• अनुवाद करें: |
आजादी का अमृत महोत्सव

संघ और समाज

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

समाज में कार्य करते समय संघ के जानकार दो बातों को हर बार स्पष्ट करते हैं।

·       पहला - संघ समाज में कोई अलग संगठन होकर पूरे समाज को संगठित करने का एक उपक्रम है। जिस दिन संघ और समाज मिलकर एक हो जाएं उस दिन संघ का कार्य पूर्ण होगा।

·       दूसरा -  हिन्दू समाज को संगठित करने, उसे बलशाली बनाने, सामाजिक सौहार्द, राष्ट्र को माता स्वरूप मानने और अपने राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने का संघ का विचार कोई नया नहीं है। इस भूमि को अपनी माता मानने का विचार वैदिक ऋषियों का दिया विचार है।

ऊं। प्रभो शक्तिमन् हिन्दू राष्ट्रांगभूता

इमे सादरं त्वाम नमामो वयम्

त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम

शुभामाशिषं देही तत्पूर्तये।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना की इन पंक्तियों में बड़ा गहरा भाव छिपा है। एक स्वयंसेवक प्रतिदिन यह प्रार्थना करता है कि, ‘हे सर्वशक्तिमान प्रभु हम सभी इस हिन्दू राष्ट्र के अंगभूत घटक आपको सादर नमन करते हैं। हमने आपके ही कार्य के लिए अपनी कमर कसी है। अतः इस पुण्यकार्य की पूर्ति के लिए हमें शुभाशीष दें।

संघ और समाज के अंतर्संबंधों को समझना हो तो प्रार्थना की इन पंक्तियों से बहुत सहायता मिल सकती है। प्रथमतः संघ के स्वयंसेवक स्वयं को इस हिन्दू राष्ट्र का अंगभूत घटक मानते हैं। दूसरा यह कि, उन्होंने अपने इस राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने का जो संकल्प लिया है वह एक ईश्वरीय कार्य है।

भारत भूमि का मूल परिचय हिन्दू भूमि से है। हिन्दुस्थान या हिन्दुस्तान। यहां हिन्दू से आशय इस भूमि को अपना मानने वालों, इसके गौरव को अपना गौरव समझने वालों, इस भूमि के मान की रक्षा के लिए अपना जीवन लगा देने वाले महापुरुषों का सम्मान करने वालों से है। भले ही ऐसा मानने वाले व्यक्ति की उपासना पद्धति कुछ भी हो। इन तर्कसम्मत बातों की मान्यता इस भूमि पर रहने वाले सामान्यतः सभी लोगों में है।

मन में इस पुण्य भूमि के प्रति ऐसा भाव लिए संघ से जुड़ा ऐसा हर हिन्दू स्वयं को इस भूमि का अंगभूत घटक मनता है। संघ ऐसे हर हिन्दू की सामूहिक शक्ति को संगठित कर अपनी मातृभूमि को श्रेष्ठता और संपन्नता के शिखर पर स्थित करना चाहता है। संघ इन संगठित हिन्दुओं के माध्यम से किए जा रहे कार्य को सामान्य कार्य की श्रेणी में नहीं रखता। संघ के लिए यह कार्य ईश्वर निर्दिष्ट और ईश्वर का ही कार्य है। हिन्दू समाज की रचना और संघ लक्षित कार्य की ऐसी समझ हो तो संघ और समाज के संबंधों का स्वरूप स्पष्ट हो जाएगा।

समाज में कार्य करते समय संघ के जानकार दो बातों को हर बार स्पष्ट करते हैं। पहला यह कि संघ समाज में कोई अलग संगठन होकर पूरे समाज को संगठित करने का एक उपक्रम है। जिस दिन संघ और समाज मिलकर एक हो जाएं उस दिन संघ का कार्य पूर्ण होगा। संघ मानता है कि स्वस्थ समाज का अर्थ ही होता है संगठित समाज। हिन्दू समाज का स्वरूप बीच के कालखंड में बिगड़ा, अशक्त हुआ इसलिए संघ की आवश्यकता पड़ी।

