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पौधों की आहट बनी पहचान: ”Voice of Plant“ वाली मैम की प्रेरक कहानी

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पौधों की आहट बनी पहचान:  ”Voice of Plant“ वाली मैम की प्रेरक कहानी

प्रकृति उनके लिए केवल काम का क्षेत्र नहीं, बल्कि पहचान, प्रेरणा और जीवन का उद्देश्य है। एक सामान्य परिवार में पली-बढ़ीं सुदीप्ति वाजपेयी बचपन से ही किताबों, अपने विचारों और पौधों की दुनिया के करीब रहीं। अपने ताऊजी को पौधों की देखभाल करते देख प्रकृति से जुड़ा जो सहज लगाव बचपन में अंकुरित हुआ, वही आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बन गया। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि पौधों से उनका यह रिश्ता एक दिन उन्हें एक अलग पहचान देगा। आज लोग उन्हें प्यार से ”Voice of Plant वाली मैम“ के नाम से जानते हैं। एक ऐसा नाम, जिसमें उनकी यात्रा, उनका जुनून और प्रकृति के प्रति उनका समर्पण, तीनों समाए हैं।

कहते हैं, प्रकृति के बिना हम अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। लेकिन उनके जीवन में प्रकृति का महत्व शायद इससे भी कहीं अधिक है। प्रकृति ने उन्हें सिर्फ काम नहीं दिया, बल्कि उनकी पहचान, उनका नाम और उनके जीवन का उद्देश्य भी दिया। आज लोग उन्हें ” टवपबम व िच्संदज वाली मैम“ के नाम से जानते हैं, लेकिन कभी उन्होंने नहीं सोचा था कि पौधों से उनका यह रिश्ता एक दिन उनकी पहचान बन जाएगा।

दसवीं के बाद उन्होंने ग्यारहवीं और बारहवीं मे फिजिक्स, कमेस्ट्री और मैथमैटिक्स (PCM) विषय लिए और इसके बाद फिजिक्स और मैथमैटिक्स से ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई के साथ-साथ वे बच्चों को गणित पढ़ाती थीं और कोचिंग भी देती थीं। इसी दौरान उन्होंने यूपीएसी, सीडीएस, एसएससी और कई अन्य सरकारी परीक्षाओं की तैयारी की। सरकारी नौकरी पाने के उनके दो प्रमुख कारण थे पहला, नौकरी की सुरक्षा और दूसरा, उनका एक छोटा-सा सपना था कि अगर कभी सरकारी क्वार्टर मिला तो उसमें अपना एक सुंदर-सा ‘किचन गार्डन’ जरूर बनाएँगी।

कई परीक्षाओं के अलग-अलग चरण पार करने के बाद उन्हें बैंक में नौकरी मिली और उनकी पहली पोस्टिंग मुंबई में हुई। करीब चार वर्षों तक बैंकिंग क्षेत्र में काम करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ने का कठिन फैसला लिया क्योंकि वे जीवन को केवल नौकरी और वेतन तक सीमित नहीं रखना चाहती थीं।

विवाह के बाद वे नोएडा आ गईं। उन्होंने बालकनी में बागवानी शुरू की। उन्होंने Gardening की कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली, इसे करते हुए, गलतियाँ करते हुए और अपने अनुभव से सीखा। कुछ समय अमेजन में काम करने के बाद बदलती शिफ्ट के कारण बागवानी (Gardening) के लिए समय निकालना मुश्किल होने लगा। पति के प्रोत्साहन पर उन्होंने घर से फ्रीलांसिंग शुरू की और (BYJU*S) व ग्रेडअप (Gradeup) के लिए Banking Awareness, सामान्य अध्ययन (GK) तार्किक सामग्री (Reasoning content) तथा बच्चों के लिए शिक्षण वीडिया (tutorial videos) बनाए।

इसी बीच बागवानी उनके समय का सबसे बड़ा हिस्सा बन गई। कई बार वे छत में तौलिया सुखाने जातीं और वहीं पौधों की देखभाल करते हुए 3-4 घंटे बीत जाते। घर धीरे-धीरे पौधों से भरने लगा और। धीरे-धीरे लोग पौधों की देखभाल, मिट्टी, खाद और कीटों से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए उनसे पूछने लगे।

उनके पति ने सुझाव दिया कि अपने अनुभव को सोशल मीडिया (social media) के माध्यम से ज्यादा लोगों तक पहुँचाया जाए। अपने गुरुदेव शंकरानंद महाराज के आशीर्वाद से उन्होंने अगस्त 2020 में ”वायस ऑफ प्लांट“ यूट्यूब चैनल ”Voice of Plant“ YouTube channel की शुरुआत की।

शुरुआत से उनका उद्देश्य केवल वीडियो या फॉलोवर बढ़ाना नहीं, बल्कि बागवानी को इतना सरल बनाना था कि हर व्यक्ति इसे आसानी से शुरू कर सके। आज वे अपने छत (terrace) पर जैविक बागवानी (Organic Gardening) करती हैं, जहाँ लौकी, कद्दू, करेला, तोरई, टमाटर, शिमला मिर्च जैसी अनेक सब्जियाँ और अमरूद, चीकू, शहतूत, अनार, करौंदा, आम और नींबू जैसे फल उगाती हैं।

आज उनके समूह (community) में लाखों लोग जुड़े हैं और उनके वीडियो को लगभग 6 करोड़ बार देखा जा चुका है, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि ये आंकड़े नहीं हैं। उन्हें सबसे ज्यादा खुशी तब होती है जब कोई व्यक्ति बताता है कि उसने उनके वीडियो देखकर पहली बार बागवानी शुरू की, बीज से अपना पौधा तैयार किया या अपने किसी पौधे को बचा पाया।

लाखों लोगों ने उनके वीडियो से प्रेरित होकर बागवानी की शुरुआत की है और कई लोगों ने अपने बागवानी अनुभव को आगे बढ़ाकर दूसरों को भी प्रेरित किया है। इस तरह उनका प्रयास केवल पौधे उगाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक ऐसे समूह के निर्माण में बदल गया, जहाँ लोग प्रकृति से जुड़ने और दूसरों को उससे जोड़ने का काम कर रहे हैं।

जैविक बागवानी को बढ़ावा देना उनके काम का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है। उनका मानना है कि बागवानी के लिए बड़े मैदान की जरूरत नहीं होती एक छोटी छत या घर का कोई कोना भी पर्याप्त है। वे चाहती हैं कि हर व्यक्ति कम से कम एक पौधे से शुरुआत करे और धीरे-धीरे अपने घर में कुछ सब्जियाँ या फल स्वयं उगाने का प्रयास करे। उनका मानना है कि जब हम एक पौधा उगाते हैं, तो सिर्फ एक पौधा नहीं उगता; उसके साथ प्रकृति के प्रति प्रेम, धैर्य, जिम्मेदारी और एक बेहतर भविष्य की उम्मीद भी उगती है।

यही सोच उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान बन गई है। बैंकिंग से लेकर स्वतंत्र लेखक (freelancing) और फिर बागवानी को अपने जीवन का उद्देश्य बनाने तक की उनकी यात्रा यह बताती है कि कभी-कभी जीवन में हमारी सबसे बड़ी पहचान किसी तय योजना से नहीं, बल्कि उस काम से बनती है जिसे हम पूरे मन से करते हैं। आज ”वायस ऑफ प्लांट“ (Voice of Plant) वाली मैम के रूप में उनकी पहचान केवल एक नाम नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ने और दूसरों को प्रकृति से जोड़ने की एक प्रेरक आवाज बन चुकी है।