भारत की ‘स्व’देशी जीवन-शैली में ‘स्व’ के आयाम - डॉ. मनमोहन वैद्य जी, अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
भारत की स्वदेशी जीवन-शैली में निहित ‘स्व’ के भारत में निर्मित वस्तुओं का प्रधानतः उपयोग करने के साथ अनेक महत्वपूर्ण पहलू हैं।
भारत की शिक्षा-पद्धति के मूल्यांकन के लिए 1964–1966 के दौरान डॉ. डी. एस. कोठारी के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग का एक प्रमुख निष्कर्ष यह था कि भारत का वैचारिक जगत यूरोप-केंद्रित हो गया है, जबकि उसे भारत-केंद्रित होना चाहिए। इस तथ्य को समझने के लिए कुछ समकालीन उदाहरणों पर दृष्टि डालना उपयोगी होगा।
दृष्टिकोण का परिवर्तन : यूरोप से भारत की ओर –
मध्य – पूर्व नहीं, पश्चिम एशिया
आज इजराइल और हमास के बीच जो युद्ध चल रहा है, उसे भारत सहित पूरी दुनिया की मीडिया “मध्य-पूर्व (Middle East)” क्षेत्र का युद्ध कह रही है। स्वतंत्रता के बाद भी भारत लंबे समय तक उस भूभाग को इसी नाम से संबोधित करता रहा। किंतु हाल ही में भारत के विदेश मंत्रालय ने उसे “पश्चिम एशिया” कहना आरंभ किया है। प्रश्न उठता है – क्या वहाँ युद्ध का स्थान बदल गया? नहीं। बदला है तो हमारा दृष्टिकोण।
खाड़ी के क्षेत्र को “मध्य-पूर्व” कहना दर्शाता है कि हम वैचारिक रूप से यूरोप में बैठकर दुनिया को देख रहे हैं। यूरोप के लिए भारत “पूर्व” है, जापान “सुदूर पूर्व (Far East)” और खाड़ी का क्षेत्र “मध्य-पूर्व” है। लेकिन भारत अब स्वतंत्र है। अब हमारी परिभाषाएँ हमारे दृष्टिकोण से होंगी, पश्चिम की नकल से नहीं। इसलिए भारत के लिए यूरोप पश्चिम है, जापान पूर्व है, और खाड़ी का क्षेत्र पश्चिम एशिया है।
सोच की यह आधारभूमि भारत की होगी, यूरोप की नहीं। यही स्वदेशी चेतना है।
शासन से न्याय की ओर
अंग्रेज भारत में शासन करने आए थे – To Rule over the People here, इसलिए उन्होंने लोगों को दंडित करने की दृष्टि से अनेक नियम बनाए, जिन्हें Indian Penal Code (IPC) कहा गया। आज भारत में जनता का शासन है। अब उद्देश्य दंड देना नहीं, न्याय प्रदान करना है। इसी भाव से IPC का नाम बदलकर भारतीय न्याय संहिता (BNS) किया गया। यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का परिवर्तन है। ऐसे अनेक परिवर्तन सरकार द्वारा किए जा रहे हैं और आगे भी होंगे।
कालगणना और भारतीय चेतना
अंग्रेजों के आने से पहले भारत में सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की गति पर आधारित शास्त्रसम्मत कालगणना प्रचलित थी। महीनों के नाम भी नक्षत्रों पर आधारित थे। हमारे शास्त्रज्ञ 50–100 वर्षों बाद होने वाले सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की भी सटीक गणना कर लेते थे। पश्चिम का ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रारंभ में केवल दस महीनों का था। सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर – इन नामों के अर्थ ही सातवाँ, आठवाँ, नौवाँ और दसवाँ हैं। बाद में गिनती पूरी करने के लिए जूलियस सीजर ने जुलाई और सम्राट ऑगस्टस ने ऑगस्ट महीना जोड़ा। इस प्रकार सातवाँ कहलाने वाला महीना नौवाँ बन गया।
भारतीय तिथि और जीवन के संस्कार — आज भी भारत में हमारे सभी पर्व अंग्रेज़ी तारीख़ से नहीं, बल्कि भारतीय तिथि से ही मनाए जाते हैं, जैसे –
रामनवमी चैत्र शुक्ल नवमी को, रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को, जन्माष्टमी श्रावण/ भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को, नवरात्रि अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को, और विजयादशमी अश्विन शुक्ल दशमी को ही। अंग्रेज़ी तारीख़ चाहे जो हो, पर्व तिथि के अनुसार ही होते हैं।
तो प्रश्न यह है कि – क्या हम अपने जन्मदिन और विवाह की वर्षगाँठ भी भारतीय तिथि के अनुसार नहीं मना सकते? विवाह का दिन तय करते समय हम पंडित से शुभ मुहूर्त पूछते हैं, फिर उसकी वर्षगाँठ केवल अंग्रेजी तारीख से क्यों? यह आग्रह इसलिए है क्योंकि यह हमारी कालगणना है – प्राचीन, शास्त्रीय और वैज्ञानिक। यह हमारा ‘स्व’ है।
जन्मदिन का भाव बदलता है..
