• अनुवाद करें: |
विशेष

त्रिभाषा सूत्र: एक भारत, श्रेष्ठ भारत

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

त्रिभाषा सूत्र: एक भारत, श्रेष्ठ भारत 

भारत विश्व का एक ऐसा अद्भुत राष्ट्र है जहां सैकड़ों भाषाएं, हजारों बोलियां, विविध संस्कृतियां और अनेक परंपराएं सहस्राब्दियों से एक साथ विकसित होती रही हैं। यही भाषाई और सांस्कृतिक विविधता भारत की सबसे बड़ी पहचान है। किंतु विविधता तभी राष्ट्र की शक्ति बनती है जब उसे एकता के सूत्र में पिरोने वाला साझा दृष्टिकोण भी हो। इसी विचार को साकार करने का एक प्रभावी माध्यम है त्रिभाषा सूत्र, जिसे नई शिक्षा नीति के अनुरूप सीबीएसई सहित देश की शिक्षा व्यवस्था में प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह केवल तीन भाषाएं सीखने की व्यवस्था नहीं, बल्कि भारतीयता, राष्ट्रीय एकात्मता और वैश्विक नागरिकता का संतुलित दर्शन है।

भाषा: संवाद का नहीं, संस्कार का माध्यम: भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं होती; वह किसी समाज की संस्कृति, इतिहास, साहित्य, संवेदनाओं और जीवन-मूल्यों की वाहक होती है। जिस प्रकार वृक्ष अपनी जड़ों से शक्ति प्राप्त करता है, उसी प्रकार व्यक्ति अपनी भाषा और संस्कृति से आत्मविश्वास प्राप्त करता है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-

‘हम वही हैं जो हमारे विचारों ने हमें बनाया है।’ और विचारों का सबसे स्वाभाविक माध्यम हमारी मातृभाषा ही होती है। यही कारण है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त करने वाला विद्यार्थी विषयों को अधिक गहराई से समझता है, अधिक रचनात्मक बनता है और अपनी सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा रहता है।

त्रिभाषा सूत्र इसी सिद्धांत पर आधारित है कि विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में सोचने की क्षमता विकसित करे, किसी अन्य भारतीय भाषा के माध्यम से पूरे देश से जुड़े और एक वैश्विक भाषा के माध्यम से विश्व के साथ आत्मविश्वासपूर्वक संवाद कर सके।

त्रिभाषा सूत्र विविधता में एकता का सशक्त आधार - भारत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भाषाई विविधता विभाजन का कारण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है। उत्तर भारत की भाषाएं हों या दक्षिण भारत की, पूर्वाेत्तर की बोलियां हों या पश्चिम भारत की लोकभाषाएं प्रत्येक भाषा भारत की साझा सांस्कृतिक धरोहर है। त्रिभाषा सूत्र का उद्देश्य किसी भाषा को श्रेष्ठ सिद्ध करना या किसी भाषा को थोपना नहीं है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों के भीतर यह भावना विकसित करना है कि भारत की प्रत्येक भाषा सम्मान की अधिकारी है।

जब उत्तर प्रदेश का विद्यार्थी तमिल या मलयालम के कुछ शब्द सीखता है, जब केरल का छात्र हिंदी साहित्य को समझता है, जब असम का युवा मराठी या गुजराती संस्कृति से परिचित होता है, तब केवल भाषाएं नहीं सीखी जातीं, बल्कि दिल जुड़ते हैं, पूर्वाग्रह समाप्त होते हैं और राष्ट्रीय एकात्मता मजबूत होती है। यही सामाजिक समरसता का वास्तविक स्वरूप है, जहां भाषा विभाजन का नहीं, आत्मीयता का माध्यम बनती है। भारत के सांस्कृतिक चिंतन में सदैव यह माना गया है कि विविधताओं को स्वीकार कर उन्हें परस्पर सम्मान और सहयोग के सूत्र में बाँधना ही सशक्त राष्ट्र निर्माण का आधार है।

आज आवश्यकता भाषाई प्रतिस्पर्धा की नहीं, बल्कि भाषाई सहयोग की है। भारत का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा जब उसकी भाषाएँ एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी बनेंगी।

युवा शक्ति और विकसित भारत का संकल्प: आज का भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में अग्रणी है। यही युवा शक्ति वर्ष 2047 के विकसित भारत का निर्माण करेगी। ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना भी है जो अपने राष्ट्र की आत्मा को समझें।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक आदरणीय डॉ. मोहन भागवत ने अनेक अवसरों पर भारतीय भाषाओं, सांस्कृतिक आत्मबोध और राष्ट्रीय एकात्मता के महत्व पर बल दिया है। उनका स्पष्ट मत है कि अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ा समाज ही आत्मविश्वास के साथ विश्व का नेतृत्व कर सकता है। त्रिभाषा सूत्र इसी राष्ट्रीय दृष्टि को व्यवहार में उतारने का प्रभावी माध्यम है। यह युवाओं को केवल भाषाएं नहीं सिखाता, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक विश्व का नेतृत्व करने का आत्मविश्वास भी देता है।

