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सैन्य क्षेत्र में रणनीतिक बदलाव: नई दिशाएं, नई चुनौतियां और नवोत्थान के नए क्षितिज

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सैन्य क्षेत्र में रणनीतिक बदलाव: नई दिशाएं, नई चुनौतियां और नवोत्थान के नए क्षितिज 

इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति और सुरक्षा संरचना अभूतपूर्व संक्रमण के दौर से गुजर रही है। यह वह समय है जब सैन्य सुरक्षा केवल राष्ट्रीय रक्षा का पारंपरिक आयाम नहीं रह गई, बल्कि यह राष्ट्र के नवोत्थान, तकनीकी प्रगति, वैश्विक साझेदारी, आत्मनिर्भरता और ज्ञान आधारित राष्ट्र निर्माण की सबसे सशक्त धुरी बन चुकी है। राष्ट्रों के बीच प्रतिस्पर्धा अब केवल सैन्य संख्या या आयुध भंडार से नहीं आंकी जाती, बल्कि उनकी रणनीतिक दूरदृष्टि, तकनीकी श्रेष्ठता, डिजिटल क्षमता और बहुआयामी सुरक्षा प्रतिमानों से मापी जाती है। भारत भी इसी वैश्विक संक्रमण का सक्रिय और प्रभावी सहभागी बन रहा है, जहाँ सैन्य सुरक्षा के क्षेत्र में हो रहे रणनीतिक बदलाव नवभारत के उदय और नवोत्थान के नए क्षितिजों को विस्तृत कर रहे हैं।

पिछले दो दशकों में युद्ध की प्रकृति में क्रांतिकारी परिवर्तन सामने आए हैं। परंपरागत युद्धक क्षमताओं के साथ-साथ अब ‘टेक्नोलॉजी-सेंट्रिक वॉरफेयर’ आधुनिक सैन्य व्यवस्था का अनिवार्य अंग बन चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) आधारित हथियार प्रणालियाँ, स्वायत्त ड्रोन, क्वांटम-आधारित संचार-सुरक्षा, उपग्रह-नियंत्रित निगरानी नेटवर्क, साइबर डिफेंस, और डेटा-इंटेलिजेंस आधुनिक युद्ध को नव आकार प्रदान कर रहे हैं। 

 ‘डिफेंस ए.आई. काउंसिल’ और ‘डिफेंस ए.आई. प्रोजेक्ट एजेंसी’ की स्थापना, डी.आर.डी.ओ. की ए.आई. आधारित मिसाइल प्रणालियों पर प्रगति, एच.ए.एल. के स्वदेशी लड़ाकू ड्रोन, और इसरो के उन्नत सैन्य-उपग्रह, इस बात का प्रमाण हैं कि देश अपनी सैन्य क्षमता को महज आधुनिक नहीं, बल्कि भविष्य-उन्मुख बना रहा है। यह तकनीकी विस्तार केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय उद्योग, उच्च शिक्षा, स्टार्टअप इकोसिस्टम और नवाचार संस्कृति को भी नई दिशा प्रदान कर रहा है।

भारत में रक्षा प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ ‘साइबर सुरक्षा’ नई सामरिक चुनौतियों का केंद्र बनकर उभरी है। आधुनिक विश्व में साइबर युद्ध सीमाओं से परे संचालित होते हैं और राष्ट्र की आर्थिक, तकनीकी तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। भारत द्वारा राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति के अद्यतन संस्करण का निर्माण, ‘डिफेंस साइबर एजेंसी’ का गठन, तीनों सेनाओं के लिए समेकित ‘साइबर कमांड’ की सक्रियता, और महत्वपूर्ण अवसंरचना के लिए बहुस्तरीय डिजिटल सुरक्षा-मानक, यह दर्शाते हैं कि देश ने इस क्षेत्र में दीर्घकालिक दृष्टि अपनाई है। यह सुरक्षा केवल सैन्य-डोमेन की रक्षा नहीं, बल्कि नागरिक जीवन, उद्योग, बैंकिंग, ऊर्जा, स्वास्थ्य और संचार तंत्र की स्थिरता की गारंटी भी है।

सैन्य सुरक्षा के क्षेत्र में रणनीतिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण पक्ष इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका है। विश्व की 65 प्रतिशत जनसंख्या और 60 प्रतिशत वैश्विक जी.डी.पी. इसी क्षेत्र से जुड़ी है, और इस भू-राजनीतिक महत्व ने इसे वैश्विक शक्ति-संतुलन का केन्द्र बना दिया है। भारत ने अपनी ‘ऐक्ट ईस्ट नीति’, ‘सागर मिशन’, ‘इंडो-पैसिफिक ओशन इनिशिएटिव’ और ‘क्वाड’ जैसी बहुपक्षीय साझेदारियों के माध्यम से समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक सहयोग, आपदा राहत, आतंकवाद-निरोध और मुक्त एवं समावेशी इंडो-पैसिफिक के लक्ष्य को मजबूत किया है। भारतीय नौसेना के आई.एन.एस. विक्रांत जैसे स्वदेशी विमानवाहक जहाज, पनडुब्बी परियोजनाएँ, उन्नत रडार और तटीय निगरानी नेटवर्क इस बात का संकेत हैं कि भारत समुद्री शक्ति के रूप में उभार की रणनीति पर सुदृढ़ता से आगे बढ़ रहा है। यह सामरिक सक्रियता वैश्विक तकनीकी सहयोग, रक्षा-व्यापार, रणनीतिक संवाद और नवाचार-आधारित आर्थिक संभावनाओं को भी तीव्र गति प्रदान करती है।