अंग्रेजी तारीख के अनुसार जन्मदिन मनाने में आधी रात तक प्रतीक्षा करना, फिर केक काटना और चेहरे पर केक का क्रीम लगाने जैसी भद्दी परंपराएँ चल पड़ी हैं।
भारतीय परंपरा में दिन का आरंभ ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) में होता है।
यदि तिथि के अनुसार जन्मदिन मनाया जाए, तो पूरा भाव-विश्व बदल जाता है –
सुबह जल्दी उठना, स्नान कर ईश्वर के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करना, घर के बुजुर्गों को प्रणाम करना, कोई अच्छा संकल्प लेना, और समाज के लिए कुछ करने का निश्चय करना।
ऐसा जन्मदिन मनाने से पूरे कुटुंब में आनंद, संस्कार और उत्सव का वातावरण बनता है।
यही भारत की स्वदेशी जीवन-शैली है – जहाँ सोच, समय, संस्कार और व्यवहार – सब कुछ अपने ‘स्व’ से जुड़ा हुआ हो। कम खर्च में, बिना किसी के विरोध के, केवल दृष्टि बदलकर हम अपने जीवन को अधिक अर्थपूर्ण और भारतीय बना सकते हैं।
पढ़ाई, सीख और जीवन का उद्देश्य : भारत का ‘स्व’ दृष्टिकोण
हाल ही में एक लेख पढ़ने को मिला। उसमें लेखक लिखता है –
“मैंने ऐसे अनेक लोगों को देखा है जो अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं, पर जीवन में बहुत कुछ सीख चुके हैं। और ऐसे भी लोगों को देखा है जो बहुत पढ़े-लिखे हैं, पर जीवन की सीख से बिल्कुल वंचित हैं। पढ़ाई (Education) और सीख (Learning) – दोनों एक जैसी नहीं हैं।
पढ़ाई से आजीविका का साधन मिलता है, पर सीख से जीवन को उद्देश्य (Purpose) मिलता है। जब जीवन का उद्देश्य स्पष्ट होता है, तो जीवन की दिशा तय होती है।
दिशा तय होने पर प्राथमिकताएँ स्पष्ट होती हैं। और जब उस उद्देश्य की दिशा में निरंतर प्रयास होते हैं, तो जीवन नदी के प्रवाह की तरह सहज रूप से बहने लगता है।
नदी अपने दोनों किनारों की मर्यादा में बहती है, क्योंकि उसे अपना गंतव्य पता होता है – उसे सागर से मिलना है।
इसके विपरीत, केवल पढ़ाई करके पैसा कमाने वाले व्यक्ति का जीवन तालाब के पानी जैसा हो जाता है – ऊपर से बड़ा और स्थिर दिखता है, पर भीतर ठहरा हुआ होने के कारण सड़ने लगता है और दुर्गंध फैलाता है।
किताबें हमें सीखने में सहायता करती हैं। कहा भी गया है – “पहले हम पढ़ना सीखते हैं, और बाद में सीखने के लिए पढ़ते हैं।” (First we learn to read, then we read to learn.)
