एक साधारण कन्या की राजश्री से राजऋषि तक की यात्रा
रत्नगर्भा भारतीय भूमि से अनेक रत्न व पुण्य आत्माएं अवतरित हुई हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व व कृतित्व से अपने मानव जीवन को महान बना लिया। ऐसी ही सत्यनिष्ठ, न्यायप्रिय, मानवता प्रेमी, कुशल प्रशासक, सादगी व पवित्रता की प्रतिमूर्ति, दूरदर्शी भारतीय महिला शासिका, पुण्यश्लोक, शिवसाधिका, लोकमाता अहिल्याबाई का नाम भारतीय इतिहास के पन्नो में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। उनका जीवन लाखों करोड़ों भारतीय नारियों के लिए ही नहीं बल्कि समस्त मानव जाति के लिए प्रेरणा पुंज के रूप में दीप्तिमान है। इसलिए वह एक महान समाज सुधारक और धर्मनिष्ठा की प्रतीक के रूप में अमर हैं। उनकी जीवन यात्रा एक साधारण कन्या से लेकर राज्य के सिंहासन से होती हुई एक तपस्वी यानी राजश्री से लेकर राजऋषि तक की यात्रा का प्रतीक है। जिसमें उन्होंने राज्य संचालन की कुशलता, धार्मिकता और समाज सेवा के बीच संतुलन बनाए रखा।
अहिल्याबाई होलकर मराठा साम्राज्य की प्रसिद्ध महारानी तथा इतिहास-प्रसिद्ध सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खांडेराव की धर्मपत्नी थीं। वह परिहार गोत्र की थीं। उन्होंने महेश्वर को राजधानी बनाकर शासन किया। अहिल्याबाई सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय के मूलमंत्र के साथ महेश्वर की गद्दी पर बैठीं। एक महिला के लिए वह समय काफी चुनौतीपूर्ण था, लेकिन अहिल्याबाई ने एक बहु, माँ व राजमाता के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। उनकी इस यात्रा के बारे में प्रस्तुत पंक्तियां न्यायोचित ही हैं कि-
कुछ बनने के लिए खुद को पड़ता है तपाना।
आसान नहीं है किसी का राजऋषि बन जाना।।
लोकमाता अहिल्याबाई ने न केवल राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखा, बल्कि अपने राजकार्य के दौरान कई सामाजिक और धार्मिक सुधारों की ओर भी ध्यान दिया। अहिल्याबाई होलकर के धार्मिक और सामाजिक कार्यों ने उन्हें ‘राजऋषि’ का दर्जा दिलाया। वे अन्न, जल, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार की दिशा में कार्यरत रहीं। वे एक न्यायप्रिय शासिका थीं और उनकी नीतियों ने राज्य में सुख-शांति का वातावरण तैयार किया। अतः सत्य ही हैं कि -
अहिल्या धर्मपत्नी शीलवृद्धा महाबला।
राजऋषिवत्सला धर्मध्वजा यशस्विनी।।
वीर्यवती च पौराणि रक्षणे स्थिता सदा।
लोककल्याणकारिणी प्रजाश्रयणकर्त्री च।।
धर्मपरायणता व लोककल्याणकारी कार्याें के कारण ही राजऋषि व समाज सुधारक के रूप में समूचे विश्व में उनके जैसा कोई नहीं है। अहिल्याबाई की दृष्टि समाज के सभी वर्गों के उत्थान की ओर थी। उन्होंने दलितों, महिलाओं और निर्धन वर्ग के लिए कई योजनाओं की शुरुआत की। उन्होंने हर जाति और धर्म के लोगों के बीच सामंजस्य स्थापित किया और हमेशा यह प्रयास किया कि उनके राज्य में कोई भी भूखा न सोए। उनके द्वारा किए गए मंदिर निर्माण और धर्म यात्रा उनकी धार्मिक निष्ठा का दिग्दर्शन है। वहीं उनके सामाजिक अनुदान एक समाज सुधारक के रूप में हस्ताक्षर हैं।
अहिल्याबाई होलकर की यात्रा वास्तव में एक प्रेरणा है, जो यह दर्शाती है कि एक महिला अपने उच्च नैतिक और सामाजिक मूल्यों के साथ शासन कर सकती है। उनके कार्यों ने उन्हें केवल एक सक्षम शासिका नहीं, बल्कि एक धार्मिक, समाजसेवी और राष्ट्र निर्माता के रूप में भी स्थापित किया। जिसमें उन्होंने न केवल राज्य की प्रगति सुनिश्चित की, बल्कि समाज में न्याय और समानता की भावना भी प्रकट की। उनके योगदान और शासकीय दृष्टिकोण ने यह सिद्ध कर दिया कि राजशक्ति और धर्म, दोनों का संयोजन समाज के कल्याण के लिए आवश्यक है। उनकी यह यात्रा आज भी हमें प्रेरित करती है कि हम अपने कार्यों में न केवल सफलता की ओर बढ़ें, बल्कि समाज की सेवा भी करें।
