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गर्मी में ठंडे पानी का प्राकृतिक उपाय, मेरठ का मटका मार्केट बना लोगों की पहली पसंद

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गर्मी में ठंडे पानी का प्राकृतिक उपाय, मेरठ का मटका मार्केट बना लोगों की पहली पसंद 

मेरठ, उत्तर प्रदेश

मिट्टी के बर्तनों का भारतीय सभ्यता और संस्कृति से हजारों वर्ष पुराना संबंध रहा है और प्राचीन काल से ही मटके, सुराही, कुल्हड़ और अन्य मिट्टी के बर्तन दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।  

बढ़ती गर्मी, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और पर्यावरण-अनुकूल जीवन शैली ने मिट्टी के बर्तनों की मांग को बढ़ा दिया है। प्राकृतिक रूप से पानी को ठंडा रखने वाले मटके, मिट्टी की बोतलें और अन्य पारंपरिक बर्तन अब लोगों की पहली पसंद बन रहे हैं। ऐसे में मेरठ का स्ट्रीट मटका मार्केट अपनी गुणवत्ता, किफायती कीमतों और विविधता के कारण विशेष पहचान बना चुका है।

मेरठ स्थित स्ट्रीट मटका मार्केट मिट्टी के बर्तनों की खरीदारी के लिए प्रसिद्ध बाजार है, यहां प्रजापति समाज के कारीगरों द्वारा बनाए गए आकर्षक और टिकाऊ मिट्टी के उत्पाद उचित दामों पर उपलब्ध हैं बाजार में विभिन्न डिजाइनों के मटके, मिट्टी की बोतलें, तवा, कढ़ाई, कुकर, कप, गिलास और घर की सजावट से जुड़े अनेक उत्पाद आसानी से मिल जाते हैं।

दुकानदार दीपक कुमार का कहना है आज के समय बदलती जीवन शैली के साथ लोग अब ऐसे उत्पादों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जो स्वास्थ्यवर्धक होने के साथ पर्यावरण के अनुकूल भी हों। मिट्टी के बर्तनों में रखा पानी लंबे समय तक प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है, जबकि इनमें बना भोजन स्वाद और पौष्टिकता दोनों की दृष्टि से बेहतर माना जाता है।

इस बाजार की विशेषता यह भी है कि यहां केवल मेरठ के कारीगरों के उत्पाद ही नहीं, बल्कि गुजरात, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के मिट्टी के बर्तन भी उपलब्ध हैं। बाजार में 10 से अधिक दुकानें हैं, जहां अन्य स्थानों की तुलना में कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण सामान खरीदा जा सकता है। 


मेरठ का स्ट्रीट मटका मार्केट केवल मिट्टी के बर्तनों का बाजार नहीं, बल्कि पारंपरिक कुम्हार कला और स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देने का सशक्त माध्यम भी है किफायती कीमत, बेहतर गुणवत्ता और स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों के कारण यह बाजार आज पर्यावरण-अनुकूल जीवन शैली अपनाने वाले लोगों के लिए एक आदर्श खरीदारी केंद्र बनकर उभर रहा है।

स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक हस्तशिल्प के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण लोग अपनी परम्परागत जीवन शैली की ओर लौट रहे हैं। भारत के लोग अब अपनी जड़ों से जुड़कर उनका महत्व भी समझने लगे हैं यह भारत की आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है।