बुधरी ताती – नक्सली क्षेत्र में शिक्षा व पुस्तकों को बनाया परिवर्तन का आधार
बस्तर का नाम लंबे समय तक नक्सल हिंसा, पिछड़ेपन और विकास की चुनौतियों के कारण सुर्खियों में रहा। घने जंगलों और दुर्गम इलाकों में रहने वाले हजारों जनजातीय परिवार शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर रहे। ऐसे में एक महिला ने बंदूक नहीं, बल्कि पुस्तक को परिवर्तन का आधार बनाया।
बुधरी ताती, जिन्हें पूरा बस्तर प्यार से “बड़ी दीदी” कहता है। उन्होंने लगभग चार दशक तक गांव-गांव घूमकर जनजातीय बेटियों को स्कूल भेजने का अभियान चलाया। उनके इसी असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने 2026 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया है।
बुधरी ताती का जन्म वर्तमान छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के हिरानार गांव में एक जनजाति परिवार में हुआ। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया। उन्होंने गरीबी, अभाव और संघर्ष को बहुत करीब से देखा। उस समय क्षेत्र में न स्कूल थे, न सड़कें, न स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही रोजगार के पर्याप्त अवसर। मरिया और मुरिया जनजातियों की कठिन जिंदगी ने उनके मन में समाज के लिए कुछ करने का संकल्प जगाया।
कल्याण आश्रम में मिली शिक्षा ने उनकी सोच बदल दी। उन्होंने अनुभव किया कि शिक्षा ही वह ताकत है, जो गरीबी, शोषण और पिछड़ेपन की बेड़ियां तोड़ सकती है। यहीं से तय कर लिया कि जिस अवसर के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ा, वह अवसर बस्तर की हर बेटी तक पहुंचाएंगी।
1980 के दशक के मध्य में जब नक्सली गतिविधियां तेजी से बढ़ रही थीं, तब कई संस्थाएं बस्तर में काम करने से कतराती थीं। ऐसे समय में बुधरी ताती ने जोखिम उठाया। उन्होंने जंगलों के रास्ते पैदल चलना शुरू किया। नदियां पार कीं, पहाड़ चढ़े और दूर-दराज के गांवों तक पहुंचीं। उन्होंने 570 से अधिक गांवों का लगातार दौरा किया और हर परिवार से सीधे संवाद बनाया।
उस दौर में अधिकतर परिवार शिक्षा को जरूरी नहीं मानते थे। रोजी-रोटी के लिए लोग जंगलों पर निर्भर रहते थे। बेटियां घर के काम और परिवार की जिम्मेदारियां संभालती थीं। बुधरी ताती ने धैर्य के साथ लोगों को समझाया कि पढ़ाई केवल नौकरी का रास्ता नहीं खोलती, बल्कि सम्मान, आत्मविश्वास और बेहतर भविष्य भी देती है। उनकी लगातार मेहनत ने धीरे-धीरे लोगों की सोच बदल दी।
स्कूल तक लंबी दूरी भी बड़ी बाधा बन रही है। इसलिए उन्होंने अपनी संस्था “मां शंखिनी महिला उत्थान संस्था” के माध्यम से जनजातीय छात्राओं के लिए छात्रावास शुरू किए। वहां रहने, भोजन और सुरक्षित माहौल की व्यवस्था की गई। इससे दूर-दराज के गांवों की बेटियां नियमित रूप से पढ़ाई कर सकीं। उनकी प्रेरणा से पढ़ने वाली अनेक लड़कियां आज शिक्षिका, नर्स, सरकारी कर्मचारी और सामाजिक कार्यकर्ता बन चुकी हैं। इन महिलाओं ने अपने गांवों में नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का काम किया। यह अभियान एक परिवार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे समाज में बदलाव की नींव बन गया।
बुधरी ताती ने केवल शिक्षा पर ही जोर नहीं दिया। उन्होंने समझा कि आर्थिक आत्मनिर्भरता के बिना समाज का समग्र विकास संभव नहीं है। उन्होंने महिलाओं को सिलाई, बुनाई, हस्तशिल्प और अन्य पारंपरिक कौशल का प्रशिक्षण दिया। उनके प्रयासों से 500 से अधिक जनजातीय महिलाओं ने रोजगार के साधन विकसित किए और अपने परिवार की आय बढ़ाई।
स्वच्छता, पोषण, मातृ स्वास्थ्य और बच्चों की देखभाल जैसे विषयों पर गांव-गांव अभियान चलाए। उन्होंने जनजाति परंपरागत ज्ञान को आधुनिक स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी जानकारी के साथ जोड़ा। साथ ही शराब की लत, घरेलू हिंसा और अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी लोगों को जागरूक किया। उन्होंने संवाद, विश्वास और सामुदायिक भागीदारी के जरिए लोगों का भरोसा जीता। यही कारण रहा कि बस्तर के दूरस्थ गांवों में भी लोग उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानने लगे।
बुधरी ताती ने अपना पूरा जीवन समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने विवाह नहीं किया और जनजातीय बच्चों तथा महिलाओं को ही अपना परिवार माना। उन्होंने कभी प्रसिद्धि की इच्छा नहीं रखी। उन्होंने चुपचाप अपना काम जारी रखा और हजारों लोगों का जीवन बदल दिया।
भारत सरकार ने 2026 में उनके इसी समर्पण को सम्मान देते हुए उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया। सम्मान मिलने के बाद भी उन्होंने इसे अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं माना। उन्होंने कहा कि यह सम्मान पूरे बस्तर और वहां के जनजातीय समाज का है।