बहुभाषी युवा अधिक संवादशील, अधिक रचनात्मक और अधिक आत्मविश्वासी होते हैं। वे देश के किसी भी भाग में कार्य कर सकते हैं, विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के साथ सहजता से जुड़ सकते हैं और राष्ट्रीय विकास में व्यापक योगदान दे सकते हैं। 

विश्व मंच पर भारत की नई पहचान: आज का युग ज्ञान, नवाचार और वैश्विक सहयोग का युग है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान, अंतरिक्ष, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्टार्टअप के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में विश्व के अनेक विकसित देश बहुभाषिकता को अपनी बौद्धिक और आर्थिक शक्ति मानते हैं। जो समाज अनेक भाषाओं में सोच सकता है, वह अनेक दृष्टिकोणों से समस्याओं का समाधान भी खोज सकता है।

भारत के पास यह क्षमता स्वाभाविक रूप से उपलब्ध है। यदि हमारी नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा, एक अन्य भारतीय भाषा और एक वैश्विक भाषा में दक्ष होगी, तो वह विश्व के साथ प्रतिस्पर्धा ही नहीं, बल्कि नेतृत्व भी कर सकेगी। महात्मा गांधी का एक विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक है- ‘मैं नहीं चाहता कि मेरे घर की खिड़कियां बंद हों। मैं चाहता हूँ कि सभी देशों की संस्कृतियां मेरे घर में आएं, पर वे मुझे मेरी जड़ों से उखाड़ न दें। यही त्रिभाषा सूत्र की मूल भावना है- जड़ों से जुड़े रहकर विश्व से संवाद करना।

भारतीय ज्ञान परंपरा और ‘स्व’ का बोध: भारत की भाषाओं में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, संत साहित्य, लोककथाएं, दर्शन, विज्ञान और सामाजिक चिंतन का विशाल ज्ञान-सागर सुरक्षित है। यदि नई पीढ़ी भारतीय भाषाओं से दूर होती है, तो वह केवल एक भाषा नहीं खोती, बल्कि हजारों वर्षों की ज्ञान-परंपरा से भी दूर हो जाती है।

भारतीय चिंतन में ‘स्व’ का अर्थ केवल स्वयं तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपनी परंपरा और अपनी राष्ट्रीय पहचान का आत्मबोध है। जब युवा भारतीय भाषाओं के माध्यम से अपने साहित्य, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समझते हैं, तब उनमें सांस्कृतिक आत्मविश्वास विकसित होता है। यही आत्मविश्वास विकसित भारत की सबसे बड़ी बौद्धिक और नैतिक शक्ति बनेगा। ऋग्वेद का यह मंत्र आज भी हमें प्रेरित करता है-

‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।’ अर्थात् चारों दिशाओं से श्रेष्ठ विचार हमारे पास आएँ।

भारतीय संस्कृति ने सदैव नए विचारों का स्वागत किया है, किंतु अपनी पहचान को सुरक्षित रखते हुए। त्रिभाषा सूत्र इसी संतुलित दृष्टि का आधुनिक स्वरूप है।

एक भारत, श्रेष्ठ भारत की दिशा में: राष्ट्रीय एकता केवल संविधान की धाराओं से नहीं बनती; वह नागरिकों के हृदयों में जन्म लेती है। जब देश का एक विद्यार्थी दूसरे प्रदेश की भाषा, साहित्य और संस्कृति का सम्मान करता है, तब वह केवल एक भाषा नहीं सीखता, बल्कि एक नया भारत खोजता है। 

निष्कर्ष: भाषा से बंधे, भावना से जुड़े आज विश्व अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विभाजनों से जूझ रहा है। ऐसे समय में भारत अपनी भाषाई विविधता के माध्यम से विश्व को सहअस्तित्व, संवाद और सांस्कृतिक सम्मान का मार्ग दिखा सकता है।

त्रिभाषा सूत्र केवल शिक्षा की नीति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का संकल्प है। यह युवाओं को अपनी मातृभाषा पर गर्व करना सिखाता है, अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान करना सिखाता है और विश्व से आत्मविश्वास के साथ संवाद करना भी सिखाता है। यही वह संतुलन है जो भारत को ज्ञान, संस्कृति, विज्ञान और मानवता के क्षेत्र में अग्रणी बना सकता है।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देने वाली इस भूमि के लिए त्रिभाषा सूत्र केवल तीन भाषाओं का पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि तीन महान संकल्पों का राष्ट्रीय अभियान है। अपनी जड़ों से जुड़ना, पूरे भारत को अपनाना और विश्व का नेतृत्व करना।

जब भारत का प्रत्येक विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में सोच सके, किसी अन्य भारतीय भाषा में अपने देशवासी से आत्मीयता स्थापित कर सके और विश्व की भाषा में मानवता से संवाद कर सके, तब केवल एक शिक्षित पीढ़ी नहीं, बल्कि एक सशक्त, समरस, आत्मविश्वासी और विकसित भारत का निर्माण होगा। यही त्रिभाषा सूत्र का वास्तविक उद्देश्य है और यही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की सबसे सशक्त आधारशिला भी।