जैसे मछली पानी में रहती है, वैसे ही हम समय में रहते हैं। मछली यह नहीं कह सकती कि “मेरे पास पानी नहीं है।” उसी प्रकार कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि “मेरे पास समय नहीं है।” वास्तव में समस्या समय की नहीं, कार्य-प्रबंधन (Task management) की – कार्य की प्राथमिकता की होती है।
जब हम अपने कार्यों को प्राथमिकता से, सही ढंग से व्यवस्थित करते हैं और उपलब्ध समय का उचित नियोजन करते हैं, तो जीवन के उद्देश्य के लिए समय स्वतः उपलब्ध हो जाता है।
फिर उस योजना को क्रियान्वित करना आवश्यक होता है।
इसलिए जीवन में केवल धन अर्जन ही नहीं, बल्कि कोई उच्च उद्देश्य होना चाहिए।
उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, सूर्योदय से पहले उठने का संकल्प, फिर उसका प्रयास और बाद में अभ्यास आवश्यक है। जब उठने का समय तय हो जाता है, तो सोने का समय अपने आप तय हो जाता है। इन दो किनारों के बीच जब जीवन बहता है, तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य स्वतः संतुलित रहता है। यदि प्रत्येक घर में, घर के सभी सदस्य सूर्योदय से पहले उठने की परंपरा अपनाएँ, तो जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं। रात्रि-पारी में काम करने वाले या बीमार लोग अपवाद हो सकते हैं। नियमित व्यायाम, योग, सूर्य नमस्कार स्वतः जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। यह भी भारत के ‘स्व’ का ही एक स्वरूप है।
“थोड़ा अधिक देना”: भारत का मौन संस्कार
अंग्रेज शासन से पहले भारत में एकीकृत शासन नहीं था। भाषा, पूजा-पद्धति और जीवन-शैली में विविधता थी। फिर भी एक परंपरा पूरे भारत में सदियों से देखने को मिलती है –
जब कोई द्रव पदार्थ (दूध, तेल आदि) मापकर दिया जाता है, तो पूरा माप भरने के बाद थोड़ा ऊपर से अधिक देना। तराजू में तौलते समय भी कांटा बीच में आने के बाद मुट्ठी भर थोड़ा अधिक देना – यह परंपरा आज भी विशेषकर ग्रामीण भारत में जीवित है।
यह केवल व्यापार की शैली नहीं, बल्कि भारत का ‘स्व’भाव है। इसके पीछे की भावना स्पष्ट है – “मैं जो मूल्य ले रहा हूँ, उसके बदले समाज को किसी भी स्थिति में कम नहीं, बल्कि थोड़ा अधिक ही दूँ।”
समाज को अधिक लौटाने का भाव – यही भारत है।
भ्रष्टाचार का स्थायी समाधान
दुर्भाग्यवश आधुनिक शिक्षा व्यक्ति को अधिक आत्म-केंद्रित और केवल आर्थिक लाभ के दृष्टिकोण से सोचने वाला बना रही है। जबकि भारत का सामान्य जन समाज को अधिक देने में सहज आनंद अनुभव करता है। यही भारत का ‘स्व’भाव है। यदि इस ‘स्व’भाव का जागरण हो, और इसे व्यवहार में उतारा जाए, तो भ्रष्टाचार के लिए स्थान ही नहीं बचेगा। भाव स्पष्ट है – मैं अपने कार्य के लिए जो वेतन या मूल्य लेता हूँ, उससे अधिक समाज को लौटाना है, कम किसी भी स्थिति में नहीं। यही भारत की स्वदेशी जीवन-शैली और भारत के ‘स्व’ का सच्चा प्रकटीकरण है।
स्वामी विवेकानंद की आयरिश मूल की शिष्या भगिनी निवेदिता ने समाज जीवन से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही है। उनका कहना है कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम से अर्जित पारिश्रमिक को केवल अपने तक सीमित न रखकर समाज के हित में अर्पित करते हैं, वहाँ सामूहिक प्रयास से एक प्रकार की सामाजिक पूँजी (social capital) का निर्माण होता है। इसी सामाजिक पूँजी के बल पर समाज समृद्ध बनता है और समाज का प्रत्येक व्यक्ति भी समृद्ध बनता है। यही धर्म है – यह धर्म किसी पंथ या रिलीजन तक सीमित नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और परस्पर एक सूत्र में बाँधने वाली जीवन-दृष्टि है।