शिवास्मिता धर्मपत्नी, न्यायविद्या समन्विता।
राज्यवृद्धेः साक्षात्कारी, अहिल्या बाई महाशिवा।।
धर्मेण समर्पिता राज्ये, धर्माधिष्ठिता शक्तिमान्।
मुक्तिसंयोगिनी यत्र, यत्र तत्र महादयिता।।
लोकमाता अहिल्याबाई का जीवन एक संत व साध्वी की भांति जनता की भलाई के लिए समर्पित था। उनके जीवन से कुछ जीवंत उदाहरण हमें आज भी सत्यमयी, पवित्रमयी, सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा देते है...एक समय बुन्देलखंड के चन्देरी से एक अच्छा ‘धोती-जोड़ा’ आया था, जो उस समय बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था। अहिल्याबाई ने उसे स्वीकार किया। उस समय एक सेविका जो वहां उपस्थित थी वह धोती-जोड़े को बड़ी लालसा से देख रही थी। अहिल्याबाई ने जब यह देखा तो उस कीमती जोड़े को उस सेविका को दे दिया। इसी प्रकार एक बार उनके दामाद ने पूजा-अर्चना के लिए कुछ बहुमूल्य सामग्री भेजी थी। उस सामान को एक कमजोर भिखारिन जिसका नाम था सिन्दूरी, उसे दे दिया था। किसी सेविका ने याद दिलाया कि इस सामान की जरूरत आपको भी है परन्तु उन्होंने यह कहकर सेविका की बात को नकार दिया कि उनके पास और है।
रोने वाली स्त्रियों को वे उनके आंसुओं को रोकने के लिए कहतीं, आंसुओं को संभालकर रखने का उपदेश देतीं और उचित समय पर उनके उपयोग की बात कहतीं। उस समय किसी पुरुष की मौजूदगी को वे अच्छा नहीं समझती थीं। यदि कोई पुरुष किसी कारण मौजूद भी होता तो वे उसे किसी बहाने वहां से हट जाने को कह देतीं। इस प्रकार एक महिला की व्यथा, उसकी भावना को एकांत में सुनती, समझती थीं। यदि कोई कठिनाई या कोई समस्या होती तो उसे हल कर देतीं अथवा उसकी व्यवस्था करवातीं। महिलाओं को एकांत में अपनी बात खुलकर कहने का अधिकार था। राज्य के दूरदराज के क्षेत्रों का दौरा करना, वहां प्रजा की बातें, उनकी समस्याएं सुनना, उनका हल तलाश करना उन्हें बहुत भाता था। अहिल्याबाई, जो अपने लिए पसन्द करती थीं, वही दूसरों के लिए। विशेषतौर पर महिलाओं को त्यागमय उपदेश भी दिया करती थीं।
एक बार होलकर राज्य की दो विधवाएं अहिल्याबाई के पास आईं, दोनों बड़ी धनवान थीं, परन्तु दोनों के पास कोई सन्तान नहीं थी। वे अहिल्याबाई से प्रभावित थीं। अपनी अपार संपत्ति अहिल्याबाई के चरणों में अर्पित करना चाहती थीं। संपत्ति न्योछावर करने की आज्ञा मांगी, परन्तु उन्होंने उन दोनों को यह कहकर मना कर दिया कि जैसे मैंने अपनी संपत्ति जनकल्याण में लगाई है, उसी प्रकार तुम भी अपनी संपत्ति को जनहित में लगाओ। उन विधवाओं ने ऐसा ही किया और वे धन्य हो गईं। इस तरह वास्तव में लोकमाता अहिल्याबाई की राजश्री से राजऋषि तक की यात्रा बहुत प्रेरणादायक है। आज भी आम जनमानस उन्हें देवी की तरह पूजता है। कवि मोरोपंत के शब्दों में, ‘‘देवी अहिल्याबाई का निष्ठावान और कर्तव्य परायण चरित्र महाराष्ट्र ही नहीं, अपितु पूरे देश में लोकप्रिय है वह गंगा नदी के समान पवित्र हैं। सदा सद्भावना-युक्त कार्य कर सभी का कल्याण करती हैं। इन्हीं सद्गुणों के कारण वह जन-जन के हृदय में स्थान बनाए हुए हैं।
लेखिका किसान पी.जी. कॉलेज, सिंभावली (हापुड़) चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के अंग्रेजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर है।




