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ममता ने 58 की उम्र में उठाया रैकेट: जीवन को मिली नई दिशा

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 ममता ने 58 की उम्र में उठाया रैकेट: जीवन को मिली नई दिशा

मुरादाबाद निवासी ममता रानी की जीवन-यात्रा का सबसे सुंदर पक्ष यही है कि उन्होंने अपनी खुशी को केवल अपने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने स्वयं को ऊपर उठाया और अब दूसरों को ऊपर उठाने का प्रयास कर रही हैं।19 वर्ष की उम्र में परिवार की जिम्मेदारियों से शुरू हुई यात्रा 58 वर्ष की उम्र में एक नए रूप में सामने आई। एक ऐसा समय, जब शायद कोई व्यक्ति अपने जीवन को समेटने की सोच सकता था, ममता ने उसी समय उसे नए अर्थ में जीना शुरू किया।

कभी-कभी जीवन अपनी गति से चलता रहता है और हमें पता ही नहीं चलता कि कब हमारी अपनी इच्छाएँ, रुचियाँ और सपने पीछे छूट गए। ममता रानी यादव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। 19 वर्ष की उम्र में विवाह, दो पुत्रों का पालन-पोषण, परिवार की जिम्मेदारियाँ और इसी बीच बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ देखते-देखते वे 58 वर्ष की हो गईं। बचपन से ही खेलों में उनकी रुचि थी। वे खेला करती थीं और खेल उनके जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा था। लेकिन विवाह और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उनकी यह रुचि कहीं पीछे छूट गई। समय बीतता गया। इसी दौरान वे मधुमेह की समस्या से भी जूझने लगीं। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बीच एक समय ऐसा भी आया जब उनके सामने यह प्रश्न था -”अब आगे जीवन कैसे जिया जाए? जीवन का उद्देश्य क्या हो?“ इसी प्रश्न ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी।

वर्ष 2022 में 58 वर्ष की उम्र में उन्होंने दोबारा रैकेट उठाया। मुरादाबाद में UP State tournamet 55+ में हुई प्रतियोगिता में उन्होंने फाइनल तक पहुंचकर रजत पदक जीता। वह पदक उनके लिए केवल एक खेल उपलब्धि नहीं था, बल्कि उनके भीतर सो चुकी ऊर्जा और आत्मविश्वास के जागने का संकेत था। इसके बाद उन्होंने खेल को गंभीरता से अपनाने का निर्णय लिया। लगभग एक वर्ष तक उन्होंने कोचिंग ली। इसके बाद तकनीक को बेहतर समझने के लिए YouTube के माध्यम से भी सीखना शुरू किया। अभ्यास बढ़ता गया, आत्मविश्वास बढ़ता गया और हर वर्ष उनके हाथ में कोई न कोई पदक आने लगा।

ममता ने केवल बैडमिंटन का रैकेट नहीं उठाया था, उन्होंने अपने जीवन को फिर से उठाने का निर्णय लिया था। उन्होंने स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से बेहतर बनाने के लिए नियमित जिम जाना शुरू किया और अपनी फिटनेस पर ध्यान दिया। उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने शरीर को सक्रिय रखा और आधुनिक खेल प्रशिक्षण की तकनीकों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया। इस निरंतर प्रयास का परिणाम वर्ष 2026 में सामने आया, जब आगरा में Veteran National Ranking Category में Women*s Doubles 60+ में उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल किया। राष्ट्रीय स्तर पर मिली यह उपलब्धि उस महिला की कहानी थी, जिसने 58 वर्ष की उम्र में अपनी नई शुरुआत की थी।

ममता रानी की सबसे बड़ी जीत शायद वह स्वर्ण पदक नहीं है। उनके शब्दों में, इस यात्रा ने उन्हें फिर से यह समझने का अवसर दिया कि जीवन केवल जिम्मेदारियां निभाने का नाम नहीं है; जीवन को खुशी के साथ जीना और दूसरों के जीवन में भी खुशी बाँटना उतना ही महत्वपूर्ण है।

वे अब अपने आसपास के बच्चों को निःशुल्क बैडमिंटन प्रशिक्षण देती हैं। उनका मानना है कि जिस खेल ने उन्हें जीवन में नई ऊर्जा दी, उस ऊर्जा को दूसरों तक पहुँचाना भी उनकी जिम्मेदारी है। वे महिलाओं की कार्यक्रमों तथा बच्चों और महिलाओं की खेल एवं सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जुड़ी रहती हैं।