श्रीनगर में 36 वर्ष बाद खुला रघुनाथ मंदिर - डॉ. विनीत उत्पल
श्रीनगर के हब्बा कदल-फतेह कदल (डाउन टाउन श्रीनगर) स्थित रघुनाथ मंदिर के कपाट मार्च, 2026 में रामनवमी के अवसर पर आम लोगों के लिए खुल गए। कश्मीरी हिन्दू परिवार ने परिसर में काफी धूमधाम से पूजा-अर्चना की। मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रों का उच्चारण हुआ, हवन किये गए और भजन-कीर्तन भी हुए। शहर में इस्कॉन की सहायता से राम दरबार की झांकी निकाली गई, शोभा यात्रा निकली और वह शहर के क्लॉक टावर से होकर भी गुजरी। हालाँकि अभी मंदिर में भगवान राम की मूर्ति स्थापित नहीं हुई है। बावजूद इसके फूलों और रंग-बिरंगी रोशनी से पूरे मंदिर को सजाया गया।
वर्ष 1989 से 1992 के बीच इस मंदिर पर कई आतंकी हमले हुए। उसी दौरान मंदिर के आसपास रहने वाले कश्मीरी पंडितों ने अपनी पुस्तैनी घरों को औने-पौने दाम में स्थानीय लोगों के हाथों बेच दिया और यह मंदिर कूड़ा घर में तब्दील हो गया। आतंकियों ने इस मंदिर को तबाह कर दिया था, आग लगा दी थी और मूर्तियों को तोड़कर विस्ता यानी झेहलम (झेलम) नदी में बहा दिया था। स्थानीय लोग कहते हैं कि आतंकियों ने हिन्दुओं को मंदिर में पूजा करने से मना किया था लेकिन जब भक्तों ने आना बंद नहीं किया तो पूरे मंदिर में आग लगा दी और उसे तोड़ दिया गया और लूटपाट की। स्थानीय लोग कहते हैं कि आतंकी निजाम-ए-मुस्तफा का नारा देते हुए मंदिर में घुसे थे। मंदिर से लूटी गई 23 कीमती मूर्तियों, चांदी, सोने के आभूषणों तथा लाखों रुपये के अन्य बहुमूल्य सामान का पता पुलिस भी नहीं लगा पाई।
घाटी के रघुनाथ मंदिर का निर्माण कार्य वर्ष 1835 में महाराज गुलाब सिंह ने शुरू की थी, उनके निधन के बाद यह काम उनके पुत्र और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराज रणबीर सिंह ने की और यह 1860 में बनकर तैयार हुआ। यह मंदिर झेलम नदी के बाएं तरफ है और यह मंदिर पहाड़ की चोटी यानी शिखर की शैली में बना हुआ है। इसमें जम्मू के रघुनाथ मंदिर परिसर की वास्तुकला शैली की झलक दिखती है। यह मंदिर पारम्परिक कश्मीरी स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें पत्थर की संरचना और जटिल नक्काशी है और कश्मीरी हिंदू मंदिरों की तरह एकल-शिखर शैली का है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 1585 मीटर (5200 फुट) की ऊंचाई पर स्थित है।
मंदिर के गर्भगृह में भगवान् राम (रघुनाथ) और सीता की मूर्तियां थी। यह मंदिर डोगरा शासकों की वैष्णव परंपरा और धार्मिक संरक्षण नीति का प्रतीक रहा और कश्मीर में हिन्दू धार्मिक संरचनाओं को सुदृढ़ किया। यहां दैनिक पूजा, आरती और रामायण का पाठ लगातार होता था। रामनवमी और दीपावली जैसे त्योहारों के मौके पर पूजा का विशेष आयोजन किया जाता था और मेला लगता था। पूरे शहर में झांकियां निकलती थी और हर मंदिर या मोहल्ले के अपनी-अपनी झाकियां हुआ करती थी। श्रीनगर का ऐतिहासिक यह मंदिर कश्मीर में हिंदू धर्म के लोगों के सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों के एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था।
