भारत की स्वतंत्रोत्तर प्रगति
भारत को स्वतंत्रता अत्यधिक संघर्षों, त्याग और बलिदानों से मिली। लेकिन भारत विभाजन की विभीषिका के अपार कष्ट के साथ स्वतंत्र हुआ था। विभाजन के दंश से देश उबर भी नहीं पाया था, कि पड़ोसी देश ने कश्मीर में आक्रमण कर दिया था। इन परिस्थितियों से भी भारत का मनोबल डिगा नहीं। सशक्त और सबल राष्ट्र बनने की इच्छाशक्ति कमजोर नहीं हुई। भारत ने विकास के दूरगामी लक्ष्य तय किए और उज्जवल भविष्य के सपने देखे। जब हम स्वतंत्र हुए खाद्यान्न का गंभीर संकट था। गेहूं अमेरिका से मंगाना पड़ता था। वह भी घटिया गेहूं भेजता था। पीएल 480 नाम की योजना में हमें लाल गेहूं मिलता था, जिसे अमेरिका में पशुओं के उपयोग में लाया जाता था।
कृषि प्रगति: भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, खाद्यान्न संकट से उबरना। सबको दो समय के भोजन की व्यवस्था करना। इस जटिल और चुनौतीपूर्ण कार्य का किसानों ने मेहनत करके और कृषि वैज्ञानिकों ने नई तकनीक, नई किस्में खोज कर खाद्यान्न की उपज में बढ़ोत्तरी करके सामना किया।इसमें कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन के योगदान को स्मरण करना आवश्यक है। स्वामीनाथन ने भारत में गेहूं की अधिक उपज और लंबाई में छोटे पौधे वाली किस्म की खोज की। रासायनिक उर्वरकों का समुचित प्रयोग किया। इससे उपज बढ़ी। हम दो दशक बाद गेहूं के आयातक से आत्मनिर्भर हो गए। वर्ष 1980 आते आते निर्यातक भी बन गए। एम एस स्वामीनाथन भारत के प्रथम किसान आयोग के अध्यक्ष बने। उन्हें भारत सरकार ने पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया। हालांकि 70 और 80 के दशक में अत्यधिक यूरिया का उपयोग करने के कारण कुछ लोग एम एस स्वामीनाथन की नीति की आलोचना भी करते है। किंतु हमारा मानना है कि ये उस समय की मांग थी। भूख मिटाना पहली प्राथमिकता थी और इसे स्वामीनाथन ने पूर्ण किया। उनके ही समक्ष बीजी कुरियन को भी याद किया जाता है। इन्होंने भारत में दुग्ध क्रांति की। इस तरह हम देखते हैं कि 1960 से 1980 के दो दशक हरित क्रांति और श्वेत क्रांति के रूप में इतिहास में दर्ज हो गए हैं। वर्ष 1950 में भारत का खाद्यान्न उत्पादन वार्षिक मात्र 50 मिलियन टन था जो अब 2025 तक 330 मिलियन टन हो गया है। भारत की प्रगति का यह सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है।
अवसंरचनात्मक प्रगति: स्वतंत्रता के बाद भारत के नीति नियंताओं ने अवसंरचनात्मक ढांचे (Infrastructure) पर ध्यान केंद्रित किया। इसी नीति के आलोक में भारत ने बिजली उत्पादन और सिंचाई सुविधाओं के लिए बांध बनाने शुरू किए। भाखड़ा नागल बांध, हीराकुंड जैसे विशाल बांध 1960 और 1970 के दशकों में बने। बाद में रूस के सहयोग से टिहरी बांध 1990 के दशक में पूर्ण हुआ। इनसे भारत को प्रचुर मात्रा में उद्योग, कृषि और घरों को बिजली मिली तो सिंचाई के लिए नहरों से पानी मिला। अवसंरचनात्मक ढांचे के अंतर्गत ही भारत में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान चिकित्सा संस्थान (AIIMS), भारतीय तकनीकी संस्थान (IIT), भारतीय प्रबंध संस्थान (IIM), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) स्थापित हुए। आज भारत के दो पर्वतीय राज्य हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड अपनी आवश्यकता से कहीं अधिक विद्युत उत्पादन कर रहे है। हाइड्रो प्रोजेक्ट के कारण ही ये संभव हो सका है।