आधुनिक रणनीतिक वातावरण में ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ नई चुनौती बनकर उभरा है, जिसमें सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ सूचना युद्ध, आर्थिक दबाव, साइबर हमले, दुष्प्रचार, प्रॉक्सी युद्ध और अंतरराष्ट्रीय मनोवैज्ञानिक दबाव एकसाथ संचालित किए जाते हैं। भारत ने इस चुनौती का सामना करने हेतु अंतर-एजेंसी समन्वय, रियल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के ढाँचे का सुदृढ़ीकरण, और सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार-निरोध प्रणालियों को मजबूत किया है। सूचना-सुरक्षा, डेटा विश्लेषण और ए.आई. आधारित निगरानी प्रणालियाँ अब राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचे की मूल इकाई बन चुकी हैं, जिससे देश का डिजिटल और सामरिक दोनों ही वातावरण अधिक सुरक्षित और सक्षम हुआ है।

सीमा-सुरक्षा के संदर्भ में भारत ने पिछले वर्षों में महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति की है। पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर स्मार्ट फेंसिंग, सेंसर आधारित सीमा जागरूकता प्रणाली, ड्रोन निगरानी, थर्मल इमेजिंग, सैटेलाइट समर्थित रियल टाइम इंटेलिजेंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित गतिविधि-विश्लेषण ने सीमा-प्रबंधन को नए स्तर पर पहुँचाया है। इन उपायों से न केवल सीमाओं की सुरक्षा मजबूत हुई है, बल्कि सीमांत क्षेत्रों में विकास कार्यों को भी गति मिली है। सड़कें, सुरंगें, ऊँचाई वाले क्षेत्रों में संचार संरचना, ऊर्जा अवसंरचना और स्वास्थ्य-सुविधाएँ, ये सभी सैन्य सुरक्षा के सुदृढ़ीकरण के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक उन्नति का माध्यम भी बनी हैं। 

आज रक्षा उत्पादन और आत्मनिर्भरता भारतीय सैन्य सुरक्षा में परिवर्तन के प्रमुख स्तंभ बन गए हैं। ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के अंतर्गत रक्षा क्षेत्र में एफ.डी.आई. बढ़ाने, आयात पर प्रतिबंधित वस्तुओं की सूची विस्तारित करने, ‘डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर’ की स्थापना, निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन, तथा क्त्क्व् द्वारा 400 से अधिक प्रौद्योगिकियों का उद्योग को हस्तांतरण जैसे कदमों ने रक्षा उत्पादन को एक नए युग में पहुँचाया है। स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान, आकाश मिसाइल प्रणाली, पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट, अर्जुन टैंक, ब्रह्मोस मिसाइल और नई पीढ़ी के हल्के हेलीकॉप्टर, ये सभी भारतीय वैज्ञानिक क्षमता और औद्योगिक नवोत्थान के उदाहरण हैं। रक्षा निर्यात 2014 के लगभग 1,500 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025 में 23,622 करोड़ रुपये से अधिक तक पहुँच चुका है, जो इस क्षेत्र में भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाता है।

सैन्य सुरक्षा के इस रणनीतिक परिवर्तन का व्यापक प्रभाव केवल रक्षा क्षमताओं तक सीमित नहीं, बल्कि यह भारत की आर्थिक प्रगति, तकनीकी उन्नति, शोध आधारित शिक्षा, युवा कौशल विकास और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर भी गहरा प्रभाव डालता है। उच्च शिक्षा संस्थानों में डिफेंस स्टडीज, स्ट्रैटेजिक स्टडीज, साइबर सुरक्षा, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग और ए.आई. आधारित अनुसंधान को बढ़ावा मिल रहा है। विश्वविद्यालयों और रक्षा संगठनों के बीच साझेदारी, इनक्यूबेशन केंद्रों का विकास, और स्टार्टअप इकोसिस्टम में रक्षा तकनीक की बढ़ती भूमिका एक नए रक्षा नवाचार युग की शुरुआत कर रही है।

वर्तमान परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि सैन्य सुरक्षा और राष्ट्रीय नवोत्थान एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां नवाचार और विज्ञान राष्ट्र को उन्नति की दिशा प्रदान करते हैं, वहीं सैन्य सुरक्षा उस उन्नति को सुरक्षित, संरक्षित और दीर्घकालीन बनाती है। भविष्य का भारत वही होगा जो आधुनिक सैन्य क्षमताओं को तकनीकी-वैज्ञानिक समृद्धि से जोड़ सके, और सुरक्षा को विकास के समानांतर, स्वाभाविक साथी के रूप में स्थापित कर सके। भारत की नई रणनीतिक सोच हमें बताती है कि सुरक्षा अब केवल सीमाओं की रक्षा का विषय नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्र-निर्माण का आधार है।

इस समन्वय में ही आत्मनिर्भर, सशक्त, सुरक्षित और नवाचारी भारत के निर्माण की वास्तविक शक्ति निहित है, यह एक ऐसा भारत है जो आधुनिक तकनीक में अग्रणी, वैश्विक मंचों पर निर्णायक, सामरिक रूप से सक्षम और भविष्य केंद्रित दृष्टि से संचालित हो रहा है। यही वह मार्ग है जो नए भारत की नई उड़ान को सुनिश्चित करते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, स्थिर और प्रगतिशील राष्ट्र के मार्ग को प्रशस्त करेगा।


लेखक मेजर ध्यानचंद खेल विश्वविद्यालय, मेरठ के कुलपति है।