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हिन्दू समाज की संगठित शक्ति संहारक नहीं, सदैव संरक्षक रही है – भय्याजी जोशी जी

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पुणे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य भय्याजी जोशी ने कहा कि हिन्दुओं का संगठन किसी के विरोध के लिए नहीं, बल्कि समूचे विश्व के कल्याण के लिए है। हिन्दू होने का गौरव शांति, सत्य और न्याय पर आधारित जीवन का प्रतीक है। हिन्दू समाज की संगठित शक्ति संहारक नहीं, सदैव संरक्षक रही है और भविष्य में भी यही उसकी भूमिका रहेगी।

भय्याजी जोशी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के संघ शिक्षा वर्ग के समारोप समारोह में संबोधित कर रहे थे। समारोह में एचईएमआरएल (हाई एनर्जी मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी) के समूह निदेशक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हिमांशु शेखर, वर्गाधिकारी दत्तात्रेय गर्गे, पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत संघचालक प्रो. नाना जाधव तथा कसबा भाग संघचालक अधिवक्ता प्रशांत यादव उपस्थित रहे।

भय्याजी जोशी ने कहा कि, यदि संसार में एक भी मुस्लिम अथवा ईसाई नहीं होता, तब भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य प्रारंभ होता। क्योंकि संघ का उद्देश्य किसी का विरोध करना नहीं, बल्कि हिन्दू समाज की सकारात्मक शक्ति को जागृत करना है। सज्जन शक्ति का संगठन कर समाज-परिवर्तन लाना ही संघ का मूल ध्येय है। उन्होंने कहा कि संघ के प्रति उपेक्षा, उपहास और प्रशंसा का समय अब पीछे छूट चुका है। आज समाज स्वयं संघ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहभागी बन रहा है। समाज को केवल उपासना तक सीमित न रखकर आचरण के माध्यम से राष्ट्रधर्म की ओर ले जाना आवश्यक है। भारत के उत्थान में ही विश्वकल्याण का मार्ग निहित है।

भारत को कोई शक्ति समाप्त नहीं कर सकती

भय्याजी जोशी ने कहा, “महर्षि अरविंद ने भारत को ‘मृत्युंजय भारत’ कहा है, जबकि स्वामी विवेकानंद ने प्रत्येक भारतीय को ‘अमृतपुत्र’ के रूप में संबोधित किया है। भारत को संसार की कोई शक्ति समाप्त नहीं कर सकती। यह केवल हमारा स्वप्न नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य है। हिन्दू विचार अनादि और अनंत है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर के शब्दों में – ‘अनादि मैं, अनंत मैं, अवध्य मैं…’ – हिन्दू विचार का विनाश कोई नहीं कर सकता। यह विचार संकीर्ण नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के मंगल का वाहक है।”

संघ की शताब्दी यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “संघ को समाप्त करने की बातें करने वाले स्वयं इतिहास के पन्नों में विलीन हो गए। 1925 में संघ की स्थापना हुई और 1926 में साम्यवादी आंदोलन प्रारंभ हुआ। आज सौ वर्ष बाद साम्यवाद खोजने पर भी दिखाई नहीं देता, जबकि संघ विश्व मंच पर एक सशक्त शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है। इसका कारण है संघ की सकारात्मक दृष्टि। हिन्दू चिंतन से प्रेरित यही सकारात्मक दृष्टिकोण विश्व के समक्ष प्रस्तुत करना संघ का ध्येय है।”

वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हिमांशु शेखर ने कहा कि संघ शिक्षा वर्ग में उपस्थित होना उनके लिए सौभाग्य का विषय है। यहां स्वयंसेवकों को शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक स्तर पर भारत से जोड़ने का उत्कृष्ट कार्य किया जाता है। विकसित भारत के निर्माण में स्वयंसेवकों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगी।

कार्यक्रम की प्रस्तावना में अमोद कालगांवकर ने बताया कि इस वर्ष के शिक्षा वर्ग में 75 शिक्षार्थियों ने भाग लिया। इनमें पश्चिम महाराष्ट्र से 52, कोंकण से 17, देवगिरि से 5 तथा विदर्भ से 1 शिक्षार्थी सम्मिलित रहे। वर्ग के संचालन हेतु 11 पूर्णकालिक शिक्षक तथा 15 स्वयंसेवक व्यवस्थापक के रूप में कार्यरत रहे।