झोला वुमन: एक शांत विचार से जन्मी जनआदत
समाज में वास्तविक परिवर्तन अक्सर बड़े नारों या आक्रामक आंदोलनों से नहीं, बल्कि छोटे, सरल और निरंतर प्रयासों से आता है। डॉ. अनुभा पुंडीर की यात्रा इसी सत्य को साकार करती है। वे अपने जमीनी स्तर के कार्यों के लिए ”झोला वुमन“ के नाम से जानी जाती हैं। कपड़े के झोले को एक पर्यावरण अनुकूल विकल्प के रूप में स्थापित करने का उनका प्रयास आज एक विचार से आगे बढ़कर जन-आदत बनने की दिशा में अग्रसर है।
डॉ. अनुभा पुंडीर ने एक ऐसे समय में प्लास्टिक के विकल्प के रूप में झोले का संदेश दिया, जब सुविधा और उपभोग को आधुनिकता का प्रतीक माना जा रहा था। उन्होंने जन-जागरूकता अभियानों, सामुदायिक संवाद और स्वदेशी उत्पादन के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि सतत जीवन-शैली केवल नीतियों या कानूनों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदतों से आकार लेती है। उनका विश्वास है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति घर से निकलते समय एक पुनः उपयोग योग्य झोला साथ रखे, तो यह छोटा-सा कदम एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले सकता है।
उनकी पहल की विशेषता यह है कि यह पर्यावरण संरक्षण को भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जोड़ती है। झोला उनके लिए केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों, सादगी, स्वावलंबन और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का प्रतीक है। इसी दृष्टिकोण के साथ उन्होंने झोला अभियान को ‘स्वदेशी’ विचार से जोड़ा, जहां स्थानीय कारीगरों, महिला स्व-सहायता समूहों और ग्रामीण उत्पादकों को कपड़े के झोले के निर्माण से जोड़ा गया। इस प्रकार उनका कार्य पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आजीविका सृजन का माध्यम भी बना।
एक शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में डॉ. पुंडीर यह भली-भांति समझती हैं कि व्यवहार परिवर्तन एक धीमी लेकिन स्थायी प्रक्रिया है। उन्होंने किसी तात्कालिक परिणाम की अपेक्षा किए बिना वर्षों तक वही सरल संदेश दोहराया - प्लास्टिक छोड़िए, झोला अपनाइए। इस निरंतरता ने धीरे-धीरे लोगों की सोच और आदतों में स्थान बनाया। आज अनेक लोग बिना किसी दबाव या प्रचार के कपड़े के झोले को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना रहे हैं।
डॉ. अनुभा पुंडीर का कार्य यह भी दर्शाता है कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी केवल प्रकृति की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक संतुलन से भी जुड़ी हुई है। महिलाओं और स्थानीय समुदायों को इस अभियान से जोड़कर उन्होंने यह सिद्ध किया कि सतत विकास तभी संभव है, जब पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण साथ-साथ चलें।
उनकी यात्रा यह सिखाती है कि सच्चा परिवर्तन दिखावे से नहीं, बल्कि निरंतर कर्म और नैतिक स्पष्टता से आता है। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना आत्मप्रचार के, उन्होंने एक साधारण झोले को विचार, संस्कार और व्यवहार का प्रतीक बना दिया। आज ”झोला आंदोलन“ केवल प्लास्टिक के विकल्प की बात नहीं करता, बल्कि एक ऐसी जीवन-शैली का आग्रह करता है जो भारतीय परंपरा में निहित है और भविष्य के लिए आवश्यक भी।
डॉ. अनुभा पुंडीर का संदेश सरल और प्रेरक है। पर्यावरण संरक्षण कोई अस्थायी अभियान नहीं, बल्कि एक दैनिक अभ्यास है और इस अभ्यास की शुरुआत एक छोटे से संकल्प से होती है। हर बार घर से निकलते समय एक झोला साथ रखने के संकल्प से।




