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संघ किसी व्यक्ति या सत्ता के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए कार्य करता है – दत्तात्रेय होसबाले जी

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दरभंगा, 17 जनवरी 2026

समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव राष्ट्र की एकता के लिए घातक है

संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में प्रमुखजन संगोष्ठी का आयोजन आज डीएमसीएच ऑडिटोरियम, दरभंगा में किया गया। इस अवसर पर सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में प्रबुद्धजनों, समाजसेवियों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों एवं बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों की सहभागिता रही।

सरकार्यवाह जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की तपस्या, सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण की यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना से लेकर आज तक उसका एकमात्र उद्देश्य राष्ट्र को परम वैभव तक पहुँचाना रहा है। संघ ने समाज को संगठित करने, राष्ट्रभक्ति का भाव जागृत करने तथा सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संघ किसी व्यक्ति या सत्ता के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए कार्य करता है। सेवा कार्य, शिक्षा, सामाजिक समरसता, स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जैसे क्षेत्रों में संघ के स्वयंसेवक निरंतर निःस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं। आज जब भारत वैश्विक मंच पर सशक्त रूप से उभर रहा है, तब संघ के शताब्दी वर्ष का यह कालखंड आत्ममंथन और भविष्य के दायित्वों को समझने का अवसर है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनुशासन, चरित्र निर्माण, सेवा भाव और राष्ट्र के प्रति समर्पण के साथ युवा पीढ़ी आगे बढ़े, यही संघ की अपेक्षा है। संगठित समाज ही सशक्त राष्ट्र की नींव होता है। उन्होंने सामाजिक समरसता विषय पर कहा कि समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव राष्ट्र की एकता के लिए घातक है। संघ समरस समाज की कल्पना करता है, जहाँ जाति, वर्ग और पंथ के भेद से ऊपर उठकर सभी एक-दूसरे के पूरक बनें। सामाजिक समरसता ही सशक्त और अखंड भारत की आधारशिला है।

पंच परिवर्तन से समाज परिवर्तन पर सरकार्यवाह जी ने कहा कि संघ ने शताब्दी वर्ष में समाज के समक्ष पाँच महत्वपूर्ण परिवर्तन का लक्ष्य रखा है – 

  1. सामाजिक समरसता, 2. पर्यावरण संरक्षण, 3. स्वदेशी जीवन शैली, 4. नागरिक कर्तव्य बोध, 5. कुटुंब प्रबोधन

सरकार्यवाह जी ने कहा कि ये पंच परिवर्तन केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में लाने योग्य संकल्प हैं, जिनके माध्यम से समाज आत्मनिर्भर और राष्ट्रनिष्ठ बनेगा। परिवार भारतीय संस्कृति की सबसे मजबूत इकाई है। वर्तमान समय में परिवार व्यवस्था को सुदृढ़ करना अत्यंत आवश्यक है। संस्कारयुक्त, संवादशील और संस्कृतिनिष्ठ परिवार ही राष्ट्र के चरित्र का निर्माण करते हैं। परिवारों से आग्रह किया कि वे अपने दैनिक जीवन में संस्कार, समय और समर्पण को प्राथमिकता दें।