिक स्थिति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2022-23 के अनुसार भारत में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर में पिछले वर्षों की तुलना में सुधार हुआ है, पर पुरुषों की तुलना में अंतर अभी भी बड़ा है। प्रचलित सरकारी आंकड़ों के अनुसार महिलाओं की श्रम भागीदारी लगभग 37 प्रतिशत और पुरुषों की लगभग 78 प्रतिशत के आसपास रही।
भारत की महिलाएं बड़ी मात्रा में घरेलू और देखभाल-आधारित अवैतनिक कार्य करती हैं। टाइम यूज सर्वे ने यह स्पष्ट किया है कि महिलाओं द्वारा घरेलू सेवाओं और परिवार-देखभाल में लगाया जाने वाला समय पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक है। इसलिए किसी महिला की आर्थिक भागीदारी का आकलन केवल वेतनभोगी कार्य से नहीं किया जा सकता। समाज जिस श्रम पर रोज चलता है, उसका एक बड़ा हिस्सा महिलाओं के अदृश्य, अवैतनिक और कम-मूल्यांकित काम पर टिका है।
कृषि में भी महिलाओं की भूमिका केंद्रीय है, पर भूमि और संपत्ति पर उनका अधिकार सीमित है। कृषि जनगणना और संबंधित अध्ययनों से यह स्पष्ट है कि महिलाओं के नाम पर परिचालन जोतों का अनुपात पुरुषों की तुलना में काफी कम है। इसलिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल यहां फिर लौट आता है। यदि भूमि, श्रम, आजीविका, सामाजिक सुरक्षा और देखभाल-अर्थव्यवस्था से जुड़े निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाएँ पर्याप्त संख्या में होंगी, तभी इन मुद्दों को संरचनात्मक प्राथमिकता मिल सकेगी।
पंचायत से संसद तक: अनुभव क्या कहता है: महिलाओं के लिए राजनीतिक आरक्षण का सबसे मजबूत तर्क भारत का अपना स्थानीय अनुभव है। पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों में आरक्षण ने यह मिथक तोड़ा कि महिलाएं चुनाव जीत नहीं सकतीं, प्रशासन नहीं समझ सकतीं, या नेतृत्व की क्षमता नहीं रखतीं। अनेक अध्ययनों ने दिखाया है कि महिला नेतृत्व स्थानीय शासन में पेयजल, शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, सड़क, स्वच्छता और समुदाय-आधारित समस्याओं के समाधान को अधिक प्रमुखता दे सकता है।
यह भी सच है कि स्थानीय स्तर पर कई जगह ‘सरपंच पति’ या प्रॉक्सी नेतृत्व जैसी चुनौतियां सामने आईं। पर यह चुनौती आरक्षण की विफलता नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना की प्रतिक्रिया है। समय के साथ बड़ी संख्या में महिलाओं ने इन सीमाओं को तोड़ा और स्वतंत्र नेतृत्व स्थापित किया। इसी अनुभव ने यह आधार दिया कि यदि स्थानीय निकायों में महिलाएं प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं, तो संसद और विधानसभाओं में भी उनका प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए।
यह अधिनियम क्यों आवश्यक था: महिला आरक्षण के पक्ष में केवल नैतिक तर्क ही नहीं, व्यावहारिक तर्क भी अत्यंत मजबूत हैं। पहला, स्वैच्छिक राजनीतिक सुधार पर्याप्त नहीं रहे। राजनीतिक दल लंबे समय तक महिला सशक्तिकरण की बात करते रहे, लेकिन टिकट वितरण में महिलाओं को सीमित अवसर दिए गए। यदि दल स्वेच्छा से संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर पाते, तो संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या अब तक कहीं अधिक होती।
