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बंगाल: संस्कृति, चेतना और गौरव की वापसी - राजनाथ सिंह

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बंगाल में परिवर्तन के साथ पुनर्जागरण - राजनाथ सिंह

 

बंगाल में हुआ बदलाव सिर्फ राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि यह ऐसे लोगों के खिलाफ जनादेश भी है, जिन्होंने राज्य को उसके मूल से दूर किया

 

"हे नूतन, देखा दिक आर बार, जन्मेरो प्रथम शुभोखोन।" इसका अर्थ है हे नवीन, एक बार फिर से सामने आओ, ठीक उसी तरह जैसे जन्म के समय वह पहला शुभक्षण आया था। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की ये पंक्तियां केवल एक कविता का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि समय समय पर स्वतःस्फूर्त और नवीन होने वाली बंगाल के आत्मा का आह्वान भी हैं। गुरुदेव भली-भांति समझते थे कि बंगाल समय के साथ केवल बदलता नहीं है, बल्कि वह बार बार बेहतर और नए रूप में पल्लवित होता है। गुरुदेव की जयंती पर गाई जाने वाली यह कविता नवजागरण और नवचेतना का प्रतीक है। यह एक सुखद संयोग है कि टैगोर की 165वीं जयंती से कुछ दिन पहले ही बंगाल कई दशकों के बाद नवजागरण का साक्षी बना। भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह चुनाव सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं था। यह इस महान भूमि के खोए हुए गौरव को पुनस्र्थापित करने का एक अवसर था एक ऐसा सभ्यतागत आह्वान, जो चुनावी समीकरणों और गणनाओं से कहीं ऊपर है।

आज जब बंगाल की चेतना और गौरव का अरुणोदय हो रहा है, तो यह समझने की आवश्यकता है कि बंगाल क्या है और उसकी चेतना का पुनर्जागरण किसे कहा जा सकता है? बंगाल सामाजिक चेतना का केंद्र होने से पहले ज्ञान और आध्यात्मिकता की पवित्र भूमि - थी। 15वीं शताब्दी में नबद्वीप के गंगा तट पर एक युवा संन्यासी निमाई ने अपने कीर्तन के माध्यम से समाज को नई दिशा दी। उस युवा संन्यासी को हम संत चैतन्य महाप्रभु के नाम से जानते हैं। उनके द्वारा दिखाया गया भक्ति मार्ग आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने के साथ-साथ सामाजिक समरसता का अभियान भी था। उनके द्वारा प्रवाहित वैष्णव - परंपरा ने समाज में करुणा, समावेशिता, समता और सद्भावना को बल दिया। - यही चेतना बाउल परंपरा में भी दिखाई दी। बाउल परंपरा के फकीरों की पहचान जाति, पंथ या कोई ग्रंथ नहीं, बल्कि मानवता की भावना थी। बाउल परंपरा के - सबसे महान प्रवर्तक लालन फकीर थे। वे किस संप्रदाय से थे, यह कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा। उन्होंने हिंदू समाज - में प्रचलित जाति व्यवस्था का भी विरोध किया और मुस्लिम समाज में होने वाले - भेदभाव के खिलाफ भी आवाज उठाई। वे बंगाल की उस सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक थे, जिसमें सहिष्णुता और सह-अस्तित्व का भाव समाहित था।

विगत तीन शताब्दियों में बंगाल और - यहां के लोगों ने केवल भारत के - सामाजिक नवजागरण आंदोलन में भाग ही नहीं लिया, बल्कि उसका नेतृत्व भी किया। राजा राममोहन राय ने लोगों को आत्मबोध कराकर समाज को भीतर से सुधारने का मार्ग चुना। सती प्रथा जैसी अमानवीय कुरीति के विरुद्ध उनका संघर्ष केवल समाज सुधार से जुड़ा आंदोलन नहीं था, बल्कि भारतीय आत्मा को पुनर्जीवित करने का एक तप था। इसी तरह ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने शिक्षा को नारी शक्ति के उत्थान, सशक्तीकरण और मुक्ति का साधन बनाया। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने "वंदे मातरम्" जैसा अमर मंत्र राष्ट्र को दिया। इस गीत ने ब्रिटिश साम्राज्य से लड़ने में हमारे

