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स्वच्छता से संवारता गांव: खजूरी गांव की प्रेरक पहल

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मेरठ, उत्तर प्रदेश

अक्सर हम गंदगी को समस्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन जब यही समस्या सोच, संकल्प और सही योजना से जुड़ जाती है, तो बदलाव की प्रेरणा बन जाती है। जी हां, ग्राम पंचायत खजूरी ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि जहां कभी कूड़े के ढेर और बदबू हुआ करती थी, वही जगह आज साफ-सुथरे माहौल, हरियाली और सुकून का प्रतीक बन सकती है।

ग्राम पंचायत खजूरी ने आपदा को अवसर में बदल दिया है। बता दें गांव में एक स्थान ऐसा था, जहां लोग रोज कूड़ा डालते थे और वहां से गुजरना भी मुश्किल होता था। आज उसी जगह पर एक सुंदर टूरिज्म पार्क बन गया है, जहां लोग घूमने आते हैं और अच्छा समय बिताते हैं। ग्राम पंचायत ने अपनी निधि से इस उपेक्षित स्थान को नया रूप दिया। पार्क में चलने के लिए अच्छे ट्रैक बनाए गए हैं। बैठने के लिए सुंदर बेंच और हट लगाई गई हैं। शाम होते ही रंग-बिरंगी लाइटें पार्क की खूबसूरती बढ़ा देती हैं। यहां बना ईको फ्रेंडली टी-स्टाल लोगों को खूब पसंद आ रहा है, जहां लोग चाय पीते हुए तस्वीरें भी खींचते हैं। ग्राम पंचायत खजूरी की प्रधान अफसाना ने बताया कि परीक्षितगढ़ रोड पर तालाब के पास ग्राम समाज की करीब दो बीघा जमीन पर पहले कूड़ा डाला जाता था। पंचायत की बैठक में सर्वसम्मति से तय किया गया कि अब यहां कोई भी कूड़ा नहीं डालेगा। इसके बाद इस जगह को सुंदर बनाने का काम शुरू किया गया।

 ग्राम सचिव विक्रांत त्यागी ने बताया कि एक बैठक में जिलाधिकारी डॉ. वीके सिंह ने ग्राम पंचायतों से आमदनी बढ़ाने के लिए नए प्रयोग करने की बात कही थी। इसी सोच के साथ प्रधान और सचिव ने मिलकर इस टूरिज्म पार्क का प्रस्ताव तैयार किया और जिलाधिकारी और डीपीआरओ वीरेंद्र सिंह के सामने रखा। सभी की सहमति मिलने के बाद करीब 10 लाख रुपये की लागत से पार्क तैयार किया गया। बता दें पार्क के अंदर एक ईको फ्रेंडली टी-स्टाल बनाया गया है, जिसे पांच हजार रुपये प्रतिमाह किराये पर दिया गया है। यहां 10 रुपये में चाय मिलती है और सुबह-शाम लोग यहां आते हैं। इससे ग्राम पंचायत को नियमित आय भी हो रही है।


 वही पार्क के पास ढाई बीघा जमीन खाली पड़ी थी। दोबारा कूड़ा न पड़े, इसके लिए वहां 500 पेड़ लगाए गए और उन पर 500 घोंसले भी लगाए गए हैं। इससे पक्षियों की संख्या बढ़ रही है और इस स्थान को पक्षी आश्रय स्थल का नाम दिया गया है। ग्राम पंचायत खजूरी की यह पहल दिखाती है कि अगर लक्ष्य मजबूत हों, तो गांव की सूरत और सोच दोनों बदली जा सकती हैं। यह कहानी दूसरे गांवों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।