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दुनिया एक परिवार है और विश्व के किसी भी कोने में संकट हो तो हिन्दू उसे अपनी समस्या मानता है-दत्तात्रेय होसबाले जी

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 जयपुर

वैशाली नगर के चित्रकूट स्टेडियम में  विराट हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ सामाजिक समरसता के प्रतीक कलश यात्रा के साथ हुआ, जिसमें 700 से अधिक माताओं-बहनों ने भाग लिया। राष्ट्रभाव से ओतप्रोत वातावरण में सकल हिन्दू समाज ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।

आयोजन समिति के अध्यक्ष ने बताया कि सम्मेलन की तैयारियां 10 दिवस पूर्व से ही प्रारंभ कर दी गई थीं। वाहन रैलियों, कॉलोनीवार बैठकों एवं प्रभात फेरियों के माध्यम से जनजागरण किया गया। क्षेत्र में जनसंपर्क अभियान चलाकर समाज के सभी वर्गों को आयोजन से जोड़ा गया। सम्मेलन में ‘पंच परिवर्तन’ – सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, स्व-बोध, पर्यावरण संरक्षण एवं नागरिक शिष्टाचार – जैसे विषयों पर आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दी गईं। प्रसिद्ध भजन सम्राट प्रकाश माली ने भजन प्रस्तुति दी।

मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि हिन्दुत्व ही विश्वबंधुत्व की आधारशिला है। हिन्दू समाज यदि संगठित और सशक्त रहेगा तो वह संपूर्ण विश्व को एकता और मानवता का मार्ग दिखा सकेगा। हिन्दू समाज जहां-जहां पहुंचा, वहां-वहां उसने उस देश और समाज के उत्थान में सकारात्मक योगदान दिया है।


उन्होंने “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को हिन्दू जीवन दृष्टि का मूल बताते हुए कहा कि दुनिया एक परिवार है और विश्व के किसी भी कोने में संकट हो तो हिन्दू उसे अपनी समस्या मानता है। भारत ने सदैव पीड़ितों को शरण दी – चाहे पारसी समाज हो या तिब्बती समुदाय – भारत ने सबको अपनाया है।

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल कथा नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्श जीवन का मार्गदर्शन है। जिस पवित्र भूमि पर श्री राम, श्री कृष्ण और भगवान शिव ने अवतार लिया, उस भारत भूमि में जन्म लेना सौभाग्य की बात है।

सरकार्यवाह जी ने कहा कि हिन्दू दर्शन प्रत्येक व्यक्ति के भीतर ईश्वर का दर्शन करता है। “नमस्ते” का अर्थ है – मेरे भीतर का ईश्वर आपके भीतर के ईश्वर को प्रणाम करता है। प्रकृति के प्रत्येक रूप -नदी, वृक्ष, पशु-पक्षी – की पूजा हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। आज विश्व पर्यावरण संरक्षण की बात कर रहा है, जबकि हिन्दू समाज प्राचीन काल से ही प्रकृति पूजन की परंपरा निभाता आया है। प्रकृति संरक्षण और संवर्धन को जीवन शैली का हिस्सा बनाना आवश्यक है।

योग और सूर्य नमस्कार की वैश्विक स्वीकार्यता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि योग किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का है। सामाजिक समरसता पर बल देते हुए कहा कि जाति-पाति और छुआछूत हिन्दू समाज की पहचान नहीं है। श्रीराम द्वारा केवट को भाई कहकर अपनाने की परंपरा हमारी संस्कृति का आदर्श उदाहरण है। हिन्दू समाज किसी को दबाने या शोषण करने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को सशक्त और संगठित रखने के लिए खड़ा हो। जब तक हम एक होकर खड़े रहेंगे, कोई भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। परिवार व्यवस्था को भारतीय संस्कृति की आधारशिला बताते हुए उन्होंने कहा, “परिवार बचेगा तो भारत बचेगा।” कुटुंब में मधुर संबंध, जीवन मूल्यों की रक्षा और नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजगता राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक है। स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और अपनी भाषा-संस्कृति के प्रति गर्व का भाव प्रत्येक नागरिक में होना चाहिए।

कार्यक्रम का समापन भारत माता की आरती व राष्ट्रगान के साथ हुआ। आयोजन में क्षेत्र के हजारों नागरिकों ने सहभागिता कर हिन्दू एकता और राष्ट्रभावना का संदेश दिया।