दूसरा, प्रतिनिधित्व स्वयं नीति को प्रभावित करता है। यह मानना सरल होगा कि कोई भी निर्वाचित प्रतिनिधि हर मुद्दे पर समान रूप से संवेदनशील होगा; पर व्यवहार में अनुभव, सामाजिक स्थिति और जीवन-यथार्थ नीतिगत प्राथमिकताओं को प्रभावित करते हैं। महिलाओं की पर्याप्त उपस्थिति से कानून निर्माण, संसदीय बहस, समितियों की सक्रियता और बजटीय प्राथमिकताओं में परिवर्तन की संभावना बढ़ती है।
तीसरा, लोकतंत्र में वैधता का प्रश्न। यदि देश की लगभग आधी आबादी निर्णय लेने वाली संस्थाओं में लगातार कम प्रतिनिधित्व में रहे, तो लोकतंत्र औपचारिक रूप से तो पूर्ण दिख सकता है, पर प्रतिनिधिक दृष्टि से अधूरा रहेगा। लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं, बल्कि सत्ता-संरचना में न्यायपूर्ण सहभागिता भी है।
संभावित प्रभाव: केवल संख्या नहीं, शासन की दिशा में बदलाव: इस अधिनियम का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि अधिक महिलाएं सदनों में पहुंचेगीं; असली महत्व इस संभावना में है कि शासन की भाषा और प्राथमिकताएं बदलेगीं। जब अधिक संख्या में महिला विधायक और सांसद होंगी, तो संसद और विधानसभाओं की बहस में रोजमर्रा के वे प्रश्न अधिक स्पष्ट होकर आएंगे जिन्हें अक्सर निजी या गौण मान लिया जाता है।
सावधानी की ज़रूरतरू केवल आरक्षण से सब कुछ नहीं बदलेगा: इस अधिनियम का स्वागत करते हुए कुछ जरूरी सावधानियां भी समझनी होंगी। पहली, इसका क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन से जुड़ा है, इसलिए इसके वास्तविक प्रभाव के लिए प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पूरा होना आवश्यक है। दूसरी, महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल संख्या तक सीमित न रह जाए; विविध सामाजिक पृष्ठभूमियों, ग्रामीण, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग, श्रमिक, पेशेवर, युवा महिलाओं को भी नेतृत्व अवसर मिलें। तीसरी, दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और महिला नेतृत्व-निर्माण के बिना आरक्षण का लाभ सीमित हो सकता है।
शिक्षा से सत्ता तक खुलता हुआ रास्ता: भारत में महिलाओं की यात्रा शिक्षा, श्रम, सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी के अनेक पड़ावों से होकर गुज़री है। शिक्षा ने चेतना जगाई, रोजगार ने आत्मनिर्भरता की आकांक्षा दी, स्थानीय निकायों ने नेतृत्व का प्रशिक्षण दिया, और अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम राष्ट्रीय तथा प्रांतीय स्तर की सत्ता-संरचना में साझेदारी का संवैधानिक आधार देता है।
इसलिए यह कानून दया का परिणाम नहीं, बल्कि देर से मिले लोकतांत्रिक न्याय का परिणाम है। यह महिला को केवल लाभार्थी या प्रतीक भर नहीं रहने देता, बल्कि उसे विधायी और नीतिगत निर्णयों की सक्रिय भागीदार के रूप में स्थापित करने का मार्ग खोलता है। जब लोकतंत्र की संस्थाओं में महिलाओं की उपस्थिति उनकी जनसंख्या, उनके श्रम, उनके अनुभव और उनके योगदान के अधिक निकट पहुंचेगी, तभी ”हम भारत के लोग“ का भाव अधिक पूर्ण अर्थ ग्रहण करेगा।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि राष्ट्र का भविष्य तब अधिक संतुलित, अधिक मानवीय और अधिक दूरदर्शी बनता है, जब शिक्षा से सशक्त हुई महिला सत्ता में भी सहभागी बनती है। शिक्षा विचार बदलती है, पर सत्ता व्यवस्था बदलती है। और जब विचार और व्यवस्था दोनों में महिला की समान हिस्सेदारी सुनिश्चित होती है, तभी वास्तविक लोकतांत्रिक समानता का मार्ग प्रशस्त होता है।
लेखक- ऋचा सिंह, शासकीय शिक्षिका, कुशीनगर