दूसरा यह कि हिन्दू समाज को संगठित करने, उसे बलशाली बनाने, सामाजिक सौहार्द, राष्ट्र को माता स्वरूप मानने और अपने राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने का संघ का विचार कोई नया नहीं है। इस भूमि को अपनी माता मानने का विचार वैदिक ऋषियों का दिया विचार है। ऋग्वेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया- ‘माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्याः।’ ‘यह भूमि हमारी माता है और हम सभी इसकी संतानें हैं।समाज के संगठन का विचार भी हमारे वैदिक ऋषियों ने ही दिया। ऋग्वेद के ऋषि कहते हैं- ‘संगच्छध्वं संवदध्वम सं वो मनांसि जानताम, दैवा भागं यथापूर्वे संजानाना उपासते।’ ‘हे मनुष्यों, साथ साथ मिलकर चलो, मिलकर बोलो, तुम्हारी मानसिक भावनाएं समान हों, जैसे देवता समान ज्ञान रखकर काम करते थे (वैसा ही तुम भी करो)

इन अर्थों में संघ समाज में समरस होकर दुनिया के सबसे प्राचीन राष्ट्र के गौरवशाली अतीत का स्मरण करा यहां के हिन्दू समाज के सुप्त हनुमान को जगाने के कार्य में रत है।

इस कार्य को संपन्न करने के लिए संघ के आद्य सरसंघचालक परम पूज्य डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने उस समय के महान समाज सेवियों, स्वतंत्रता सेनानियों और विचारकों के साथ चर्चा के बाद जो कुछ विवेचना की उसे ही संघ ने अपनी कार्यपद्धति का आधार बनाया।

संघ संस्थापक डॉक्टर साहब का यह स्पष्ट मत था कि भारत एक राष्ट्र के रूप में अगर बलहीन हुआ तो इसका सर्वप्रमुख कारण भारतीय समाज के मानस में आत्मगौरव के भाव का तिरोधान होना था। जिस समाज का आत्मगौरव और आत्मसम्मान खो जाए वो समाज मृतप्रायः ही हो जाता है। उन्होंने तय किया कि निष्प्राण समाज में ऊर्जा का संचार करना है तो कभी जगदगुरु रहे भारत के गौरवशाली चित्र का स्मरण उन्हें कराना ही पड़ेगा।

समाज के सूक्ष्म पारखी डॉक्टर साहब ने गहराई से अनुभव किया कि आत्मगौरव की विस्मृति का सबसे घातक परिणाम हुआ कि कभी समवेत विचार और कार्य करने वाला समाज, हर जीव में ईश्वर का वास देखने वाला समाज जाति, मत, पंथ, वर्ग में इतना बंट चुका था कि उस हिन्दू समाज को एक करना लगभग असंभव सा हो गया था।

कई विचारक, सामाजिक पुरोधा, अन्यान्य संस्थाओं ने प्रयास भी किया लेकिन जिस परिमाण में आवश्यकता थी उतने सफल नहीं हो पाए।

सतत् विचार विनिमय के पश्चात डॉक्टर साहब ने तय किया कि समाज राष्ट्र की धुरी है और व्यक्ति समाज की अतः व्यक्ति का निर्माण ठीक-ठीक हो गया तो समाज सुदृढ़ होगा और समाज सुदृढ़ हो गया तो राष्ट्र अवश्यमेव ही सशक्त हो जाएगा।

व्यक्ति निर्माण की पद्धति क्या हो इसे लेकर भी खूब मंथन हुआ। इसमें नियमित मिलन का विचार सभी के मन में था। यही विचार पहले साप्ताहिक और बाद में प्रतिदिन की शाखा के रूप में सभी के सामने आया। कालांतर में इन शाखाओं में आने वालों को स्वयंसेवक कहा जाने लगा। स्वयंसेवक अर्थात स्वयं की प्रेरणा से समाज-राष्ट्र की आराधना में हर तरह का समर्पण करने वाले लोग।

डॉक्टर साहब ने समाज के अध्ययन के दौरान एक और बात पर गहराई से विचार किया। उन्होंने देखा कि भारत जब जगदगुरु था, सर्वशक्तिसंपन्न था तो उसका आधार हमारी संन्यास परंपरा थी। हम सभी को स्मरण भी है कि 11 सितंबर 1889 को शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने अपने संबोधन में कहा था कि, ‘मैं विश्व में संन्यास की सबसे प्राचीन परंपरा की भूमि की तरफ से आपको प्रणाम करता हूं।डॉक्टर साहब इसका महत्व समझते थे। समाज स्वयं भले आशक्तियों में आबद्ध हो वह प्रेरणा उनसे लेता है जिन्होंने समाज-राष्ट्र में अपना सर्वस्व समर्पण पर दिया हो। समाज को सूत्रबद्ध वही कर सकता है जो कहीं बंधा ना हो, राष्ट्र साधना का उदाहरण वो ही दे सकता है जिसने स्वयं अपना जीवन लगाया हो। इन सभी बातों को प्रमाण मानते हुए डॉक्टर साहब ने स्वयं इन आदर्शों पर चलते हुए अपने जीवन को एक दीपशिखा के रूप में सामने रखा।