स्वतंत्रता सेनानियों को बल दिया और सदियों से सोए हुए देश को जगा दिया। यह गीत आज भी भारत के लोगों की अंतरात्मा का स्वर है। भारत की पहली महिला चिकित्सक डा. कादंबिनी गांगुली ने सभी को और विशेषकर महिलाओं को प्रेरित किया। बंगाल की ही धरती पर जन्मे प्रखर राष्ट्रवादी डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। संभवतः बंगाल की धरती ने जितनी विलक्षण प्रतिभाओं और महान लोगों को जन्म दिया, उनमें सबसे देदीप्यमान और प्रबुद्ध स्वामी विवेकानंद को कहा जा सकता है। शिकागो में दिया गया उनका भाषण इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उन्होंने विश्व को वेदांत और भारत के महान सभ्यतागत मूल्यों से परिचित कराया।

दुर्भाग्यवश लंबे समय तक बंगाल के कुछ बुद्धिजीवियों और राजनीतिक वर्गों ने अपनी ही सांस्कृतिक विरासत को बोझ समझा और उसे हेय दृष्टि से देखा। सभ्यता, धर्म, संस्कृति और बंगाल की चेतना की बात करने वाले लोगों को और उनकी आवाज को दबाया गया। परिणामस्वरूप, बंगाल ने दशकों तक विकासहीनता, अराजकता, संस्थागत पतन और वैचारिक जड़ता का दंश झेला। बंगाल में हुआ परिवर्तन सिर्फ राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं हैं, बल्कि यह ऐसे लोगों के खिलाफ जनादेश भी है, जिन्होंने बंगाल को उसके मूल से दूर किया। प्रधानमंत्री मोदी के लिए बंगाल विधानसभा का चुनाव सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि बंगाल के गौरव और विरासत को पुनस्र्थापित करने का यज्ञ था। बेलूर मठ से प्रधानमंत्री मोदी का आत्मिक जुड़ाव, स्वामी विवेकानंद के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा और सुशासन को 'सेवा' के रूप में देखने का उनका दृष्टिकोण, ये सभी इसके प्रमाण हैं कि 'प्रधान सेवक' बंगाल के विकास और पुनर्जागरण को एक पावन दायित्व मानते हैं, जिसे वे अपने 'प्रधान धर्म' और 'प्रधान कर्म' के रूप में निभा रहे हैं।

बंगाल के विकास और पुनर्निर्माण का अर्थ कई दशकों से उपेक्षित और जीर्ण-शीर्ण हो चुके इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण तो है ही, साथ ही उन घाटों को पुनर्जीवित करना भी है, जहां चैतन्य महाप्रभु के कीर्तन ने लोगों को भाव विभोर किया था। इसका अर्थ उन शैक्षणिक संस्थानों को सशक्त करना भी है, जिनका स्वप्न ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने देखा था। इसका अर्थ आदिवासी भाइयों बहनों को गरिमा, सम्मान और अवसर देना और उपेक्षा झेल रहे पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना भी है।

पिछले कुछ दशकों में भय और कुशासन के कारण ऐसा प्रतीत होने लगा था मानो बंगाल का स्वर्णिम युग बीत चुका हो, किंतु आज बंगाल एक बार फिर नए आत्मविश्वास और नई ऊर्जा के साथ समृद्धि एवं शांति से भरे नए युग में प्रवेश कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में बनने वाली पहली भाजपा सरकार गुरुदेव के द्वारा वर्णित 'नूतन'

भावना के साथ सेवा का संकल्प लेकर आगे बढ़ेगी और बंगाल की प्रतिष्ठा और समृद्धि के साथ राज्य का सांस्कृतिक गौरव बढ़ाने के लिए कार्य करेगी।