हरित , सौर और ऊर्जा में आत्मनिर्भर: भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए हरित सौर और नाभिकीय ऊर्जा को आधार बनाया है। भारत में 1990 के दशक में ही नाभिकीय ऊर्जा (परमाणु रिएक्टर) से बिजली उत्पादन शुरू कर दिया था। अब ये और तेज गति से आगे बढ़ रहा है। सौर ऊर्जा के लिए विशेष अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने चलाया है। जिसे पीएम सूर्य घर योजना नाम दिया गया है। हरित ऊर्जा को एथनाल की खोज ने पूरा किया है। ऊर्जा के क्षेत्र में भारत का अगला पड़ाव हाइड्रोजन से निर्मित ऊर्जा है, जो भविष्य का ऊर्जा स्रोत बनने जा रहा है। स्वनिर्मित एथनाल, बिजली और हाइड्रोजन ऊर्जा से भारत की आयातित पेट्रोलियम ऊर्जा पर निर्भरता लगातार कम हो रही है। बल्कि कुछ वर्षों में शायद ये निर्भरता समाप्त भी हो सकती है। इससे जहां विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है। वहीं हम विश्व राजनीति में बगैर किसी दवाब के फैसले लेने में सक्षम हो रहे हैं।
रक्षा क्षेत्र में प्रगति: स्वतंत्रता के बाद भारत रक्षा उपकरणों का आयातक देश था। हमें रायफल, गोला बारूद, तोप, टैंक, लड़ाकू जहाज विदेश से मांगने पड़ते थे। वर्ष 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद जो सबसे बड़ी उपलब्धियां है, उनमें एक ये है कि अब भारत रक्षा उपकरणों का निर्यातक हो गया है। भारत में रायफल बन रही है, टैंक, मिसाइल और तेजस लड़ाकू विमान बन रहे हैं। भारत अब ऑपरेशन सिंदूर में सफल प्रयोग के बाद ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात कर रहा है। भारत के मित्र राष्ट्र अब ब्रह्मोस के बाद तेजस प्राप्त करने की भी इच्छा व्यक्त कर रहे है। एक समय था जब 1962 में भारत चीन युद्ध हुआ तो बर्फ और पहाड़ों पर पहनने के लिए हमारे सैनिकों पर उपयुक्त वर्दी और जूते नहीं थे। आज सियाचिन और कारगिल जैसी चोटियों पर भारतीय सैनिक समस्त आवश्यक और साज सज्जा युक्त वर्दी के साथ मुस्तैद हैं।
एक जून 2026 को भारत ने स्वदेशी ड्रोन दिव्यास्त्र का परीक्षण किया। इसका परीक्षण राजस्थान के जोधपुर के रेगिस्तान में किया गया। ये ड्रोन स्वदेशी कंपनी होवर इट ने बनाया है। ड्रोन की विशेषता ये है कि ये 500 किमी की दूरी तय करके भी लक्ष्य को भेद सकता है। हाल के वर्षों में हुए युद्धों रूस और यूक्रेन, इसराइल ईरान और भारत पाकिस्तान में ड्रोन का व्यापक इस्तेमाल हुआ। इसी के मद्देनजर भारत ने ड्रोन उत्पादन बढ़ाया है और इसमें स्वदेशी निजी कंपनियों की भी मदद ली जा रही है।
अगले ही दिन यानि कि दो जून को भारत ने रूद्रम 2 मिसाइल का सफल परीक्षण कर दिया। रूद्रम का विकास और निर्माण डीआरडीओ ने किया है। ये सतह से सतह पर मार करने वाली सुपरसोनिक मिसाइल है। ये एक एंटी रेडिएशन मिसाइल है। ये दुश्मन के रडार, ट्रैकिंग सिस्टम, संचार टावरों से निकलने वाले सिग्नल को पकड़ कर उन्हें नष्ट करने में सक्षम है। इसका परीक्षण डीआरडीओ ने चांदीपुर रेंज में सुखोई 30 लड़ाकू विमान में लगाकर किया। दुश्मन की रक्षा प्रणाली को अंधा बनाकर यह 350 किमी पर लक्ष्य भेद सकती है। यह प्रगति मोदी सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति सचेत रहने और आत्मनिर्भर बनने की नीति का परिणाम है। इस वर्ष के बजट में केंद्र सरकार ने रक्षा क्षेत्र के लिए 8.8 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।
आर्थिक प्रगति: भारत की स्वतंत्रता के समय विकास दर बहुत कम थी। आज विकास दर 7.7 प्रतिशत है। भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लक्ष्य है कि 2047 तक जब स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होंगे, तब तक भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। अर्थव्यवस्था का आकार 5 ट्रिलियन हो जाएगा। मजबूत अर्थव्यवस्था के कारण ही 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकल आए। प्रतिवर्ष लगभग 9 करोड़ किसानों को सम्मान निधि प्रदान की गई है। आज गरीब, किसान, मजदूर, महिला सभी के जनधन खाते खुले हुए हैं। इनपर शून्य बैलेंस की सुविधा है। मजबूत अर्थव्यवस्था और प्रचुर खाद्यान्न की उपलब्धता के कारण ही प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना में 80 करोड़ लोगों को निशुल्क अन्न उपलब्ध हो रहा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए ई नाम योजना संचालित है। सरकार समर्थन मूल्य पर किसानों से उपज की खरीद कर रही है।
सड़क और रेल यातायात विकास: भारत में एक समय पक्की सड़कों का अभाव था। गांव पहुंचने के लिए सड़क की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। केवल राष्ट्रीय राजमार्ग ही पक्के और डामर के बने थे। आज परिदृश्य एक दम बदल गया है। देश भर में नेशनल हाईवे और एक्सप्रेस वे का जाल बिछ गया है। बसों और रेल यातायात से सार्वजनिक परिवहन सुगम हो गया है। डीजल और पेट्रोल के स्थान पर इलेक्ट्रिक बसें चल रही हैं। रेलवे ने 20वीं सदी के भाप इंजनों से आगे बढ़कर डीजल इंजन फिर 21वीं सदी में इलेक्ट्रिक इंजन और अब हाइड्रोजन इंजन तक यात्रा पूरी कर ली है। भारत उन चंद देशों में शामिल हो गया है जिसने हाइड्रोजन से रेल चलाई है।
हाइड्रोजन रेल का शुक्रवार 17 जुलाई 2026 एक ऐसा ही पड़ाव है,जिससे विश्व चकित है। विकसित और विकासशील सभी देशों ने इस प्रगति को भारत की इक्कीसवीं सदी की स्वर्णिम यात्रा की आहट के रूप में देखा है। ये है भारत की पहली हाइड्रोजन रेल। इसका शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जींद में किया। यूं तो हाइड्रोजन से रेल चलाने का प्रयोग कुछ देशों में अभी हाल के महीनों या एक वर्ष के अंदर हुआ है। लेकिन भारत की हाइड्रोजन रेल इन सबसे भिन्न है। यह हमारी वैज्ञानिक तकनीक और ज्ञान, कल्पनाशीलता का अद्भुत उदाहरण है। अन्य देश सिर्फ दो या तीन यात्री बोगी की रेल ही चला सके हैं। लेकिन भारत के इंजीनियरों ने 10 बोगी की रेल चलाकर इतिहास रच दिया है। इस रेल के इंजन की क्षमता 3200 हॉर्स पावर है। यह दर्शाता है कि भारत की प्रगति रेल की गति की तरह निरंतर बढ़ रही है।
भारत की प्रगति 79 साल के कालखंड की है। इसमें अनेक आपदाएं, युद्ध भी लड़े। लेकिन विकास को दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया। गत 12 वर्ष देश के विकास के इतिहास में गौरवशाली गाथा के हैं। वर्ष 2047 तक भारत विश्व सबसे प्रमुख महाशक्तियों में से एक होगा।