समाज के साथ संघ के संबंधों की श्रृंखला में यह एक महत्वपूर्ण कड़ी थी। यह कड़ी थी प्रचारकों की। प्रचारक वो जिन्होंने देश सेवा का व्रत लिया हो। जिनके लिए अपना कोई निजी परिवार होकर पूरा समाज ही परिवार हो। परंतु बदलते परिवेश और देशकाल के अनुरूप संघ ने सुविचारित रूप से संन्यास की इस परंपरा को समाज के साथ समरस रखने पर बल दिया। संघ ने तय किया कि प्रचारक होंगे संन्यासी ही लेकिन समाज में अलग दिखें तो वो गेरुआ वस्त्र धारण नहीं करेंगे। उनका जीवन संयमित होगा लेकिन खान-पान की कोई विशिष्ट व्यवस्था नहीं होगी। हर घर में जाकर भोजन होगा। जो स्वयंसेवक परिवार खाएंगे वो प्रचारक खाएंगे। उनका रहन-सहन भी सब सामान्य समाज जैसा ही होगा। कह सकते हैं कि इस एक विचार ने संघ को समाज में प्रेरणात्मक रूप में आबद्ध कर दिया।

समाज और संघ के संबंधों में एक और विशिष्ट बात रही। संघ के प्रचारकों ने समाज कार्य का व्रत तो लिया लेकिन स्वयं को कहीं भी आगे नहीं रखा। समाज आगे आए यह ध्येय सामने रखकर हर गतिविधि और कार्य में स्वयंसेवकों को आगे रखने की पद्धति अपनायी गयी। प्रचारकों की व्यवस्था अपनी जगह अटल रही और साथ-साथ समाज से एक बड़ा कार्यकर्ता समूह तैयार होता चला गया। शीर्ष स्तर पर सरसंघचालक की व्यवस्था को छोड़कर निचले स्तर तक संघचालक समाज के स्वयंसेवक ही बनें ऐसी रचना रही।

संघ ने एक और बात बड़ी प्रतिबद्धता के साथ अपनायी कि संघ समाज में व्यक्ति निर्माण के अतिरिक्त कुछ नहीं करेगा। व्यक्ति ठीक-ठीक निर्मित हुआ तो वो समाज जीवन की विभिन्न गतिविधियों में स्वतंत्र रूप से हिस्सा ले सकता है। इस एक सूत्रीय कार्य ने संघ को समाज केन्द्रित होने में उत्प्रेरक का कार्य किया। वस्तुतः हरेक गतिविधि का आधार तो समाज ही है। संघ ने व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज साधना का व्रत लिया तो विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति स्वयं सुनिश्चित होती चली गयी। समाज केन्द्रित होने से संघ संकुचित होकर व्यापक होता चला गया।

कार्य के दौरान उद्देश्य स्पष्ट हों तो भ्रम की स्थिति नहीं बनती। संघ ने व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज का संगठन और समाज के संगठन के माध्यम से राष्ट्र के परम वैभव को शीर्ष पर रखा। इसके लिए भी सेवा को सर्वोपरि। सौहार्द को मूल आधार। ऐसा करते हुएसर्वेषां अविरोधेनदृष्टि के सूत्र को अपनी प्रेरणा माना। संघ किसी के विरोध में कोई कार्य नहीं करेगा। कोई व्यक्ति या संगठन संघ का विरोधी हो सकता है लेकिन संघ किसी का विरोधी नहीं। इस एक सूत्र ने दिन प्रतिदिन समाज में संघ की व्याप्ति  का मार्ग सुगम कर दिया।

वर्ष 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पांच वर्षों के पश्चात शताब्दी वर्ष मना रहा होगा। इस अवधि में संघ ने अपनी योजनानुरूप स्वयं को समाज से लगभग समरस कर लिया है। समाज संगठित रहे इस हेतु एक सूत्र की भूमिका भर में है। संघ चाहता भी यही है। भारत का हिन्दू समाज स्वयं में इतना समर्थ, संगठित और बलशाली हो कि उसे किसी संगठन की अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो। कह सकते हैं कि संघ की यह कल्पना सच होती दिख रही है। पुण्य भूमि भारत के परम वैभव का जो उद्देश्य संघ और भारत के हिन्दू समाज में आत्मस्थ है उसकी प्राप्ति भी अब दूर नहीं। ऊं।

  

(नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं)