हिसार, 18 जनवरी 2026
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में पंजाबी भवन, हिसार में प्रमुख नागरिक गोष्ठी का आयोजन हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं “वंदे मातरम्” के सामूहिक गायन से हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कर्नल देवेंद्र गुहानी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय सेना आज पहले से कहीं अधिक सशक्त और निर्णायक हुई है। “पहले हम देश के लिए मरते थे, आज हम देश के शत्रुओं को मारते हैं।” अपने सैन्य जीवन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि सेना में रहते हुए उन्होंने कई भटके हुए उग्रवादियों को सही मार्ग दिखाया। सेवानिवृत्ति के पश्चात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से राष्ट्रसेवा में निरंतर सक्रिय हैं।
मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह सरकार्यवाह अरुण कुमार जी ने कहा कि संघ का शताब्दी वर्ष उत्सव का नहीं, बल्कि आत्मावलोकन का काल है। इस वर्ष का लक्ष्य है – उन वर्गों तक पहुँचना, जहाँ अभी तक पहुँचा नहीं गया और समूचे समाज को एक सूत्र में बाँधना। उन्होंने कहा कि संघ की यात्रा व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की यात्रा है।
एक समय भारत की संस्कृति विश्व के शिखर पर थी, फिर भी देश को हजार वर्षों के संघर्ष क्यों झेलने पड़े – इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए डॉ. हेडगेवार ने समाज की चार मूल कमजोरियों को पहचाना।
पहली – व्यक्ति का चरित्र तो श्रेष्ठ था, किंतु राष्ट्र की कल्पना कमजोर हो गई थी। हजारों वर्षों तक हमारी पहचान “भारत माँ की संतान” के रूप में थी, परंतु आक्रांताओं के समय संगठित राष्ट्रभाव के अभाव में हम रजवाड़ों के रूप में बँटकर लड़े।
दूसरी – विशुद्ध राष्ट्रभक्ति का अभाव। संघर्षों में पराजय का कारण प्रायः आंतरिक विश्वासघात रहा। डॉ. हेडगेवार ने “राष्ट्र प्रथम” का विचार दिया और बताया कि देशभक्ति केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार है।
तीसरी – अनुशासन और संगठन का अभाव। वेदों में उल्लिखित राष्ट्रभाव – एक भाव, एक आवाज और एक लक्ष्य – को समाज ने त्याग दिया, जिससे आत्मगौरव क्षीण हुआ और पराधीन मानसिकता बढ़ी। स्वतंत्रता के बाद भी दूसरों की भाषा और संस्कृति को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति बनी रही।
चौथी – व्यक्ति निर्माण और ‘हम कौन हैं’ की चेतना का अभाव।
इन्हीं चार आधारों पर डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना की और शाखा के माध्यम से व्यक्ति निर्माण की नींव रखी।
अरुण कुमार जी ने कहा कि संघ की राह कभी आसान नहीं रही – संघर्ष, उपहास और विरोध के बीच तपकर संघ निखरा। संघ किसी को विरोधी नहीं मानता, इसलिए आज उसके विरोधी भी उसके साथ खड़े हैं। उन्होंने जयप्रकाश नारायण का उल्लेख करते हुए कहा कि “यदि कोई संगठन मेरे संकल्प को पूरा कर सकता है, तो वह केवल संघ है।”
कश्मीर में एक देश, एक संविधान, एक प्रधान की मांग को लेकर संघ के सत्याग्रह, तथा हर आपदा और आवश्यकता के समय स्वयंसेवकों की सेवा-भावना का भी उल्लेख किया। संघ ने कभी अपने कार्यों का श्रेय नहीं लिया – यही उसकी विशेषता है। संघ का मानना है कि हर नागरिक को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार, स्वास्थ्य और संस्कार मिलना चाहिए। जहाँ-जहाँ समाज में कमी है, वहाँ संघ राष्ट्र सेवा भाव से कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि “प्रत्येक व्यक्ति का दर्द मेरा दर्द है” – यही भारत की आत्मा रही है, और इसीलिए भारत विश्व में श्रेष्ठ था, संपन्न था।
उन्होंने पंच परिवर्तन पर कहा कि केवल चर्चा से नहीं, बल्कि जीवनशैली में छोटे-छोटे व्यवहारिक परिवर्तनों से ही वास्तविक परिवर्तन संभव है। राष्ट्र के नियमों और कानूनों का पालन, ‘स्व’ का बोध और अपनी जड़ों को गौरव के साथ अपनाना ही गौरवमयी जीवन का मार्ग है।
जिज्ञासा समाधान सत्र में प्रश्नों के उत्तर देते हुए अरुण कुमार जी ने कहा कि जाति शब्द मूलतः राष्ट्रबोध से जुड़ा था, भेदभाव की विकृति विदेशी प्रभावों से आई। कई सामाजिक समस्याएँ हमारे महापुरुषों ने समाप्त कीं, शेष को समाज के सहयोग से समाप्त करना होगा।



