नवीकरणीय ऊर्जा की ओर भारत के कदम - डॉ.
शेखर सुमन , नई दिल्ली
पश्चिम एशिया में पिछले एक माह से संघर्ष जारी
है। इसके खत्म होने के अभी कोई आसार नहीं दिख रहे हैं, क्योंकि
ईरान-इजराइल-अमेरिका यह सैन्य युद्ध अब आर्थिक युद्ध में बदल चुका है। ईरान ने
समुद्री व्यापार मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को बंद कर दिया
है जिससे विश्व को ज्यादातर पेट्रोल और पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात किया जाता है।
यह स्वाभाविक है कि इससे दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होती, लेकिन
इसका प्रभाव दुनिया की उन अर्थव्यवस्थाओं पर ज्यादा हो रहा है जो केवल पारम्परिक
ऊर्जा के स्त्रोतों पर निर्भर है। भारत पर भी इस सैन्य और आर्थिक युद्ध का व्यापक
प्रभाव देखने को मिल रहा है। लेकिन भारत पिछले एक दशक से हीं इस संभावित संकट से
निपटने की तैयारी कर रहा था। भारत अब नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में नेतृत्वकारी
भूमिका में आ चुका हैं।
भारत ने 2025 में रिकॉर्ड 6.3
गीगावाट
पवन टर्बाइन स्थापित किए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 85 प्रतिशत
अधिक है। ब्लूमबर्गएनईएफ के अनुसार, इससे भारत अमेरिका और जर्मनी को पीछे छोड़कर 2025 में चीन के बाहर सबसे बड़ा पवन ऊर्जा
बाजार बन गया।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में अनुसार, भारत में पवन ऊर्जा क्षमता में वृद्धि
का एक प्रमुख कारण बहु-प्रौद्योगिकी आधारित जटिल स्वच्छ ऊर्जा नीलामी का उदय रहा
है। इन नीलामियों में विकासकर्ताओं को दो या दो से अधिक नवीकरणीय प्रौद्योगिकियों
सौर, पवन और ऊर्जा
भंडारण को एकीकृत -करना आवश्यक होता है, और अक्सर ये नीलामियां अधिक स्थिर और विश्वसनीय स्वच्छ ऊर्जा प्रदान
करने के लिए आकार में बड़ी होती हैं। पवन ऊर्जा के बाद दूसरी सबसे सुरक्षित नवीकरणीय ऊर्जा सौर ऊर्जा है।
इस दिशा में चीन और भारत के उल्लेखनीय प्रगति को एक्स पर साझा करते हुए टेस्ला के
संस्थापक एलन मस्क ने लिखा कि 'सौर
ऊर्जा भविष्य की ऊर्जा है।' साल
2025 में भारत ने
चीन के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा सोलर प्लान लगाए।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की रिपोर्ट
के अनुसार, 31 मार्च, 2026 तक भारत की सौर
ऊर्जा क्षमता 150 गीगावाट
से अधिक हो गई है, जो
नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने
रिकॉर्ड 44 गीगावाट
से अधिक नई सौर क्षमता जोड़ी, जिससे
कुल क्षमता लगभग 150.26 गीगावाट
तक पहुंच गई। बड़े पैमाने की परियोजनाओं और छतों पर सौर पैनल लगाने से प्रेरित इस
तीव्र वृद्धि ने भारत को 2026 में
विश्व के दूसरे सबसे बड़े सौर बाजार के रूप में स्थापित कर दिया है।
पश्चिम एशिया के इस संकट के बीच भारत सरकार ने
नवीकरणीय ऊर्जा के अन्य क्षेत्रों में भी प्रयास तेज कर दिए हैं। अप्रैल 2026
में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने अरुणाचल
प्रदेश में दो बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी दी, जिनमें कुल
निवेश ₹40,000 करोड़ से अधिक है। कमला हाइड्रो इलेक्ट्रिक
प्रोजेक्ट-सुबनसिरी नदी पर 1,720 मेगावाट की परियोजना, जिसकी
अनुमानित लागत ₹26,069.5 करोड़ है। कलई-॥ हाइड्रो -इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट
लोहित नदी पर 1,200 मेगावाट की परियोजना, जिसकी अनुमानित
लागत ₹14,105.83 करोड़ है.
केंद्र सरकार ने 2026-27 से 2030-31
की
अवधि के लिए ₹2,584.6 करोड़ की लघु जलविद्युत विकास योजना को मंजूरी
दी है। इस योजना के तहत 1 मेगावाट से 25 मेगावाट क्षमता
वाली लगभग 1,500 मेगावाट नई लघु जलविद्युत क्षमता जोड़ी जाएगी।
इसका विशेष फोकस पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों पर रहेगा।
भारत ने वहां भी प्रयास तेज कर दिए हैं जहां अधिक
रिसर्च की जरुरत होती है। पिछले साल हीं राष्ट्रीय भू-तापीय ऊर्जा नीति (2025) जारी की गयी।
इसके तहत अनुसंधान, पायलट
परियोजनाओं और प्रौद्योगिकी
विकास को समर्थन दिया जाएगा। इस नीति का लक्ष्य देशभर में चिन्हित 381 गर्म जलस्रोत स्थलों पर 10,600 मेगावाट की
संभावित क्षमता का दोहन करना है।
सरकार उन क्षेत्रों में भी प्रयासरत है जहां
आसानी से बड़ी मात्रा में नवीकरणीय ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। हम अपने कृषि, कृषि औद्योगिक और वानिकी कार्यों से
भारी मात्रा में बायोमास सामग्री उत्पन्न करते हैं। भारत प्रति वर्ष 500 मिलियन टन से अधिक कृषि एवं कृषि
औद्योगिक अवशेष उत्पन्न करता है जिससे बायोमास ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। इससे
विद्युत उत्पादन की संभावित क्षमता 1,00,000 मेगावाट है। भारत में बायोमास ऊर्जा क्षमता 2023 में 10,232 मेगावाट से बढ़कर 2030 तक 14,970 मेगावाट होने का अनुमान है, जो 5.27 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) को दर्शाता है।
हमें यह समझने की जरूरत है कि ऊर्जा संकट के इस
दौर में केवल सरकार के प्रयास हीं पर्याप्त नहीं है। जनता को इस नवीकरणीय परिवर्तन
को स्वीकार करना होगा, अपनाना
होगा और इस दिशा में अपने आसपास के लोगों को जागरूक भी करना होगा। यह वक्त धैर्य
और आपसी सहयोग का है।