निवेदिता आगे कहती हैं कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का फल केवल स्वयं के लिए संचित करते हैं और समाज को लौटाते नहीं हैं, उस समाज में कुछ व्यक्ति तो संपन्न दिखाई दे सकते हैं, किंतु समाज दरिद्र बना रहता है। इसलिए यदि इस विचार को स्वदेशी जीवनशैली का अभिन्न अंग बना लिया जाए, तो समाज का संपूर्ण स्वरूप ही बदल सकता है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति का सजग और सक्रिय सहयोग आवश्यक है।
भारत का विचार और आचरण सदा से यह रहा है – उत्पादन में प्रचुरता, वितरण में समानता और उपभोग में संयम। अपने उपभोग को संयमित कर, अपने अधिकार का ही बचा हुआ समाज के हित में आत्मीयता से समर्पित करना ही धर्म है। वहीं, दूसरों को कष्ट पहुँचाकर या उनके अधिकारों को छीनकर अपना स्वार्थ साधना पाप है। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्रता के बाद भारत के नेतृत्व ने कुछ प्रतीकात्मक और विचार प्रधान निर्णय लिए। लोकसभा का आदर्श वाक्य है – “धर्मचक्र प्रवर्तनाय”, राज्यसभा का – “सत्यम् वद, धर्मम् चर”, और भारत के सर्वोच्च न्यायालय का बोध वाक्य है – “यतो धर्मस्ततो जयः”। यहाँ तक कि हमारे राष्ट्रध्वज में स्थित चक्र भी धर्मचक्र का प्रतीक है। भारत मूलतः धर्मप्राण राष्ट्र है। जब धर्म के अनुशासन में अर्थ और काम – ये पुरुषार्थ चलते हैं, तब मोक्ष स्वाभाविक हो जाता है।
दया धर्म है, अहंकार पाप है। इसलिए जीवन में एक ओर, एकांत में आत्म साधना और दूसरी ओर, (लोकांत में) समाज के बीच सेवा – दोनों का संतुलन आवश्यक है। स्वामी विवेकानंद ने इसी भाव को “शिवभाव से जीव सेवा” अर्थात To serve man is to serve God के सूत्र द्वारा स्पष्ट किया और दरिद्र नारायण की सेवा को ईश्वर-पूजा के समान माना।
यही भारत का ‘स्व’ है – यही हमारी स्वदेशी जीवनशैली है।
भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में कहा गया है – “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः”
और “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः” अर्थात मनुष्य अपने स्वधर्म रूपी कर्म में रत रहकर सिद्धि प्राप्त करता है और अपने कर्मों के माध्यम से ईश्वर की आराधना करता है।
संत ज्ञानेश्वर इसे और सरल शब्दों में कहते हैं – “तेया सर्वात्मका ईश्वरा, स्वकर्म कुसुमांची वीरा, पूजा केली होय अपारा, तोषा लागी।” (अर्थ- यह है कि समाजरूपी सर्वव्यापक ईश्वर की अपने कर्मरूपी पुष्पों से की गई पूजा उसे प्रसन्न करती है।)
इन सभी विचारों का सार यही है कि हमारा प्रत्येक कार्य समाज-पूजा के भाव से किया जाए। जिस प्रकार पूजा के लिए हम ताजे, सुगंधित और श्रेष्ठ पुष्प चुनते हैं, उसी प्रकार समाज के लिए किए जा रहे हमारे सभी कर्म भी उत्कृष्ट, शुद्ध और सर्वोत्तम होने चाहिए।
यही भारत का ‘स्व’ है। यही हमारा ‘स्व’भाव बने। यही हमारी जीवनशैली का अंतरंग हिस्सा बने। तब हमारा समाज-जीवन और राष्ट्र-जीवन कितना सुंदर, समृद्ध और मनभावन होगा !
यही स्वदेशी जीवनशैली है।



