महिलाओं के लिए आदर्श हैं सरोजिनी नायडू
बहुआयामी व्यक्तित्त्व की धनी सरोजिनी नायडू भारत एवं विश्व भर में महिलाओं के लिए एक आदर्श हैं। उनकी जीवटता, साहस, समर्पण और नेतृत्त्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है।
भारत कोकिला (नाइटिंगेल ऑफ इंडिया) नाम से विख्यात सरोजिनी नायडू एक राजनीतिक कार्यकर्ता, नारीवादी, कवयित्री थीं। और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली व भारतीय राज्य की राज्यपाल नियुक्त होने वाली पहली भारतीय महिला थीं। भारतीय इतिहास में सरोजिनी नायडू का साहित्य से लेकर स्वत्रतंत्रता संग्राम तक अविस्मरणीय योगदान रहा है। साथ ही उनकी अहम भूमिका रही महिला सशक्तिकरण में, अपने संपूर्ण जीवन में उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए बहुत से कार्य किए और समाज में जागरूकता पैदा करने का प्रयास किया। यही कारण है कि भारत में हर साल 13 फरवरी को सरोजिनी नायडू की जयंती को ‘राष्ट्रीय महिला दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। उनके द्वारा महिलाओं के हित में किए गए प्रयास में निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं।
विधवाओं के अधिकार: 1908 में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन के 22वें सत्र में, सरोजिनी नायडू ने विधवाओं के लिए शैक्षिक सुविधाओं, महिला घरों की स्थापना और विधवाओं के पुनर्विवाह में बाधाओं को दूर करने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव उनके द्वारा उस समय रखा गया जब समाज में ये विषय विवादास्पद माना जाता था।
मत देने का अधिकार: 1917 में, सरोजिनी नायडू ने एनी बेसेंट और अन्य के साथ महिला भारतीय संघ (डब्ल्यूआईए) की स्थापना की। डब्ल्यूआईए का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को वोट देने का अधिकार प्राप्त करना था। उन्होंने महिलाओं के लिए समान अधिकारों की वकालत करने के लिए लंदन में एक महिला मतदान अधिकार प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया और महिलाओं के मताधिकार के लिए अंतरराष्ट्रीय आंदोलन में भी शामिल हुईं।
समानता का अधिकार:उन्होंने 1925 के सत्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षता की, जिससे वह कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी नियुक्ति को ‘भारतीय नारीत्व के प्रति एक उदार श्रद्धांजलि’ माना। 1926 में, उनके नेतृत्व में महिला आंदोलन को पहली सफलता तब मिली, जब महिलाओं को नामांकन द्वारा विधायिका के सदस्यों के रूप में नियुक्त किया गया।
प्रतिनिधित्व का अधिकार: उन्होंने कई महिला संगठनों के द्वारा देश में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने महिला सम्मेलन के पटना सत्र को संबोधित करते हुए पर्दा प्रथा के खिलाफ बात की और महिलाओं को घूंघट छोड़ने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने तलाक के अधिकार के लिए भी अभियान चलाया।
नमक सत्याग्रह में भूमिका: सन् 1930 के प्रसिद्ध नमक सत्याग्रह में सरोजिनी नायडू गांधी जी के साथ चलने वाले स्वयंसेवकों में से एक थीं। गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद गुजरात में धरासणा में लवण-पटल की पिकेटिंग करते हुए जब तक स्वयं गिरफ्तार न हो गईं, तब तक वह आंदोलन का संचालन करती रहीं। धरासणा वह स्थान था जहां पुलिस ने शान्तिमय और अहिंसक सत्याग्रहियों पर घोर अत्याचार किए थे। सरोजिनी नायडू ने उस परिस्थिति का बड़े साहस के साथ सामना किया और अपने बेजोड़ विनोदी स्वभाव से वातावरण को सजीव बनाये रखा। बाद में गांधी जी को सन् 1931 में लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन में आमंत्रित किया गया। उस समय गांधी जी के साथ, सम्मेलन में शामिल होने वाले अनेक लोगों में से सरोजिनी नायडू भी थीं। उनका जीवन प्रेरणादायक था। आने वाली पीढ़ियां उन्हें प्रेरणास्रोत के रूप में याद करती रहेंगी। जैसा कि गांधी जी ने कहा था कि सच्चे अर्थों में वह ‘भारत कोकिला’ थीं। 2 मार्च सन् 1949 को उनकी मृत्यु हो गई। अपनी एक कविता में उन्होंने मृत्यु को कुछ देर के लिए ठहर जाने को कहा था।
मेरे जीवन की क्षुधा, नहीं मिटेगी जब तक
मत आना हे मृत्यु, कभी तुम मुझ तक।




