देहरादून
होली का त्योहार रंगों और खुशियों का प्रतीक है। लेकिन बाजार में मिलने वाले केमिकल रंग कई बार त्वचा और सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। इसी समस्या को देखते हुए देहरादून जिले की ग्रामीण महिलाएं अब नेचुरल और हर्बल रंग तैयार कर रही हैं। ये रंग पूरी तरह सुरक्षित हैं और लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। बता दें देहरादून जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर रायपुर ब्लॉक के बरासी गांव में आरती, सरस्वती और राधे-राधे स्वयं सहायता समूह की 10 से ज्यादा महिलाएं इस काम में जुटी हैं। ये महिलाएं चुकंदर से लाल रंग, पालक से हरा रंग, हल्दी से पीला रंग और गेंदे के फूलों से पीला व लाल रंग तैयार करती हैं।
रंग बनाने के लिए सबसे पहले इन चीजों को मिक्सर में पीसकर उनका रस निकाला जाता है। फिर इस रस को अरारोट के आटे में मिलाकर छाना जाता है, जिससे रंग तैयार होता है। रंगों में अच्छी खुशबू के लिए गुलाब के फूल भी मिलाए जाते हैं। महिलाओं ने बताया कि वे हर साल होली से पहले ऐसे ही हर्बल रंग बनाती हैं। पिछले साल उन्होंने डेढ़ क्विंटल से ज्यादा रंग तैयार किए थे। ये रंग बाजार में ₹200 प्रति किलो तक बिकते हैं, जबकि अरारोट का आटा ₹50 प्रति किलो की दर से आता है। जानकारी के अनुसार, देहरादून जिले के पांच ब्लॉकों में यह काम चल रहा है। सबसे ज्यादा हर्बल रंग सहसपुर ब्लॉक में बनाए जा रहे हैं, जहां अब तक करीब 350 किलो रंग तैयार हो चुके हैं। जिले के हर ब्लॉक में 100 से 150 किलो तक रंग बनाए गए हैं।
पूरे जिले में 25 से 30 स्वयं सहायता समूह
हैं, जिनसे जुड़ी 300 से ज्यादा
ग्रामीण महिलाएं हर्बल रंग बनाने का काम कर रही हैं। ये रंग लोकल बाजार में आसानी
से बिक जाते हैं और लोगों को केमिकल रंगों का एक सुरक्षित विकल्प मिल रहा है।