इस मंदिर परिसर में स्कूल, धर्मशाला और एक बड़ा पुस्तकालय भी था। मंदिर के पश्चिमी दीवार के पास एक बालिका विद्यालय था जिसका नाम रुपा देवी शारदापीठ स्कूल लड़कियों का स्कूल था। यह झेलम किनारे स्थित था। स्कूल के पीछे एक थियेटर हॉल था जहां वहां नाटक का मंचन होता था। इस मंदिर परिसर में दो बड़ा मैदान था जहां आसपास के लोग क्रिकेट, फुटबॉल खेलते थे और झेलम नहीं में तैरने के लिए आते थे। पुराने स्थानीय लोग लख्ते हैं कि रविवार के दिनों में लोग नदी नाव से पारकर मंदिर के विशाल प्रांगण में क्रिकेट खेलने जाया करते थे। इस परिसर का देखभाल दीनानाथ जी किया करते थे। मंदिर के पुस्तकालय में कई अमूल्य पांडुलिपियां और धर्मग्रंथ भी थे।
गौरतलब है कि हब्बा कदल के निकट रघुनाथ मंदिर मोहल्ला है, वहीं कर्णनगर के नजदीक एक स्कूल है जिसका नाम है हाईस्कूल रघुनाथ मंदिर। स्थानीय और पुराने लोग अपने सोशल मीडिया पर इस रघुनाथ मंदिर के बारे में लिखते रहे हैं और वे पुराने दिनों को याद भी करते रहे हैं। झेलम नदी में आने वाले बाढ़ से मंदिर परिसर और धर्मशाला को होने वाली क्षति सहित मंदिर के आस-पास रहने वालों को शिद्दत से अपने शब्दों में बयां करते हुए लिखते हैं, ”नदी के निचले हिस्से में उस गली के बाद पहला घर, जिसे सहारों से टिकाया गया था, एक बाढ़ में क्षतिग्रस्त हो गया था. बाढ़ का पानी धर्मशाला के देवघर के मेहराब से थोड़ा ऊपर तक पहुंच गया था और वास्तव में कुछ खिड़कियों से रिस्ते हुए धर्मशाला और भवन के भीतर आ गया। इसके बाद भवन की मरम्मत की गई। भूतल को उसी अवस्था में छोड़ दिया गया और वहां कश्मीरी हस्तशिल्प का एक प्रसिद्ध आउटलेट खोला गया। यहां अक्सर पर्यटक आते थे जो प्रथम पुल (आईएसटी ब्रिज) से सातवें पल तक नाव की सवारी करते थे। दूसरे सहारों से टिकाई गई संरचना में भी कश्मीरी चांदी और धातुशिल्प की कारीगिरी की गई थी। बिना सहारे वाले घर एक प्रसिद्ध अभियंता के स्वामित्व में था। इससे दो घर नीचे कोच के घर के आसपास गंजू हाउस का शोरूम था, जो कश्मीरी कालीनों के व्यापर और निर्माण के अग्रदूत माने जाते थे। मंदिर की दीवार के किनारे कौल, मोजा और राजदान परिवारों के घर थे।
मंदिर की स्थिति को लेकर सुनील टिक्कू अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखते हैं- रघुनाथ मंदिर की जर्जर स्थिति की ओर अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए मुझे पांच वर्ष लग गए। स्थानीय निवासियों, जिन्होंने इस क्षेत्र के पंडितों के घर खरीद लिए थे, उन्होंने मंदिर को कूड़ा घर में बदल दिया था। सुनील टिक्कू स्थानीय मंदिर समिति के कोषाध्यक्ष हैं, जिसके अध्यक्ष भरत शर्मा हैं। स्थानीय लोग कहते है कि कश्मीरी पंडित एम.के. राजदान ने मंदिर समिति के सहयोग से मंदिर के आसपास के समस्त कचरे को हटवाया।
वर्ष 2020 में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इस मंदिर के जीर्णाेद्धार का काम शुरू किया। जम्मू-कश्मीर पर्यटन विभाग ने रेनोवेशन प्रोजेक्ट के लिए भारतीय राष्ट्रीय कला और संकसरिति ट्रस्ट (इंटेक) का सहयोग लिया और मंदिर का जिम्मा संभालने वाली समिति ने भव्य रामनवमी के साथ मंदिर के पुनः उद्घाटन का आयोजन किया। गौरतलब है कि भगवान् राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्ति बनाने के आदेश पश्चिम बंगाल के कोलकाता के कारीगरों को दिए गए हैं और मूर्ति मंदिर के जीर्णाेद्धार का कार्य पूर्ण होने पर स्थापित किया जायेगा।
लेखक - डॉ. विनीत उत्पल, मीडिया अकादमिक, जम्मू




