पुणे
प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार जी ने कहा कि “आत्मविस्मृत राष्ट्र विनाश की ओर मार्गक्रमण करता है। आज भी औपनिवेशिक मानसिकता के कारण भारत की स्व-आधारित व्यवस्था नष्ट हो चुकी है। स्वतंत्रता के बाद अब विकसित भारत के लिए ‘स्व’ आधारित राष्ट्र निर्माण करना हमारी सिविलाइजेशनल ड्यूटी है”।
कोथरूड स्थित मयूर कॉलोनी में आयोजित ‘भारतीय संस्कृति संगम’ व्याख्यानमाला में ‘स्व बोध’ विषय पर विचार रखे। इस अवसर पर अवकाश प्राप्त आयकर आयुक्त डॉ. सुहास कुलकर्णी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पुणे महानगर संघचालक रवींद्र वंजारवाडकर मंच पर उपस्थित रहे।
जे. नंदकुमार जी ने कहा, “हर राष्ट्र का एक अपना ‘स्व’ होता है। विश्व कल्याण भारत का स्वबोध है। भारतीय सभ्यता प्राचीन, चिरंतन और नित्य नूतन है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सभी क्षेत्रों में स्व-आधारित दृष्टिकोण विकसित हुआ था। लेकिन दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद उस पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई। इसके परिणाम स्वरूप हमें जहां पहुंचना चाहिए था, वहां हम पहुंच नहीं पाए हैं।”
उन्होंने कहा कि “भारत का आत्मबोध केवल मनुष्य का विचार नहीं करता है, बल्कि विश्व के कल्याण की कामना करता है। ‘सर्वे सन्तु निरामया’ यह हमारी भावना है। राष्ट्रीयत्व ही सनातन धर्म है और वही भारत की राष्ट्रीय चेतना है। एक ओर देश का विभाजन करने के प्रयास हो रहे हैं, वहीं हमें अपनी अस्मिता और स्व- भाव संस्कारों के मूल्य का जतन करना आवश्यक है”।
जातिभेद दूर करना आवश्यक – डॉ. सुहास कुलकर्णी
डॉ. सुहास कुलकर्णी ने आत्मबोध की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, “भौतिक जगत में व्यावहारिक, सामाजिक तथा पारिवारिक जीवन में अपनी पहचान यानी स्व-बोध होना आवश्यक होता है। वर्तमान में जातियों में भेदभाव पैदा कर समाज को कमजोर बनाने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे समय में आत्मबोध का जागरण होना समय की मांग है”।



