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‘जाति’ भेद को व्यवहार से हटाने के पहले लिए मन से निकालना होगा – डॉ. मोहन भागवत जी

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छत्रपति संभाजीनगर, 17 जनवरी 2026

प्रमुख जन संगोष्ठी में सरसंघचालक जी का प्रबुद्ध नागरिकों से संवाद

संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित प्रमुखजन गोष्ठी में उपस्थित प्रबुद्ध नागरिकों ने अपनी जिज्ञासाएँ लिखित रूप में प्रस्तुत कीं, जिनका समाधान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने विस्तारपूर्वक किया। इस अवसर पर मंच पर प्रांत संघचालक अनिल भालेराव जी उपस्थित रहे।

सरसंघचालक जी ने कहा कि जाति भेद को व्यवहार से समाप्त करना है, तो सबसे पहले उसे मन से निकालना होगा। प्राचीन काल में व्यवसाय और कार्य के आधार पर जातियां निर्माण हुई, किंतु कालांतर में वही समाज से चिपक गई और आगे चलकर जातिगत भेदभाव की शुरुआत हुई। आज के समय में जातिवाद का मूल कारण जातिगत अहंकार है। इसलिए जातिभेद को समाप्त करने के लिए जाति न देखने की मानसिक आदत डालनी होगी। यदि यह कार्य सभी लोग प्रामाणिकता से करें, तो आने वाले दस–बारह वर्षों में जातिगत भेदभाव समाप्त हो सकता है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में विजय राठी ने प्रस्तावना प्रस्तुत की। अहिल्याताई धायगुडे एवं छत्रसाल पांडव ने व्यक्तिगत गीतों का गायन किया और केतकी जोशी की आवाज़ में कल्याण मंत्र के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

उपस्थित नागरिकों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए सरसंघचालक जी ने कहा, “संघ व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। संघ किसी प्रतिक्रिया से उत्पन्न संगठन नहीं है और न ही उसकी किसी से प्रतिस्पर्धा है। संघ का उद्देश्य संपूर्ण समाज के साथ मिलकर भारत को परम वैभवशाली बनाना है। संघ स्वयं बड़ा होना नहीं चाहता, बल्कि समाज को बड़ा बनाना चाहता है। संघ समाज में किसी एक संगठन का निर्माण नहीं, बल्कि पूरे समाज के संगठन का कार्य करता है। एक समय ऐसा आना चाहिए, जब पूरा समाज संघ के विचारों के अनुसार कार्य करने लगे, तब संघ की अलग पहचान भी शेष नहीं रहेगी। यही संघ की अपेक्षा है। इसलिए यदि संघ को समझना है, तो संघ की शाखा में आना चाहिए”।