धन्य! हो गई टंकारा की पावन भूमि
आर्य समाज के संस्थापक, समग्र क्रांति के अग्रदूत आधुनिक भारत के निर्माता महर्षि दयानन्द सरस्वती का जन्म संवत 1871 विक्रमी तदनुसार 12 फरवरी सन 1824 ईस्वी में गुजरात राज्य के मोरबी जनपद के टंकारा गांव में हुआ था। महर्षि जी का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था तो उनका नाम मूलशंकर रखा गया, संन्यास दीक्षा के पश्चात मूलशंकर का ही नाम दयानन्द हुआ। महर्षि दयानंद का जन्म एक संपन्न औदिच्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिताजी का नाम कृष्ण जी तिवारी था जिन्हें उस समय मोरबी राज्य की रियासत की ओर से एक छोटी सी जमींदारी प्राप्त थी। महर्षि दयानंद अपनी स्वयं कथित छोटे से जीवन चरित्र में इतना ही बताते हैं कि गुजरातियों में अन्य प्रांत की अपेक्षा संतान प्रेम बहुत अधिक होता है। ऐसे ही लाड दुलार से महर्षि दयानन्द का लालन पालन हुआ था। आठवें वर्ष में बालक मूलशंकर का यज्ञोपवीत संस्कार किया गया गायत्री, सन्ध्या, रुद्री आदि कंठस्थ कराए गए। बालक मूलशंकर की स्मरण शक्ति जन्म से ही बहुत तीव्र थी। उस समय के अनुसार एक ब्राह्मण बालक को जैसी प्रारंभिक शिक्षा मिलनी चाहिए वह बालक मूलशंकर को मिलती रही। 14 वर्ष की आयु तक वह यजुर्वेद संहिता कंठस्थ कर चुके थे। व्याकरण में भी उनका कुछ-कुछ प्रवेश हो गया था। प्रत्येक महापुरुष के जीवन में एक अविस्मरणीय घटना जरूर घटती है जो उनके भावी जीवन की दशा व दिशा को ही बदल देती है। ठीक ऐसा ही महर्षि दयानन्द के साथ हुआ। 1885 विक्रम की माघ वदी शिवरात्रि को महर्षि दयानन्द ने कुल की शैव परंपरा के अनुसार शिवरात्रि का व्रत रखा। घर के पास ही शिवालय में जब शिवरात्रि के जागरण पर जो लोग रात भर जागकर पुण्य लूटने का संकल्प लिए बैठे थे वह निद्रा देवी की सुखमय गोद का आनंद लेने लगे। रात्रि को जब सब सो गए तो बालक मूलशंकर जाग रहा था जिसकी दृष्टि बराबर शिवलिंग पर गड़ी हुई थी। वह उस अद्भुत शक्ति संपन्न देवता की ओर चाव भरी नजर से देख रहा था। अचानक वह बालक क्या देखता है मध्ययरात्रि में मंदिर में सन्नाटा पसरा है चूहे बिलों से निकल आए हैं मूर्ति के इर्द-गिर्द चावल आदि के जो दाने पड़े उन्हें खा रहे हैं। बीच-बीच में चूहे मूर्ति के ऊपर भी चढ़ रहे थे। मूलशंकर ने सोचा जो महादेव बड़े-बड़े दानवों के व्यतिक्रम को नहीं सह सकता और त्रिशूल लेकर उनका संहार करता है वह चूहों को सिर पर चढ़ने से तो अवश्य रोकेगा और कुछ नहीं तो फिर सिर हिलाकर उन्हें भगा देगा। परंतु उसने आश्चर्य और विस्मय देखा कि वह निश्चल ही रहा, हिला-डुला नहीं। तब क्या यह पत्थर ही वह शिव है, जो कैलाश पर निवास करता है, जिसमें संसार का संहार करने की शक्ति है, जिसकी त्रिशूल की ज्योति से दानवों के कलेजे कांप जाते हैं? वह कोई और ही शिव होगा, इसमें और उसमें अवश्य भेद होगा । वहीं से बालक मूल शंकर के मन में सच्चे शिव को जानने की तीव्र जिज्ञासा जागृत हो गई, मूर्ति पूजा से उन्हें विराग हो जाता है। शिवरात्रि की घटना महान परिवर्तन का कारण बन गई। उल्लेखनीय होगा आज आर्य समाज का संगठन शिवरात्रि को ऋषिबोद्ध उत्सव के रुप में मनाता है। मंदिर की घटना के दो-चार वर्ष पश्चात हैजा आदि रोग से चाचा और बहन की मृत्यु के पश्चात तो युवा मूलशंकर में तीव्र वैराग्य भी जागृत हो गया। नतीजा विक्रमी संवत 1903 को ज्येष्ठ मास में उन्होंने घर छोड़ दिया, 21 वर्ष की आयु में सन 1845 में प्रेममय घर और सरल राजमार्ग विलास वैभव को लात मार कर बिहड वन का रास्ता उन्होंने चुना। गृह त्याग के 15 वर्ष के पश्चात नर्मदा से लेकर देव भूमि उत्तराखंड में गंगा के किनारे सघन वनों में विचरे। 15 वर्ष तक जिज्ञासु दयानन्द ने पहाड़ और मैदानों को नाप डाला, घोर कष्ट सहा और तपश्चर्या की। सच्चे शिव को प्राप्त करने तथा मृत्यु को जीतने के लिए हिमालय के अनेक योगियों से मिलकर योग की गहन साधनाएं उन्होंने सीखी। हरिद्वार के उस समय 130 वर्ष से अधिक आयु के स्वामी पूर्णानंद से उन्होंने संन्यास लिया, संन्यास लेकर शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी से दयानन्द उनका नाम प्रसिद्ध हुआ। 1860 में मथुरा के दंडी प्रज्ञा चक्षु संन्यासी विरजानन्द को पाकर वह धन्य हो गए यह कह सकते हैं प्रज्ञा चक्षु शिष्य रुप में आदित्य ब्रह्मचारी अमित तेजस्वी महर्षि दयानन्द सरस्वती को पाकर खुद धन्य हो गए। गुरु के कुल में उन्होंने 3 वर्ष रहकर उनकी सेवा करते हुए व्याकरण के अष्टाध्यायी महाभाष्य आदि ग्रंथों को पढ़ा, आर्ष व अनार्ष की कसौटी व वेद विरुद्ध मतों की समालोचना की दृष्टि भी उन्हें वहीं से प्राप्त हुई। 1863 से लेकर महर्षि दयानन्द के देहावसान 1883 तक का जीवन खुली किताब है। उन्होंने धर्म क्षेत्र ही नहीं समाज राष्ट्र की नव चेतना को जगाने में जो कार्य किया पुनर्जागरण की जो नींव डाली उस नींव पर आज का आधुनिक भारत खड़ा हुआ है। 2024 में महर्षि दयानन्द की द्विजन्म शताब्दी समारोह पूरे देश में धूमधाम से मनाये गये। ग्राम से लेकर प्रांत, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विविध कार्यक्रम आयोजित हुए। वहीं इस वर्ष महर्षि दयानंद की जन्म भूमि टंकारा में स्थापित आर्य समाज टंकारा की स्थापना का शताब्दी समारोह भी फरवरी 2026 में धूमधाम से मनाया जा रहा है। महर्षि दयानंद स्मारक न्यास के तत्वाधान में यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।




